मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर

मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिरमीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर को भारत में स्वच्छ आइकोनिक प्लेस घोषित किया गया है। मदुरै जिले के जिलाधीश के वीरा राघव राव और निगम आयुक्त एस अनीश शेखर को उमा भारती पेयजल और स्वच्छता मंत्री द्वारा पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। इसमें कुल 63 कम्पेक्ट डिब्बे रखे गए हैं और चार कम्पेक्टर ट्रक मंदिर परिसर के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। पर्यटकों के उपयोग के लिए 25 ई-शौचालय और 15 वाटर एटीएम हैं। इस मार्ग को साफ  करने के लिए विशेष रूप से दो सड़क सफाई कर्मचारी हैं तथा दो बैटरी संचालित वाहन हैं।  मदुरै स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर दक्षिण भारत का प्रमुख तीर्थ स्थल है। मदुरै तमिलनाडु का प्राचीन शहर है। कहा जाता है कि यह शहर अढ़ाई हजार साल से भी अधिक पुराना है। इस खूबसूरत, सांस्कृतिक शहर की पहचान मीनाक्षी देवी मंदिर को लेकर भी है, जिसे मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है। मान्यता के अनुसार पांड्यवंश के राजा मलयध्वज संतान की चाह में यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की समाप्ति पर इस अग्नि कुंड से एक सुंदर कन्या की उत्पत्ति हुई और जब वह कन्या बड़ी हुई, तो इसके ऊपर राज्य की जिम्मेदारी आ गई। पूरे संसार में उसकी वीरता और पराक्रम की चर्चा होने लगी। युद्ध के मैदान में शत्रु उसके सामने कहीं नहीं ठहरते थे। कहा जाता है कि एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शव के साथ इस वीर कन्या का युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान ही कन्या शिव की सुंदरता को देखकर उन पर आसक्त हो गई और उन्हीं से शादी करने की ठान ली। हालांकि अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों में इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न तरह से की गई है। इस मंदिर के संबंध में एक और पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, भगवान शिव अपने गणों के साथ राजा मलयध्वज की पुत्री मीनाक्षी से शादी के लिए मदुरै शहर में आए। उन्होंने राजा से उनकी पुत्री का हाथ मांगा। इस शादी में देव ऋषि और महात्मा सभी उपस्थित हुए। भगवान विष्णु स्वयं इस आयोजन के संचालन के लिए आए थे, लेकिन इंद्र देव की कुटिल चाल की वजह से भगवान विष्णु समय पर इस आयोजन में अंततः उपस्थित नहीं हो सके। भगवान विष्णु के उपस्थित नहीं होने पर इस आयोजन का संचालन किसी अन्य देवता ने किया। इस पर भगवान विष्णु क्रोधित हो गए और फिर कभी मदुरै नहीं आने की प्रतिज्ञा की। कथा के अनुसार भगवान विष्णु नगर की सीमा से लगे एक पर्वत पर जाकर बस गए। हालांकि देवताओं के बहुत मनाने पर उन्होंने मीनाक्षी सुंदरेश्वर (पार्वती और शिव) का पाणिग्रहण कराया। कहा जाता है कि यहां के दो सबसे महत्त्वपूर्ण त्योहार भी इन्हीं कथाओं से जुड़े हैं। यह त्योहार भी इसी संदर्भ में मनाए जाते हैं। प्रतिवर्ष अप्रैल के महीने में शिव-पार्वती विवाह उत्सव मनाया जाता है। भगवान विष्णु को मनाकर शांत कराने के लिए भी एक उत्सव मनाया जाता है। कहा जाता है कि भगवान इंद्र को शिव की मूर्ति शिवलिंग के रूप में मिली और उन्होंने मूल मंदिर बनवाया। इस प्रथा का आज भी मंदिर में पालन किया जाता है। खास बात यह है कि इस त्योहार के दौरान शोभायात्रा में इंद्र के वाहन को भी स्थान मिलता है। मदुरै स्थित मीनाक्षी मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर का स्थापत्य एवं वास्तु आश्चर्यचकित कर देने वाला है, जिस कारण यह आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थित है एवं इसका कारण इसका विस्मयकारक स्थापत्य ही है। इस इमारत समूह में 12 भव्य गोपुरम हैं, जो अति विस्तृत रूप से शिल्पित हैं। इन पर बड़ी महीनता एवं कुशलतापूर्वक रंग एवं चित्रकारी की गई है, जो देखते ही बनती है। यह मंदिर तमिल लोगों का एक अति महत्त्वपूर्ण द्योतक है एवं इसका वर्णन तमिल साहित्य में पुरातन काल से ही होता रहा है। हालांकि वर्तमान निर्माण आरंभिक सत्रहवीं शताब्दी का बताया जाता है। इस मंदिर का गर्भगृह 3500 वर्ष पुराना है, इसकी बाहरी दीवारें और अन्य बाहरी निर्माण लगभग 1500-2000 वर्ष पुराने हैं। इस पूरे मंदिर का भवन समूह लगभग 45 एकड़ भूमि में बना है, जिसमें मुख्य मंदिर भारी भरकम निर्माण है और उसकी लंबाई 254 मी. एवं चौड़ाई 237 मी. है। मंदिर बारह विशाल गोपुरमों से घिरा है, जो कि उसकी दो परिसीमा भीत (चार दीवारी) में बने हैं। इनमें दक्षिण द्वार का गोपुरम सर्वोच्च है। मदुरै से अठारह किलोमीटर दूर पूर्व की ओर पहाड़ की चोटी पर भगवान विष्णु का मंदिर है।

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