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देवीकूप भ्रदकाली शक्तिपीठ

जहां-जहां देवी सती के शरीर के भाग गिरे थे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। यहां पर देवी सती का दायां पैर गिरा था। इतना ही नहीं इस जगह का खास संबंध भगवान श्रीकृष्ण और महाभारत के युद्ध से भी माना जाता है।  इस मंदिर ने भी महाभारत काल के युद्ध में अहम भूमिका निभाई…

भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके इतिहास और पौराणिक महत्त्व की वजह से आज भी श्रद्धालुओं में इन मंदिरों के प्रति गहरी आस्था है। ऐसा ही एक मंदिर है हरियाणा के प्रसिद्ध स्थल कुरुक्षेत्र में। वामन पुराण व बह्मपुराण आदि ग्रंथों में कुरुक्षेत्र के सदंर्भ में चार कूपों का वर्णन आता है। जिसमें चंद्र कूप, विष्णु कूप, रुद्र कूप व देवी कूप हैं। कुरुक्षेत्र में हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ देवीकूप भद्रकाली स्थापित है। श्रीदेवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ का इतिहास दक्षकुमारी सती से जुड़ा हुआ है। यह देवी सती के 52 शक्तिपीठों में से एक है। शिव पुराण में इसका वर्णन मिलता है कि एक बार सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सती व उसके पति के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों को बुलाया गया। जब सती को इस बात का पता चला तो वह अनुचरों के साथ पिता के घर पहुंची। तो वहां भी दक्ष ने उसका किसी प्रकार से आदर नहीं किया और क्रोध में आ कर शिव की निंदा करने लगे। सती अपने पति का अपमान सहन न कर पाई और स्वयं को हवन कुंड में होम कर डाला। देवी सती के आत्मदाह के बाद जब भगवान शिव देवी सती की देह लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे, तो भगवान विष्णु ने देवी सती के प्रति भगवान शिव का मोह तोड़ने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 हिस्सों में बांट दिया था। जहां-जहां देवी सती के शरीर के भाग गिरे थे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। यहां पर देवी सती का दायां पैर गिरा था। इतना ही नहीं इस जगह का खास संबंध भगवान श्रीकृष्ण और महाभारत के युद्ध से भी माना जाता है। इस मंदिर ने भी महाभारत काल के युद्ध में अहम भूमिका निभाई है। इस मंदिर का पौराणिक महत्त्व है। रक्षाबंधन के दिन श्रद्धालु अपनी रक्षा का भार माता को सौंप कर रक्षा सूत्र बांधते हैं। मान्यता है कि इससे उनकी सुरक्षा होती है। यहां चैत्र व आश्विन के नवरात्र बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।

यहां हुआ था श्रीकृष्ण का मुंडन-

इस जगह का संबंध सिर्फ  देवी सती से ही नहीं भगवान कृष्ण से भी माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का (मुंडन) इसी स्थान पर किया गया था। इसलिए यहां पर लोग अपने बच्चों के मुंडन कराते है। जिसके कारण इस जगह का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है।

महाभारत से पहले अर्जुन ने की थी पूजा

मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध से पहले जीत के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यहीं पर मां भद्रकाली की पूजा करने को कहा था। श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने देवी की पूजा-अर्चना की थी और युद्ध में जीतने के बाद घोड़ा चढ़ाने का प्रण लिया था। तभी से यहां पर अपनी मन्नत पूरी होने पर सोने, चांदी व मिट्टी के घोड़े चढ़ाने की  परंपरा प्रचलित है।

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