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सामाजिक अंकेक्षण

किसी भी नीति, कार्यक्रम या योजना का वांछित परिणाम हो रहा है कि नहीं और उनका क्रियान्वयन सही प्रकार से हो रहा है या नहीं इसकी छानबीन यदि जनता स्वयं करे तो उसे सोशल ऑडिट कह सकते हैं। किसी भी कार्यक्रम अथवा क्रिया, जिसका संबंध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से समाज से होता है, के सामाजिक निष्पति के मूल्यांकन से संबंधित प्रक्रिया है। इसका प्रयोग किसी कार्य के प्राथमिक स्तर अर्थात उद्भव से लेकर क्रियान्वयन एवं उस क्रियान्वयन के दीर्घकाल तक के प्रभावों की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच और उस जांच में परिलक्षित कमियों में सुधार का परीक्षण, औचित्यता के साथ किया जाता है, ताकि समाज के हित में हर स्तर तक विकास हो सके। सामान्यतः सामाजिक लेखा में इस बात का लेखा-जोखा किया जाता है कि किसी संस्था के आर्थिक क्रियाकलापों का समाज एवं पर्यावरण पर क्या और कितना असर हुआ। प्रायः सामाजिक लेखा की बात किसी व्यापारिक या औद्योगिक प्रतिष्ठान के संदर्भ में की जाती है। सामाजिक लेखा, परंपरागत लेखा (विशेषकर वित्तीय लेखा से) से कई अर्थों में भिन्न है। परंपरागत लेखा में समाज और संस्था के परस्पर संबंधों एवं आदान-प्रदान को बहुत कम महत्त्व दिया जाता है। इसके विपरीत सामाजिक लेखा में लेखा की संकल्पना को अधिक विस्तृत कर दिया जाता है।  पूरे विश्व में आजकल प्रातिनिधिक प्रजातंत्र की सीमाओं को पहचानकर नीति निर्माण और क्रियान्वयन में आम जनता की सीधी भागीदारी की मांग जोर पकड़ रही है। साथ ही निगरानी के अन्य साधनों के साथ ही सामुदायिक निगरानी के विभिन्न साधनों के अनूठे प्रयोग हो रहे हैं। इनमें सरकारी खरीद और ठेकों की निगरानी, बजट के खर्चों की निगरानी, सामुदायिक अंक-पत्र द्वारा मूल्यांकन तथा सोशल ऑडिट शामिल हैं।

सोशल ऑडिट कैसे किया जाता है?

सर्वप्रथम ग्राम सभा एक सोशल ऑडिट समिति का चयन अपने बीच से करती है, जिसमें आवश्यकतानुसार पांच से 10 व्यक्ति हो सकते हैं। इस समिति को जिस कार्यक्रम या योजना की सोशल ऑडिटिंग करनी होती है, उससे संबंधित सभी दस्तावेज और सूचनाएं एकत्र करती है। उन दस्तावेजों की जांच-पड़ताल की जाती है तथा उनका मिलान किए गए कार्यों एवं लोगों के अनुभवों एवं विचारों के साथ किया जाता है। फिर एक रिपोर्ट बनाई जाती है, जिसे पूर्व निर्धारित तिथि को ग्राम सभा के समक्ष रखा जाता है। ग्राम सभा में सभी पक्ष उपस्थित होते हैं और अपनी बातें रखते हैं। यदि कहीं गड़बड़ी के प्रमाण मिलते हैं तो उनका दोष-निवारण किया जाता है। यदि ग्राम सभा में ही सभी मसलों को नहीं निपटाया जा सकता है तो उसे उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया जाता है। कार्यक्रम को और प्रभावी बनाने हेतु सुझाव भी ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा दिया जाता है। सोशल ऑडिट के लिए बुलाई गई ग्राम सभा की अनुशंसाओं को एक निश्चित अवधि के भीतर पालन किया जाता है और अगली ग्राम सभा में कार्रवाई का प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया जाता है।

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