गोलमेज सम्मेलन का आयोजन

भारत का इतिहास

गतांक से आगे…

31 अक्तूबर, 1929 को वायसराय लार्ड इर्विन ने घोषणा की कि साइमन आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद, भारत की सांविधानिक समस्या पर विचार करने के लिए एक गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा, जिसमें ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे। यह सम्मेलन भारत के भावी संविधान के बारे में विभिन्न वर्गों की अधिकतम सहमति प्राप्त करने का प्रयास करेगा। 1929-32 लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन हुए। इन सम्मेलनों के फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने कुछ विस्तृत  सुझाव प्रस्तुत किए, जो मार्च 1933 में एक श्वेतपत्र में प्रकाशित किए गए। ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों की  एक संयुक्त समिति ने श्वेतपत्र की योजना का  परीक्षण किया और कुछ परिवर्तनों के साथ उन्हें  स्वीकार किया। संसद ने यह संशोघित योजना 1935 के भारतीय शासन अधिनियम के रूप में पास की। जहां तक भारत के इस दावे का संबंध था कि उसे अपने संविधान को बनाने का अधिकार मिलना चाहिए, संसदीय संयुक्त समिति ने कहा कि भारतीयों को सविधान बनाने का अधिकार देना इस समय व्यावहारिक नहीं है। 1935 के अधिनियम की धारा 110 में यह भी कहा गया था कि भारत के संघीय और प्रांतीय विधानमंडलों को स्वतः संविधान में संशोधन करने का अधिकार न होगा। 1934 में स्वराज्य पार्टी ने आत्म-निर्णय के अधिकार की मांग की और एक प्रस्ताव द्वारा घोषणा की कि आत्म निर्णय के अधिकार को क्रियान्वित करने का एकमात्र उपाय देश का संविधान बनाने के लिए भारतीय प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा बुलाना होगा। कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया और कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने जून 1934 में, श्वेतपत्र के संबंध में एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें कहा गया था कि श्वेतपत्र का एकमात्र संतोषजनक विकल्प यह होगा कि वयस्त मताधिकार के आधार पर निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधि की संविधान सभा एक संविधान का निर्माण करे। भारत की ओर से संविधान सभा की मांग निश्चित रूप से प्रस्तुत करने का यह पहला अवसर था। इसके बाद यह मांग बार-बार और आधिकारिक आग्रहपूर्वक प्रस्तुत की जाती रही है। अप्रैल 1936 के लखनऊ अधिवेशन तथा दिसंबर 1939 के फैजपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने प्रस्ताव पास करके 1935 के अधिनियम को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया और कहा कि  कांग्रेस भारत में एक ऐसे सच्चे लोकतंत्रात्मक राज्य की स्थापना करना चाहती है, जिसमें राजनीतिक शक्ति समूची जनता को हस्तांतरित कर दी गई हो और सरकार  उसके कारगर नियंत्रण में हो। इस तरह का राज्य केवल ऐसी संविधान सभा द्वारा ही उत्पन्न हो सकता था, जो मताधिकार द्वारा निर्वाचित की गई और  जिसे  देश के लिए संविधान बनाने का अंतिम अधिकार है।

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