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विक्रमादित्य को राजनीति में लाना गलत नहीं

newsnewsअपना पहला ही चुनाव जिन्होंने बतौर आजाद प्रत्याशी जीता, जिन्होंने प्रदेश को पहली गठबंधन सरकार दी, जो राजनीति के चाणक्य कहे जाते हैं और संचार क्रांति के मसीहा हैं, वह पंडित सुखराम आज भी राजनीति में लौट कर हिमाचल के लिए कुछ करने को बेताब हैं। पंडित सुखराम का नाम देश के उन नेताओं में शामिल है, जिन्होंने केंद्र में रहते हुए जिस भी मंत्रालय में काम किया, उसकी छाप अपने प्रदेश में जरूर छोड़ी। हिमाचल के हर घर में अगर फोन की घंटी बजी और जेब में मोबाइल आया है तो इसका श्रेय पंडित सुखराम को जाता है। प्रदेश में तबादला उद्योग को बंद करने की आवाज उठाने वाले पंडित सुखराम ही थे। पंडित सुखराम का विजन है कि प्रदेश के हर बेरोजगार को रोजगार मिले। ‘दिव्य हिमाचल’ के डेस्क प्रभारी संजय अवस्थी व जिला मंडी ब्यूरो प्रभारी अमन अग्होत्री ने जब सियासत में तपे पंडित जी से कुरेदने की कोशिश की तो वक्त के पन्ने खुलते चले गए…

आपको कांग्रेसी होेने पर कितना गर्व है और कितना मलाल है?

सुखरामः कांग्रेसी होने पर मैं फख्र महसूस करता हूं। मुझे गर्व है कि मैं उस पार्टी से हूं, जिसने देश को आजादी दिलाई। कांग्रेसी होने का मलाल हो, ऐसा तो तब भी नहीं हुआ, जब मुझे पार्टी से निकाला गया था। मैं पार्टी छोड़ने की धमकियां देने वालों में नहीं हूं। मुझे जब पार्टी से निकाला तो भी मैंने किसी दूसरे दल को ज्वाइन करने की बजाय एक नई पार्टी का गठन किया और उसका नाम भी कांग्रेस के नाम पर ‘हिमाचल विकास कांगे्रेस’ रखा। जब विलय किया तो भी कांग्रेस में किया।

क्या मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे की विधानसभा टिकट की दावेदारी को आप सही मानते हैं ?

सुखरामः अगर जनसेवा का जज्बा है तो जरूर। मेरी नजर में विक्रमादित्य को राजनीति में लाना, विधानसभा चुनाव का टिकट दिलाना और सफल करना गलत नहीं है। मैं मानता हूं कि विक्रमादित्य सिंह को टिकट मिलना चाहिए। सवाल यह है कि जो लोग राजनीति में आएं उनकी सोच सही होनी चाहिए। मैं जब सत्ता के शिखर पर था, तो मैंने अनिल शर्मा को राजनीति में न लाने की गलती की थी। अगर मैं सही समय पर अनिल को राजनीति में लाता तो जो कुछ कमियां रह गई हैं, वह भी नहीं बचती। यही वजह है कि अब अनिल सही समय पर अपने बेटे को राजनीति में लाना चाहते हैं।

वैसे परिवारवाद के बारे में आपकी राय क्या है?

सुखरामः अगर कोई काबिल है, तो उसे अवसर मिलना चाहिए, उसके रास्ते में परिवार कैसे आ सकता है? परिवार के नाम किसी की योग्यता को दरकिनार नहीं किया जा सकता और वैसे भी फैसला जनता ने ही करना है। जो जनता की कसौटी पर खरा उतरेगा, वही जीतेगा। मैंने परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया है। केंद्र में जाने के बाद मैंने अपनी विरासत एक ठाकुर को दी थी।

मंडी से सीएम बनते-बनते रह जाता है, क्यों असफल हो रहे मंडी के नेता?

सुखरामः सीएम जनता नहीं विधायक बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंडी के नेता सीएम बनने लायक नहीं हैं या नालायक हैं, लेकिन जब जिला का साथ सभी न दें और विधायक खिसक जाएं तो सीएम कैसे बनेगा?

वर्तमान हालात में कांग्रेस का भविष्य क्या है?

सुखरामः मैं केंद्र में 11 साल मंत्री रहा हूं और मैंने कांग्रेस में सोनिया गांधी जैसी अच्छी महिला और उनसे भी दो कदम आगे राहुल गांधी जैसे नेक लोग नहीं देखे। अच्छे लोग राजनीति के दांवपेंच नहीं जानते हैं और कभी-कभी धोखा खा जाते हैं, लेकिन मोदी के धोखे से देश जल्द बाहर निकलेगा और फिर से कांग्रेस उस मुकाम पर पहुंचेगी, जहां वह कभी थी। बस जरूरत धोखा देने वालों से दूर रहने की है।

अतीत में आप पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और अब मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर भी ऐसे ही आरोप हैं। दोनों परिस्थितियों का मूल्यांकन आप कैसे करते हैं?

