विष्णु पुराण

चाक्षुष का विवाह वरुण कुलात्पन्न महात्मा धीरण प्रजापति की पुत्री से हुआ, उनसे तनु की उत्पत्ति हुई। तपस्वी मनु ने वेराज प्रजापति की पुत्री नडेवाला से दस अत्यंत तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके कुरु, शतद्युम्न, तपस्वी सत्यवान शुचि, अग्निष्टो, अतिरात्र, सुद्यम्न, एवं अभिमन्यु नाम हुए…

अभिमन्युश्च दशमी नड्वलायां महौजसः।

कुरोरजनयत्पुत्रान् षडाग्यी महाप्रभान्।।

अङ्ग सुमनस ख्याति क्रुतुसगिरनं शिविम्।

अङ्गात्सुथीथपत्यं र्वे वेनमेकतजायत।।

श्री पराशरजी ने कहा हे मैत्रेजी, ध्रुव से शिष्टि और भव्य का जन्म हुआ भव्य का पुत्र शंभू हुआ और शिष्टि की भार्या ने रिपु, रिपुंजय, विप्र बृकल और वुदतेजा नामक पांच पुत्रों को जन्म दिया। उनमें से रिपु ने अपनी भार्या बृहती नाम की भार्य से महतेजस्वी चाक्षुष नामक पुत्र उत्पन्न किया। चाक्षुष का विवाह वरुण कुलात्पन्न महात्मा धीरण प्रजापति की पुत्री से हुआ, उनसे तनु की उत्पत्ति हुई। तपस्वी मनु ने वेराज प्रजापति की पुत्री नडेवाला से दस अत्यंत तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके कुरु, शतद्युम्न, तपस्वी सत्यवान शुचि, अग्निष्टो, अतिरात्र, सुद्यम्न, एव अभिषन्यु नाम हुए। कुरु ने अपनी भार्या आग्नेयी से अङ्ग, सुमना, ख्याति, क्रतु, आंगरा और शिव नामक छह अत्यंत प्रतापी पुत्र उत्पन्न किए। अंग ने सुनीथा के गर्भ से बेन नामक पुत्र उत्पन्न किया।

प्रजार्थमृषयस्तस्त ममायुदक्षिणां करम्।

वेनस्य पणौ मलिते सम्बभूव महामुने।।

वैन्यो नाम महीपालो य पृथुः परिकीर्त्तितः।

येनदुग्धा मही पूर्व प्रसानां हितका रणात्।।

किमर्थ मथितः पाणिवैनस्य परिमर्षिभिः।

यत्र यज्ञै महावीर्यः स पृथुर्मु निसत्तम।।

सुनीथा माम या कन्यामृत्योः प्रथमातोऽभवत्।

अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्या वेनो व्यजायत।।

स भातामहदोषेण तेन मृत्यः सुतात्मजः।

निसर्गादेस भैत्रेय दुष्ट एव व्यजयत।।

अभिषिक्ती यदा राज्ये स वेयः परर्षिभिः।

धोषयाताता सदा पृथिव्यां पृथिवी मतिः।।

न यष्टव्य न दातव्यं न होतव्यं कथश्चन।

भोक्ता यज्ञस्य करत्वन्या ह्यहं यज्ञपतिः प्रभु।।

ततस्तमृषयः पूर्व सम्पूज्य पृथिवीपतिम्।

ऊचः सामकल वाक्यं मैत्रेय समुपस्थिताः।।

उसी वेन के दक्षिण हाथ का ऋषियों ने सनातन के निमित्त मंथन किया था, जिसने वैन्य नामक एक पुत्र की उत्पत्ति हुई, यही राजा पृथु के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने प्रजा-पालन के निमित्त पृथ्वी का दोहन किया था।  श्री मैत्रेयजी ने कहा, हे मुनिसत्तम! उन महर्षियों ने बेन के हाथ का मंथन क्यों किया था तथा पराक्रमी पृथु का जन्म कैसे हुआ। श्री पराशरजी ने कहा, मृत्यु की मुनीसा नाम की प्रथम पुत्री अंग को व्याही गई थी। उसी से राजा बेनु उत्पन्न हुए थे। हे मैत्रेय जी! मृत्युसुता का वह पुत्र अपने नाना के स्वभाव-दोष के कारण ही दृषित स्वभाव का हुआ।  तब वह बेणु राज पर अभिषिक्त हुआ था। तभी उसने विश्व भर में यह घोषित कर दिया था कि मैं भगवान हूं। यज्ञ पुरुह और यज्ञ का भोक्त एवं स्वामी मैं ही हूं इसलिए अब कभी कोई भ मनुष्य दान और यज्ञादि न करे।  हे मैत्रेयजी! उस समय के महर्षिगण उस रोज धेनक समक्ष उपस्थित हुए और उन्होंने उसकी प्रशंसा करके  सांत्वना तथा मीठी वाणी से कहा।

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