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त्रिदेवों का सम्मिलित रूप हैं भगवान दत्तात्रेय

शास्त्रानुसार मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश-इन तीनों देवताओं की परम शक्ति जब केंद्रित हुई, तब ‘त्रयमूर्ति दत्त’ का जन्म हुआ। अगहन पूर्णिमा को प्रदोषकाल में भगवान दत्त का जन्म होना माना गया है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं और इसलिए इन्हें ‘ परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु ‘ और ‘ श्री गुरुदेव दत्त’ भी कहा जाता है। इन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। विविध पुराणों और महाभारत में भी दत्तात्रेय की श्रेष्ठता का उल्लेख मिलता है। वह श्री हरि विष्णु का अवतार हैं…

भगवान दत्तात्रेय को ईश्वर का संपूर्ण अवतार माना जाता है। वह सृष्टि निर्माता ब्रह्मा, सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और सृष्टि के संहारक भगवान भोलेनाथ के सम्मिलित रूप माने जाते हैं। भगवान दत्तात्रेय का नाम उनकी इस विशेषता की तरफ  संकेत करता है। दत्तात्रेय का अर्थ ही होता है, त्रिदेवों द्वारा प्रदत्त आशीर्वाद। भगवान दत्तात्रेय की जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। शास्त्रानुसार इस तिथि को भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों देवताओं की परम शक्ति जब केंद्रित हुई, तब दत्तात्रेय भगवान का जन्म हुआ। शैवपंथी उन्हें शिव का अवतार और वैष्णव विष्णु अवतार मानते हैं। नाथ, महानुभव, वारकरी, रामदासी के उपासना पंथ में भी श्रीदत्त आराध्य देव हैं। माना गया है कि भक्त के स्मरण करते ही भगवान दत्तात्रेय उनकी हर समस्या का निदान कर देते हैं, इसलिए इन्हें स्मृति गामी भी कहा गया है। अपने भक्तों की रक्षा करना ही श्री दत्त का आनंदोत्सव है। अगहन पूर्णिमा को प्रदोषकाल में भगवान दत्त का जन्म होना माना गया है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं और इसलिए इन्हें परब्रह्ममूर्ति, सद्गुरु और श्री गुरुदेव दत्त भी कहा जाता है। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। विविध पुराणों और महाभारत में भी दत्तात्रेय की श्रेष्ठता का उल्लेख मिलता है। वे पालनकर्ता, त्राता और भक्त वत्सल हैं तो भक्ताभिमानी भी। वेदों को प्रतिष्ठा देने वाले महर्षि अत्रि और ऋषि कर्दम की कन्या अनुसूया के ब्रह्मकुल में जन्मे यह दत्तावतार अत्यंत क्षमाशील भी माने जाते हैं।

भारतीय भक्ति परंपरा के विकास में श्री गुरुदेव दत्त एक अनूठे अवतार हैं। रज-तम-सत्व जैसे त्रिगुणों, इच्छा-कर्म-ज्ञान तीन भावों और उत्पत्ति-स्थिति-लय के एकत्व के रूप में वे प्रतिष्ठित हैं। उनकी संपूर्णता के कारण ही शैव और वैष्णव दोनों उनकी आराधना करते हैं। तीन सिर, छह हाथ, शंख-चक्र-गदा-पद्म, त्रिशूल-डमरू-कमंडल, रुद्राक्षमाला, माथे पर भस्म, मस्तक पर जटाजूट, एकमुखी और चतुर्भुज या षड्भुज, इन सभी रूपों में श्री गुरुदेव दत्त की उपासना की जाती है। मान्यता यह भी है कि दत्तात्रेय ने परशुरामजी को श्री विद्या-मंत्र प्रदान किया था। शिवपुत्र कार्तिकेय को उन्होंने अनेक विद्याएं दी थीं। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें श्रेष्ठ राजा बनाने का श्रेय भी भगवान दत्तात्रेय को ही है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में इन्हीं के नाम से एक दत्त संप्रदाय भी है। मान्यता है कि दत्तात्रेय नित्य प्रातःकाल काशी की गंगाजी में स्नान करते थे। इसी कारण काशी के मणिकर्णिका घाट की दत्त पादुका दत्त भक्तों के लिए पूजनीय है। इसके अलावा मुख्य पादुका स्थान कर्नाटक के बेलगाम में स्थित है। दत्तात्रेय को गुरु रूप में मान उनकी पादुका को नमन किया जाता है। गिरनार क्षेत्र दत्तात्रेय भगवान की सिद्धपीठ है, इनकी गुरुचरण पादुकाएं वाराणसी तथा आबू पर्वत आदि कई स्थानों पर हैं।श्री गुरुदेव दत्त, भक्त की इसी भक्ति से प्रसन्न होकर स्मरण करने पर समस्त विपदाओं से रक्षा करते हैं। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना जाता है। यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था। आदि शंकराचार्य के अनुसार समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक सुखों, आरोग्य, वैभव, सत्ता, संपत्ति-सभी कुछ मिलने के बाद यदि मन गुरुपद की शरण नहीं गया तो फिर क्या पाया। दत्तात्रेय भगवान का रूप तथा उनका परिवार भी आध्यात्मिक संदेश देता है, उनका भिक्षुक रूप अहंकार के नाश का प्रतीक है। कंधे पर झोली, मधुमक्खी के समान मधु एकत्र करने का संदेश देती है। उनके साथ खड़ी गाय, कामधेनु है जो कि पृथ्वी का प्रतीक है। चार कुत्ते, चारों वेदों के प्रतीक माने गए हैं। औदुंबर अर्थात गूलर वृक्ष भगवान दत्तात्रेय का सर्वाधिक पूजनीय रूप है। इसी वृक्ष में दत्त तत्त्व अधिक है। भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है और तीनों ईश्वरीय शक्तियों से समाहित महाराज दत्तात्रेय की साधना अत्यंत ही सफल और शीघ्र फल देने वाली है। महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी, अवधूत और दिगंबर रहे थे। वे सर्वव्यापी हैं और किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी से भक्त की सुध लेने वाले है।

भगवान दत्तात्रेय का स्वरूप विभिन्न भारतीय चिंतनधाराओं, दर्शनों और संप्रदायों का संश्लेषण है। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो भगवान दत्तात्रेय के व्यक्तित्व में विरोधाभास रखने वाली विभिन्न चिंतनधाराएं समाहित हो जाती हैं। इसी कारण उनके व्यक्तित्व में हमें समग्र भारतीय के दर्शन होते हैं। भगवान दत्तात्रेय भक्तों पर जल्दी ही खुश हो जाते हैं। वह भक्ति करने वालों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। भक्त उन्हें स्मरण करके भौतिक सुख, आरोग्य, वैभव, संपत्ति व शांति प्राप्त कर सकते हैं। वह आध्यात्मिक सुखों को प्रदान करने वाले भी हैं। अलग-अलग जगहों पर उन्हें अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है। वह भक्त-वत्सल हैं और हर संकट में भक्तों की रक्षा करते हैं। वह जल्द ही भक्तों के वश में हो जाते हैं। उनका स्वभाव विनम्रता से परिपूर्ण है। उनकी साधना से कोई भी ऐसा भक्त नहीं बचता, जिसे फल न मिलता हो। वह समस्तों सुखों के प्रदाता हैं। भौतिक के साथ-साथ आध्यात्मिक सुख देने वाले इन भगवान की साधना का शास्त्रों में बड़ा महत्त्व बताया गया है।

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