सुखरामः मैं केंद्र व प्रदेश में लंबे समय तक मंत्री रहा। इसके बाद कोई सोच सकता है कि मेरी मंडी के बाहर कितनी प्रापर्टी है। दिल्ली में मेरे पास सिर्फ एक मकान है और आज के नेताओं के पास क्या नहीं है? मेरे घर पर पैसे मिलना एक षड्यंत्र था। सीबीआई ने पूरे देश में मेरी संपत्ति खंगाली, लेकिन आखिर में एक घर दिल्ली में, एक मंडी, एक कोटली में और एक बागीचा मिला। मंडी का कोई एक व्यक्ति यह कह दे कि कभी किसी से काम के पैसे लिए हों। इतिहास गवाह है कि सीबीआई को अपनी एक एफआईआर कैंसिल करनी पड़ी थी। अब मेरे केस सुप्रीम कोर्ट में हैं। मैं अदालत और अपने वकीलों को कहता हूं कि जल्दी सुनवाई हो, क्योंकि मुझे प्रदेश के लिए कुछ करना है।

क्या आप और वीरभद्र सिंह दोनों निर्दोष हैं?

सुखरामः मैं किसी और के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता हूं, लेकिन मैं निर्दोष हूं और कोर्ट से भी निर्दोष होकर निकलूंगा।

सरकार और संगठन की रार क्या मिशन रिपीट में बाधा नहीं है?

सुखरामः संगठन के बयान को तवज्जो देना सरकार का काम है। कोई दिक्कत हो, कोई मतभेद हों तो दूर करने चाहिए। सबको साथ लेकर चलने का काम मुख्यमंत्री का है। यही काम संगठन को भी करना चाहिए।

आपने हिविकां खड़ी की और धूमल सरकार पांच वर्ष तक चलाई भी। फिर कभी तीसरी पार्टी हिविकां की तरह विकल्प बनेगी?

सुखरामः धमकियां देने वाले कभी पार्टी नहीं बना सकते, क्योंकि पार्टी बनाना आसान है, चलाना और लोगों का विश्वास जीतना बहुत मुश्किल है। मैनें हिविकां बनाई थी और चला कर भी दिखाई। मेरे खड़े किए लोगों पर से ज्यादा भरोसा जनता को मुझ पर था और आज भी है, लेकिन आज के हालात में हिमाचल प्रदेश में नई पार्टी बनाना और उसे चलाना संभव नहीं है।

राहुल गांधी की मंडी रैली को आप कैसे देखते हैं?

सुखरामः राहुल की रैली बिलासपुर से थोड़ी कम थी, लेकिन यह रैली कांग्रेस को जोश और दिशा दे गई है। रैली अच्छी थी और भाषण भी सबके बहुत अच्छे थे। लोगों में बहुत जोश था। राहुल सबको एकजुट कर गए। अब मुख्यमंत्री वीरभद्र पर निर्भर है कि खुद कैसे चलना है और पार्टीजनों को कैसे चलाना है।

शहर में होते हुए भी आप रैली में नहीं आए

सुखरामः इस रैली के लिए मैं दिल्ली से कई घंटे का सफर करके आया था। मेरी तबीयत उस दिन ठीक नहीं थी। इसलिए मैंने प्रदेश प्रभारी सुशील कुमार शिंदे को बता दिया था कि मैं रैली में नहीं आ सकता हूं।

आपके पुत्र मंत्रिमंडल में हैं। पूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन आप इसके बाद संतुष्ट नहीं हैं।

सुखरामः ऐसा भी नहीं है कि मैं संतुष्ट नहीं हूं, पर क्या आप जानते हैं कि अनिल शर्मा का नाम मंत्रिमंडल की सूची में था, लेकिन मेरी वजह से यह नाम काट दिया गया और फिर सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से उसे मंत्रिमंडल में लेना पड़ा। आज अनिल ऐसे मंत्री हैं, जिन पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है और पूरे हलके में उनका बोलबाला है।

भविष्य में कांग्रेस की ओर से किसको सीएम बनता देखना चाहते हैं?

सुखरामः मेरी नजर में मुख्यमंत्री ईमानदार, न्याय करने वाला, जनता की सुनने वाला और किसी को परेशान न करने वाला होना चाहिए (सीएम के नाम के सवाल पर जोर देने पर पंडित सुखराम कहते हैं) ये सब गुण अनिल शर्मा में हैं और मैं भविष्य में अनिल शर्मा को मुख्यमंत्री के  रूप में देखना चाहता हूं। यह मेरी और एक पिता की इच्छा है।

आपके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और भूल?

