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हरित क्रांति के कर्णधार एमएस स्वामीनाथन

वैज्ञानिक के रूप में एमएस स्वामीनाथन यानी मोनकोम्पू  सांबासिवन स्वामीनाथन को ‘हरित क्रांति’ का जनक कहा जाता है। स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त, 1925 को तमिलनाडु के कोम्बाकोनम गांव में हुआ था। पिता की मृत्यु के समय स्वामीनाथन केवल ग्यारह वर्ष के थे। पिता की मृत्यु के बाद उनका पालन-पोषण उनके चाचा के परिवार में हुआ, जो मद्रास यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक थे। स्वामीनाथन की शुरुआती शिक्षा ‘नेटिव हाई स्कूल’ में हुई, लेकिन जल्दी ही वह लिटिल फ्लावर कैथोलिक हाई स्कूल में भर्ती हो गए, जो उनके गांव कोम्बा में ही था। 1940 में स्वामीनाथन ने हाई स्कूल की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए वह अरनाकुलम के महाराजा कालेज में चले गए और वहां से उन्होंने जंतु विज्ञान में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। महायुद्ध के समय खाद्यान्न की कमी की जानकारी ने उन्हें प्रेरित किया था कि वह कृषि विज्ञान के क्षेत्र में जाए। इसलिए उन्होंने कोयंबटूर एग्रीकल्चर कालेज में प्रवेश लिया तथा कृषि विज्ञान में एक बार फिर से ग्रेजुएशन पूरा किया। कोयंबटूर एग्रीकल्चर कालेज की स्थापना 24 सितंबर, सन् 1906 में हुई। साल 1947 में स्वामीनाथन बतौर पोस्ट ग्रेजुएट छात्र दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीच्यूट में आए और उन्होंने 1949 में जैविकी तथा पौधशिल्प में ‘साइटो जिनेटिक्स’ में विशेष योग्यता लेते हुए पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री पाई। इसी के साथ स्वामीनाथन को यूनेस्को की फैलोशिप मिली। इस फैलोशिप के जरिए जो कि वैगेनिजन एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के इंस्टीच्यूट ऑफ  जिनेटिक्स नीदरलैण्ड द्वारा दी गई थी, स्वामीनाथन को अपने उसी संस्थान में आलू की जैविकी पर काम करने का मौका मिला और यहां इन्हें सफलता भी मिली । 1952 में पीएचडी की उपाधि प्र्राप्त की।

पुरस्कार :

स्वामीनाथन को कृषि क्षेत्र में बेहतर कार्यों के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया। जिनमें से मुख्य है-पद्मश्री(1967), पद्मभूषण ( 1972), पद्मविभूषण (1989 ), रमन मैग्सेसे (1971), ‘एलबर्ट आइंस्टीन वर्ल्ड साइंस’ (1986), ‘फोर फ्रीडम’ अवार्ड। हाल ही में स्वामीनाथन को कृषि बास्वा अवार्ड से नवाजा गया है।

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