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स्वप्नों का नया आंचल

नई  राह पर चलने का जोखिम हमेशा अकेले ही उठाना पड़ता है और ऐसा जोखिम उठाने का माद्दा कुछ विरले लोगों में ही होता है। इसके साथ यह भी उतना ही सच है कि भेड़चाल से अलग हटकर जो नई राह पर चलने का साहस दिखाते हैं, सफलता देर-सवेर उनके दरवाजे पर दस्तक देती ही है। हिमाचल की आंचल ठाकुर ने जब स्कीईंग में अंतरराष्ट्रीय पदक हासिल किया, तो बहुतों के लिए यह गर्व के साथ आश्चर्य का भी विषय था।

एक ऐसे देश में जहां स्कीईंग का नाम भी बहुत कम लोग जानते हैं, किसी खिलाड़ी द्वारा अंतरराष्ट्रीय पदक हासिल करना हैरान तो करता है। आंचल खुद बताती हैं कि भारत में इस खेल के प्रति जागरूकता के स्तर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकांश लोग स्कीईंग को स्काई कहकर अपना काम चला लेते हैं।

आंचल ने अल्पाइन एडर-3200 कप टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीता है। यह टूर्नामेंट तुर्की में अंतरराष्ट्रीय स्की फेडरेशन की ओर से आयोजित किया गया था। आंचल की सफलता पर पूरे देश का ध्यान इसलिए भी जल्दी गया,क्योंकि उनको इस शानदार सफलता पर बधाई देने वाले लोगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है। प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर कहा कि सुश्री ठाकुर की ऐतिहासिक उपलब्धि पर पूरा देश उत्साहित है। आंचल के अनुसार जब उन्होंने प्रधानमंत्री का ट्वीट देखा तो वह भावुक हो गईं और ट्वीट पढ़कर खुशी से चिल्लाने लगी।

आंचल के पिता रोशन ठाकुर खुद भी स्कीईंग में राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे हैं और विंटर गेम्स फेडरेशन ऑफ  इंडिया के महासचिव हैं। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को इस खेल में आने के लिए प्रोत्साहित किया। रोशन ठाकुर के अनुसार प्रधानमंत्री और खेल मंत्री ने ट्वीट कर आंचल को बधाई दी। यह एक सकारात्मक संकेत है और उम्मीद है कि यह शीतकालीन खेलों के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करेगा।

भारत में सुविधाओं की कमी के चलते आंचल के पिता ने उन्हें ट्रेनिंग के लिए विदेश भेजा। वह यूरोप, अमरीका, न्यूजीलैंड और कोरिया में ट्रेनिंग के लिए जाती रही हैं।

इस ट्रेनिंग का पूरा खर्चा आंचल के परिवार ने ही उठाया। स्कीईंग करते समय सुरक्षा के लिए पहने जाने वाले गियर की कीमत भी काफी ज्यादा होती है। स्कीईंग के पेयर ही 80 से 90 हजार के आते हैं, जबकि गियर समेत पूरा सामान सात से आठ लाख तक का आता है।

आंचल की सफलता भारतीय खेल परिदृश्य में आ रहे बडे़ बदलाव की ओर भी संकेत करती है। कबड्डी से लेकर स्कीईंग के क्षेत्र में मिलने वाली सफलताएं जिस तरह सुर्खियां बटोर रही हैं, उससे यह साबित होता है कि भारतीय समाज और मीडिया जगत अभी तक हाशिए पर माने जाने वाले खेलों को लेकर जागरूक हो रहा है। किसी एक खेल के मोह में फंसे रहने के बजाय युवा प्रतिभा नए खेलों को अपना रही है और सफलता के झंडे गाड़ रही है। सफलता और सम्मान अब किसी एक खेल का मोहताज नहीं रह गया है, आंचल की सफलता का चर्चा तो यही बताता है।

किसी ने नहीं सोचा था कि पदक जीतूंगी

आंचल कहती हैं कि किसी ने नहीं सोचा था कि मैं स्कीईंग में मेडल हासिल करूंगी, मैंने भी नहीं । भारत में कोई इस खेल के बारे में सोचता ही नहीं है। पदक देने के लिए जब मेरे नाम की घोषणा हुई तो तुर्की में लोग हैरान थे। कई लोगों ने मुझसे पूछा कि भारत में सच में बर्फ  पड़ती है। मैंने कहा बिलकुल बर्फ  पड़ती है, हमारे पास हिमालय है। आंचल को उम्मीद है कि उनके पदक लाने के बाद भारत में स्कीईंग के भी अच्छे दिन आएंगे और इस खेल के लिए मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। आंचल अब 2018 और 2022 में होने वाले ओलंपिक में खेलना चाहती हैं। वह माउंट एवरेस्ट पर स्कीइंग करने की भी ख्वाहिश रखती हैं।

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