लोहड़ी और खिचड़ी के पकवान

मूंगफली, गजक… और भी बहुत कुछ

लोहड़ी की पवित्र अग्नि में रेवड़ी, तिल, मूंगफली, गुड़ व गजक भी अर्पित किए जाते हैं। इस तरह से लोग सूर्यदेव और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करते हैं, क्योंकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत होती है। सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है कि आने वाले साल में भी कृषि उन्नत हो और घर अन्न-धन से भरा रहे। हिंदू शास्त्रों की मान्यता है कि अग्नि में समर्पित की गई सामग्री यज्ञ भाग बनकर देवताओं तक पहुंच जाती है। लोहड़ी पर पूजा के बाद गजक, गुड़, मूंगफली, फुलियां का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस दिन मक्की की रोटी और सरसों का साग बनाने की परंपरा है। मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा रही है। देश के अलग-अलग भागों में अलग-अलग ढंग से खिचड़ी बनाई जाती है। मूंग, चावल, अदरक, कालीमिर्च, सेंधा नमक जैसे खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग ढंग से खिचड़ी बनाई जाती है। इसके अतिरिक्त लोहड़ी और खिचड़ी के पर्व में तिलयुक्त विभिन्न पकवानों को बनाने की परंपरा रही है। आयुर्वेद के अनुसार इस मौसम में खिचड़ी और तिल का सेवन विशेष लाभप्रद होता है। अगर माघी की बात करें तो यह मेला अनेक शहरों में मनाया जाता है, खास कर मुक्तसर (पंजाब) में। माघ से लेकर बाद का छह माह का समय उत्तरायण कहलाता है, जिसमें ब्रह्मा को जानने वाले लोग प्राणों का त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। प्रयाग तीर्थ में महात्मा लोग कल्पवास करते हैं। इस दिन खिचड़ी खाने की विशेष परंपरा होती है, संभवतः इसी कारण मध्य भारत में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व के दौरान किसान यह कह कर सूर्य भगवान का आभार व्यक्त करते हैं कि उनकी गर्मी से अच्छी फसल हुई। इसीलिए इस पर्व का संबंध सूर्य से माना जाता है। माना जाता है कि लोहड़ी के अगले दिन से सूर्य मकर राशि यानी उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है, इसे उत्तरायण कहा जाता है। पवित्र अग्नि में लोग रवि फसलों को अर्पित करते हैं क्योंकि इस समय रवि फसलें कटकर घर आने लगती हैं। हिंदू शास्त्रों की मान्यता है कि, अग्नि में समर्पित की गई सामग्री यज्ञ भाग बनकर देवताओं तक पहुंच जाती है। लोहड़ी की पवित्र अग्नि में रेवड़ी, तिल, मूंगफली, गुड़ व गजक भी अर्पित किए जाते हैं। इस तरह से लोग सूर्य देव और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत होती है। सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है कि आने वाले साल में भी कृषि उन्नत हो और घर अन्न-धन से भरा रहे। ऐसी मान्यता है कि बाबा गोरखनाथ ने खिचड़ी बनाने की कला लोगों को सिखलाई थी। कहते हैं कि जब अलाउद्दीन खिलजी ने भारत पर आक्रमण किया तो उस समय नाथ योगी उसका डट कर मुकाबला कर रहे थे। उससे जूझते-जूझते वह इतना थक जाते कि उन्हें भोजन पकाने का समय ही नहीं मिल पाता था। इससे उन्हें भूखे रहना पड़ता और वह दिन-ब-दिन कमजोर होते जा रहे थे। एक दिन अपने योगियों की कमजोरी को दूर करने लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एकत्र कर पकाने को कहा। देखते ही देखते एक ऐसा व्यंजन तैयार हुआ जो झट से पक भी गया और खाने में स्वादिष्ट भी था। इतना ही नहीं, इसे खाने से नाथ योगी अपने भीतर ऊर्जा को महसूस कर पा रहे थे। अपने इस सफल प्रयोग को देखते हुए बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम ‘खिचड़ी’ रखा। आज भी गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ के मंदिर के समीप मकर संक्रांति के दिन से खिचड़ी मेला शुरू होता है। बाबा गोरखनाथ का यह खिचड़ी मेला बहुत दिनों तक चलता है और इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग अर्पित किया जाता है और भक्तों को प्रसाद रूप में दिया जाता है। अब बात करते हैं कि लोहड़ी व मकर संक्रांति भिन्न-भिन्न प्रांतों में किस तरह मनाई जाती हैं। लोहड़ी के लिए पंजाब प्रांत सबसे मशहूर माना जाता है। अच्छी फसल होने की खुशी में ढोल-नगाड़ों पर झूमते पुरुष और रंग-बिरंगे दुपट्टे लहराते हुए गिद्दा करती महिलाएं भारत की सांस्कृतिक विविधता में चार चांद लगा देती हैं। दूसरी ओर तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल, असम में बीहू, आंध्र प्रदेश में भोगी तथा कर्नाटक, बिहार और उत्तर प्रदेश में इसे संक्रांति कहा जाता है। पंजाब व हिमाचल में इस त्योहार को जो खिचड़ी बनाई जाती है, उसमें हरे मूंग, कालीमिर्च व अदरक का भी प्रयोग होता है।

लोहड़ी पर लड़कियों को उपहार

लोहड़ी के मौके पर कन्या के मायके से लड़की की मां कपड़े, मिठाइयां, गजक, रेवड़ी अपनी बेटी के लिए भेजती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। माना जाता है कि जब दक्ष प्रजापति ने अपने दामाद भगवान शिव का अपमान किया और पुत्री सती का निरादर किया तो क्रोधित सती ने आत्मदाह कर लिया। इसके बाद दक्ष को इसका बड़ा दंड भुगतना पड़ा। दक्ष की गलती को सुधारने के लिए ही माताएं लोहड़ी के मौके पर पुत्री को उपहार देकर दक्ष द्वारा किए अपराध का प्रायश्चित करती हैं। लोहड़ी के मौके पर होलिका दहन की तरह लकडि़यों एवं उपलों का ढेर बनाया जाता है। शाम के समय लकडि़यों को जलाकर सभी लोग आग के चारों ओर नाचते-गाते हैं। माताएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर लोहड़ी की आग तापती हैं। उनका मानना है कि इस आग से बच्चों का स्वास्थ्य सबसे बढि़या रहता है।

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