आत्मा की परिपूर्णता

श्रीराम शर्मा

आत्मा की परिपूर्णता प्राप्त कर परमात्मा में प्रतिष्ठित होने के दो मार्ग हैं। एक प्रयत्न पूर्वक प्राप्त करना और दूसरा अपने आपको सौंप देना। प्रथम मार्ग में विभिन्न साधनाएं करनी पड़ती हैं, चिंतन, मनन, ज्ञान के द्वारा विभिन्न उपक्रमों में सचेष्ट रहना पड़ता है। दूसरी ओर संपूर्ण भाव से परमात्मा के प्रति समर्पण करना पड़ता है। तरह-तरह की साधनाएं, विधि-विधानों का अवलंबन लेकर प्रयत्न पूर्वक ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा रखने वाले बहुत मिल सकते हैं, किंतु संपूर्ण भाव से अपने परमदेव के समर्पण हो जाने वाले, जीवन में सर्वत्र ही परमात्मा को प्रतिष्ठित करने वाले, अपनी समस्त बागडोर प्रभु के हाथों सौंप कर उसकी इच्छानुसार संसार के महाभारत में लड़ने वाले अर्जुन विरले ही होते हैं। अर्जुन स्वयं एक नैष्ठिक साधक, दृढ़व्रती थे। जीवन में कठोर साधनाओं और तपश्चर्याओं के द्वारा उन्होंने अनेकों उत्कृष्ट सफलताएं अर्जित की थीं। किंतु इन सबके बावजूद रणक्षेत्र में हुए विषाद, खिन्नता को वे शांत न कर सके, न अपने कर्त्तव्य का निर्धारण ही। मोह और विषाद से खिन्नमना अर्जुन अंत में भगवनान के चरणों में गिरकर कहने लगे।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढ़चेताः।

यच्छेयः स्यानिश्चितं बू्रहि तन्मे, शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम।।

अर्थात- हे प्रभो! कायरता रूपी आंतरिक दोष के द्वारा मेरा साहसिक स्वभाव आहत हो गया। मैं धर्म सम्मूढ़ (धर्म के बारे में संशय की स्थिति में) हूं। मैं आपकी शरण में आया आपका शिष्य हूं। जिसमें मेरा निश्चित रूप से हित है, वह मुझे बताइए। महान विचारक संत कबीर ने कहा है।

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।

तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर।।

जीवनभर की साधना, साधु संगति, उपासना, ज्ञानार्जन के बावजूद संत कबीर अपने आप में संतुष्ट नहीं हुए। अंत में अपने समस्त जीवन को प्रभु समर्पण करने में ही उनको जीवन का संतोष लाभ मिला।  प्रभु प्राप्ति की प्रमुख बाधा विभिन्न साधनाओं, व्रत, तपश्चर्याओं में अपनी शक्ति का परिचय देकर अपनी साधना का हिसाब लगाने वाले साधकों में एक प्रकार का विशेष सात्विक अहंकार पैदा हो जाता है और यही एक दीवार बनकर आत्मा और परमात्मा के बीच अवरोध खड़ा कर देता है। इसे ही शास्त्रकारों ने  ज्ञानजन्य अंधकार कहा है। यही कारण है कि ज्ञानी, ध्यानी, तपस्वी, सिद्ध, योगी बनना दूसरी बात है, किंतु संपूर्ण भाव से परमात्मा की उपलब्धि करना, उसमें प्रतिष्ठित होना सर्वथा भिन्न है। विभिन्न साधनाओं के रहते भी अपने समस्त कर्त्तव्य, अहंकार, निजत्व की भावनाओं को मिटाकर समस्त जीवन को प्रभु चरणों में समर्पण किए बिना परमात्मा में प्रतिष्ठित होना संभव नहीं है। समर्पण की कसौटी परमात्मा से साक्षात्कार, उनमें प्रतिष्ठित होने का सरल और सहज मार्ग है अपनी शक्ति सामर्थ्य, कर्त्तव्य के अभिमान का त्याग करना और संपूर्ण भाव से परमात्मा को अपने आप का निवेदन समर्पण करना। तब सर्वत्र ही सबके साथ समानता, नम्रता, उदारता आत्मीयता का संबंध बढ़ता जाता है।

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