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चीन को टक्कर देने के लिए ‘जादू की झप्पी’

नई दिल्ली —  मनीला में आसियान सम्मेलन से अलग अमरीका, जापान, भारत और आस्ट्रेलिया की आपसी मुलाकात की। चारों देशों ने बैठक में भारत-प्रशांत क्षेत्र में आजाद, खुले और सौहार्द के साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया। माना जा रहा है कि चारों देशों ने यह कदम साउथ चाइना सी में चीन के बढ़ते दखल को रोकने के लिए उठाया गया है। यह क्षेत्र भारत और अमरीका द्वारा ‘इंडो-पैसिफिक’ कहलाता है, जबकि चीन इसे ‘एशिया-पैसिफिक’ कहता है। ‘इंडो-पैसिफिक’ विदेश नीति का मतलब साफ है कि अमेरीका चीन को टक्कर देने के लिए भारत को गले लगा रहा है। अमरीकी अखबार लॉस एंजलस टाइम्स की माने तो इंडो-पैसिफिक मामले में भारत के साथ अमरीका का समझौता कई मायनों में उसकी मजबूरी है। चीन में शी जिनपिंग के बेहद ताकतवर हो चुके हैं। अमरीका चीन को आर्थिक और सैन्य तौर पर सबसे बड़ा खतरा मान रहा है। इसीलिए अमरीका इस समझौते के लिए कितना तत्पर था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एचआर मैकमास्टर ने भारत-प्रशांत नेताओं को समझौते से पहले बार 43 कॉल किए। हालंकि अखबार का कहना है कि व्हाइट हाउस अभी इस मामले में ज्यादा खुलासे नहीं करना चाहता है। चीन को रोकने के लिए यह समझौता अमरीका की जरूरत था, इसीलिए इसके लिए ओबामा और हिलेरी क्लिंटन ने भी कोशिश की थी।

भारत-अमरीका संबंधों में बदलाव

भारत भी चीन से मुकाबले के लिए अमरीका का साथ पाना चाहता है, वहीं अमरीकी अखबार की मानें तो भारत-अमरीका के बीच आए इस बदलाव का एक प्रमुख कारण मोदी और ट्रंप के व्यक्तिगत विचार भी हैं। मुस्लिम बहुल पाकिस्तान के लिए ट्रंप की अशिष्टता को जहां हर कोई जानता है। वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को हाल ही में माओ त्से-तुंग जैसा दर्जा देना और चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति ट्रंप को परेशान कर रही है।  अमरीका को लगता है कि भारत खुद को भी चीन के सामने एक बढ़ती हुई शक्ति के रूप में पेश कर रहा है और बड़े एशियाई क्षेत्र में धीरे-धीरे चीनी वर्चस्व को चुनौती देने के तरीके तलाश रहा है।

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