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ऋतु परिवर्तन का उल्लास है लोहड़ी

लोहड़ी शब्द लोही से बना है, जिसका अभिप्राय है वर्षा होना व फसलों का फूटना। एक लोकोक्ति है कि अगर लोहड़ी के समय वर्षा न हो तो खेती का नुकसान होता है। इस तरह यह त्योहार बुनियादी तौर पर मौसम के बदलाव तथा फसलों के बढ़ने से जुड़ा है…

अधिकांश भारतीय त्योहार मौसम में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों की संधि बेला पर पड़ते हैं। इस तरह से देखें तो पर्व-त्योहार परिवर्तन का सकारात्मक ढंग से स्वागत करने का आयोजन हैं। लोहड़ी और मकर संक्रांति ऋतु परिवर्तन से संबंधित उत्सव हैं। लोहड़ी शब्द लोही से बना है, जिसका अभिप्राय है वर्षा होना व फसलों का फूटना। एक लोकोक्ति है कि अगर लोहड़ी के समय वर्षा न हो तो खेती का नुकसान होता है। इस तरह यह त्योहार बुनियादी तौर पर मौसम के बदलाव तथा फसलों के बढ़ने से जुड़ा है। इस समय तक किसान हाड़ कंपाने वाली सर्दी में अपने जुताई-बुवाई जैसे सारे फसली काम कर चुके होते हैं। अब सिर्फ फसलों के बढ़ने और उनके पकने का इंतजार करना होता है। इसी समय से सर्दी भी घटने लगती है। इसलिए किसान इस त्योहार के माध्यम से इस सुखद, आशाओं से भरी परिस्थितियों का आयोजन करते हैं। लोहड़ी माघ महीने की संक्रांति से पहली रात को मनाई जाती है। किसान सर्द ऋतु की फसलें बोकर आराम फरमाता है। इस दिन प्रत्येक घर में मूंगफली, रेवडि़यां, चिवड़े, गजक, भुग्गा, तिलचैली, मक्की के भुने दाने, गुड़, फल इत्यादि खाने और बांटने के लिए रखे जाते हैं। गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है और उसे दही के साथ खाया जाता है। ये सारी चीजें इसी मौसम की उपज होती हैं और अपनी तासीर से शरीर को गर्मी पहुंचाती हैं। इस दिन लोग घरों के आंगनों, संस्थाओं, गलियों, मोहल्लों, बाजारों में खड़ी लकडि़यों के ढेर बना कर या उपलों का ढेर बना कर उसकी आग जलाते हैं और उसे सेंकने का लुत्फ लेते हैं। चारों ओर बिखरी सर्दी तथा रुई की भांति फैली धुंध में आग सेंकने और उसके चारों ओर नाचने-गाने का अपना ही आनंद होता है। लोग इस आग में भी तिल इत्यादि फेंकते हैं। घरों में पूरा परिवार बैठकर हर्ष की अभिव्यक्ति के लिए गीत गायन करता है। देर रात तक ढोलक की आवाज, ढोल के फड़कते ताल, गिद्दों-भंगड़ों की धमक तथा गीतों की आवाज सुनाई देती रहती है। रिश्तों की सुरभि तथा आपसी प्यार का नजारा चारों ओर देखने को मिलता है। इस त्योहार से कुछ दंतकथाएं भी आ जुड़ी हैं। एक कहानी यह है कि दुल्ला भट्टी नाम का एक मशहूर डाकू था। उसने एक निर्धन ब्राह्मण की दो बेटियों -सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उनकी शादियां कीं तथा उनकी झोली में शक्कर डाली। इसका एक संदेश यह है कि डाकू होकर भी उसने निर्धन लड़कियों के लिए पिता का फर्ज निभाया। दूसरा संदेश यह है कि यह इतनी खुशी और उमंग से भरा त्योहार है कि कोई चोर-डकैत जैसा भी अपनी गलत आदतें छोड़ कर दूसरों की खुशी के लिए आगे बढ़ कर आ जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार लोहड़ी पर्व के नाम के विषय में भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार मकर संक्रांति की तैयारी में सभी गोकुलवासी लगे थे। इसी समय कंस ने लोहिता नामक राक्षसी को भगवान श्रीकृष्ण को मारने के लिए भेजा, लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता के प्राण हर लिए। इस उपलक्ष्य में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। लोहिता के प्राण हरण की घटना को याद रखने के लिए इस पर्व का नाम लोहड़ी रखा गया। लोहड़ी के दूसरे दिन माघी का पवित्र त्योहार मनाया जाता है। यह मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। माघ माह को शुभ समझा जाता है। इस मौसम में चावल की खिचड़ी, सरसों का साग, मक्की की रोटी और मक्खन खाने का भी रिवाज है, जो शरीर की अनुकूलता से संबंधित है।