सुखरामः देश को और हिमाचल को संचार क्रांति देना मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैंने शायद कोई भूल नहीं की, यह जरूर है कि कुछ बड़े नेताओं को पहचानने में मैंने कभी-कभी गलतियां जरूर कर दी हैं।

आपकी राजनीतिक विरासत कितनी सुरक्षित है?

सुखरामः मुझे अनिल शर्मा पर गर्व है। वह लोगों की सेवा करते हैं। अनिल के बाद अब मेरे पौत्र आश्रय भी इसी कदम पर चले हैं। आश्रय ने छोटी सी उम्र में बड़ी जिम्मेदारियों को निभाना शुरू कर दिया है।

विकास का विजन क्या होना चाहिए?

सुखरामः आम लोगों की खुशहाली ही नेता का विजन होना चाहिए। पुत्र मोह, पत्नी मोह और अपने लिए मोह नहीं होना चाहिए।

क्या हिमाचल सरकर रिपीट करेगी?

सुखरामः बिलकुल करेगी। बशर्ते वीरभद्र सबको साथ लेकर चलें।

क्या प्रदेश में मोदी लहर है?

सुखरामः लहर मुझे तो कहीं नहीं दिखाई देती। यहां एक ही लहर है, वह है विकास की लहर। हिमाचली वैसे भी कांग्रेस विचारधारा के हैं।

ब्राह्मणवाद के आरोप आप पर लगते रहे हैं?

सुखरामः सब झूठ हैं। मैं किसी ब्राह्मण सभा का सदस्य नहीं हूं। मेरे हलके में तो ब्राह्मण वैसे भी कम हैं। जातिगत आधार पर राजनीति मेरे परिवार ने कभी नहीं की।

राजनीति में अपनी इच्छा से आए या अचानक?

सुखरामः मुझे उस समय नगर पंचायत सचिव के रूप में 100 रुपए वेतन मिलता था। कुछ पंचायत प्रतिनिधि मेरे पास आए और बोले विधायक का चुनाव लड़ें। मैंने कहा कि मेरे परिवार का क्या होगा तो उन्होंने कहा कि क्या हम आपका परिवार नहीं हैं। यही बात मेरे दिल में घर कर गई। नौकरी छोड़ी 900 रुपए गे्रच्युटी मिली और चुनाव में सिर्फ 500 रुपए खर्च हुए, पर एक श्रेष्ठ नेता स्वामी कृष्णानंद को हरा दिया।

नहीं चाहिए तबादला उद्योग वाली सरकार

राजनीति ‘ट्रांसफर ओरियन्टड’ नहीं होनी चाहिए, बल्कि डिवेलपमेंट का विजन सरकारों का होना चाहिए। बार-बार ट्रांसफर करवाने की नेताओं की मुहिम के मैं खिलाफ हूं। नेताओं का काम कब से तबादलों में मशगूल रहना हो गया। उस समय वीरभद्र से राहें अलग करने का मेरा एक यही बड़ा कारण था।

शिक्षा का हब, पर युवाओं को रोजगार कहां

हिमाचल शिक्षा का हब बन गया, लेकिन पढे़ लिखों के लिए अब रोजगार कहां है। हिमाचल में बेशुमार प्राकृतिक दौलत है, लेकिन इससे रोजगार कोई पैदा नहीं कर पाया है। नेताओं के पास रोजगार पर सोचने का समय ही नहीं है।

अब घटिया स्तर की हो गई है राजनीति

जब मैं पहली बार सांसद बन कर केंद्र में गया तो कुछ मित्रों को लगा कि अब केंद्र के समुद्र में मैं खो जाऊंगा, लेकिन मैं जब हेलिकाप्टर में उड़ने लगा तो कइयों के पेट दर्द हुआ और फिर मुझे मुकदमेबाजी में ऐसा फंसाया कि मैं खुद को ही भूल गया। इन बातों पर सोचता हूं तो लगता है कि अब राजनीति बड़े ही घटिया स्तर पर आ गई है।

धूमल का साथ न देता तो नहीं छूते ऊंचाइयां

news1998 में कांग्रेस अगर नेतृत्व परिवर्तन करती तो हिविकां का समर्थन कांग्रेस को होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मुझे धूमल का साथ देना पड़ा। एक और बात ध्यान से सुनना, भाग्य कैसे काम करता है यह भी यहीं पता चलता है। अगर मैं भाजपा का समर्थन नहीं करता तो प्रेम कुमार धूमल कभी इतनी ऊंचाइयां नहीं छू पाते।

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