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जो हरि जपे, हरि का हो जाए

धन-धन श्री गुरु रविदास महाराज जी की महिमा अपरंपार है। उन्होंने जात-पात से ऊपर उठकर चार वर्णों  को साझा नाम का उपदेश दिया। गुरु रविदास महाराज जी ने ऊंची जात के अहंकारी लोगों को समझाया कि जब हमारा पिता परमेश्वर एक है, तो हम आपस में जात मजहब के नाम पर क्यों झगड़ा कर रहे हैं। हम सब भी भाई-भाई हैं। गुरु जी समझाते हैं कि सूर्य की कोई जात नहीं है वह सभी को एक समान रोशनी देता है, हवा सभी को एक समान आक्सीजन देती है, तो हम सब जात-पात के नाम पर क्यों भेदभाव करते हैं। उस परम पिता परमेश्वर ने मानव जाति को जन्म दिया है, हिंदू, सिख, ईसाई, मुस्लमान तो हम सब बाद में बने हैं। यह धर्म इनसान ने पैदा किए हैं। अगर हम सब धर्मों में उलझेंगे या धर्मों के नाम पर झगड़े करेंगे, तो हम कभी भी परमपिता परमेश्वर आदि पुरख की खुशी हासिल नहीं कर सकते। वो परमात्मा हमसे कभी खुश नहीं होगा। श्री गुरु आदि प्रगाश ग्रंथ जी की पवित्र वाणी में फरमान करते हैं कि सबसे ऊंचा धर्म है मानवता की सेवा करना, आदि पुरख की बनाई सृष्टि से प्रेम करना। परमात्मा के दरबार में कोई भी हिंदु, मुस्लिम, सिख या ईसाई या अमीर-गरीब नहीं पूछा जाएगा वहां तो सिर्फ  कर्मों के मुताबिक हिसाब-किताब होगा। तो हम क्यों धर्मों के नाम पर झगड़ा कर रहे हैं। परमपिता परमेश्वर तो प्रेम का भूखा है, जैसे पानी कहीं ऊंची जगह नहीं टिकता वो भी नीची जगह को ही आता है, उसी तरह परमात्मा भी ऊंची जात या पैसे के अहंकारी लोगों के पास नहीं जाता। वह तो चाहे कोई गरीब या नीची कही जाने वाली जाति से हो, परमात्मा से प्रेम करता हो, तो वह दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति है। गुरु जी श्लोक में फरमान करते हैं।

’भक्ति करे गरीब बन जाऊ लखा दा’

’जुल्मी अहंकारी शहनशाह कखां दा’।।

श्री कृष्ण जी ने भी कहा कि मुझे भक्ति प्यारी है, जाति प्यारी नहीं। जो प्राणी अपने बुरे कर्म, ऊंची जाति के अहंकार को त्याग कर परमात्मा का सिमरन करता है, वही मेरा प्यारा भक्त है। ब्राह्मण के घर में जन्म लेने से कोई ऊंचा या शुद्र के घर में जन्म लेने से कोई नीचा नहीं बनता। व्यक्ति अपने कर्मों से अच्छा या बुरा होता है। श्री राम चंद्र जी जब माता शबरी जो भील जाति की थी, उसे मिलने के लिए गए, तो जैसे ही माता शबरी को पता चला कि श्री राम चंद्र जी आ रहे हैं, तो वह बड़ी ही प्रेम भावना से श्रीराम चंद्र जी के लिए बेर तोड़ने लगी। पहले बेर तोड़कर खुद चखकर देखती कि कौन सा बेर मीठा या खट्टा है, जो बेर मीठे वो एक तरफ  रखती रही, जो बेर खट्टे थे, वो फेंकती रही। तो श्री राम चंद्र जब आए तो माता शबरी बहुत खुश हुईं और माता शबरी ने वह जूठे बेर श्री राम चंद्र जी को खाने को दिए और श्री राम चंद्र जी ने भी बड़े प्रेम से उन बेरों को खाया। क्योंकि उन्होंने माता शबरी की प्रेम, भावना देखी और वह बहुत खुश हुए। सतगुरु स्वामी ईशर दास महाराज जी श्री गुरु आदि प्रगाश ग्रंथ जी के सफा नं 920 पर यह शब्द राग कलंगडा में दर्ज किया है।

’शब्द कलगड़ा’

’जात अभिमानी मान अंहकारी हरि न पाएयो मूरखा’। ’लख लख चाहे तीर्थ नहावे। लख लख चाहे गुरु बनावे।’ ’जे मान हंकार न जावे’ए ’हरि न देखे सूरता’

’लख करोड़ी पढे़  किताबा’। ’निस दिन गावे भजन रागा’। ’ठाकर पुजे मूरता’

’तपो बनवे तप करे। पुठा हो हो के मरे’। ’पंज शब्द सिमरन करे, ध्यान धरे धूरता’

’त्रिलोचन ठाकर चिर पूजे। धन्ने मान गवा हरि सूजे’। ’बिपर कोल खड़ा ना बूझे, ईको जेहीया सूरता’

’जाति अभिमानी करदे पूजा। हरि न पाईयो भाऊ रख दूजा’। ’नामे धक्के दे हरि सूझा, घूम गईया मूरता’ ’कैरो रावण जड़ पटाई। पढ़ो वेद मान कर गवाई’। ’आजज भोलेया ने हरि पाईए ईशरदास कहे नूरता’

सोंह जै गुरुदेव जी।

वाणी श्री गुरु आदि प्रगाश  ग्रंथ जी से।

–  दास – दीप बिंजी

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