खिचड़ी का रोचक इतिहास

खिचड़ी को पूरे देश में लोग पसंद करते हैं। कहीं-कहीं खिचड़ी को लेकर कई प्रथाएं भी हैं। आपको बताते हैं कि एक ऐसी जगह है जहां पर खिचड़ी सिर्फ एक व्यंजन ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। वह जगह छत्तीसगढ़ है। यहां साल के सबसे बड़े त्योहार दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर खिचड़ी बनाने की परंपरा है। छत्तीसगढ़ में इस दिन हर घर में खिचड़ी बनती है। खास बात यह है कि इस दिन खिचड़ी रोजाना की तरह सामान्य नहीं, बल्कि विशेष विधि से बनाई जाती है। इसमें चावल, दाल, हल्दी, नमक के साथ-साथ सब्जी और आटे का भी इस्तेमाल किया जाता है। छत्तीसगढ़ में गोवर्धन पूजा के दिन बनाई जाने वाली खिचड़ी की एक और खास बात है कि इसमें फसल के खाद्य पदार्थ भी इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे कि इसमें नए धान का चावल, नए गेहूं का आटा, सीजनल सब्जियां-अरबी, जिमीकंद व अन्य का उपयोग खिचड़ी बनाने में किया जाता है। इस दिन की बनी खिचड़ी का पहला भोग गाय को लगता है। जानकारों की मानें तो छत्तीसगढ़ में खिचड़ी को लेकर विशेष आस्था है। गोवर्धन पूजा के दिन गायों को खिचड़ी खिलाने की परंपरा सालों से चल रही है। ऐसा माना जाता है कि शनिवार को खिचड़ी खाने से ग्रह दोष खत्म होता है। खिचड़ी मुख्य रूप से बंगाल, बिहार, हरियाणा, झारखंड, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडि़शा में बड़े ही चाव से खाई जाती है। ऐसा बिलकुल नहीं कि खिचड़ी सिर्फ इन्हीं राज्यों तक सीमित है, बल्कि यह देश के हर कोने में बनती है। सर्दी में तो अक्सर इसे हर घर में बनाया ही जाता है। खिचड़ी साउथ एशिया की एक ऐसी डिश है जिसे चावल और दाल के साथ मिलाकर पकाया जाता है। इसे कई जगहों पर बाजरा और मूंग दाल के साथ भी पकाया जाता है। खिचड़ी ही वह डिश है जिसे हर बच्चे को आसानी से यानी बिना किसी दिक्कत के खिलाया जा सकता है और इसी वजह से इसे फर्स्ट सॉलिड बेबी फूड भी कहा जाता है। खिचड़ी केवल चावल की ही नहीं, बल्कि व्रत के दौरान यह साबूदाने से भी बनाई जाती है।

इन चीजों से बनती है टेस्टी खिचड़ी

खिचड़ी को आलू, हरी मटर और फूलगोभी के साथ बनाया जाता है और महाराष्ट्र में तो इसे प्राउन के साथ बनाया जाता है। कहते हैं कि खिचड़ी अपने चार यार यानी दही, पापड़, घी और अचार के साथ बहुत ही स्वादिष्ट लगती है।

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