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हर्षवर्धन के बाद कोई शक्तिशाली राजा नहीं हुआ

सम्राट हर्षवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात, विशेषतया उत्तरी भारत में, ऐसा कोई शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जो हिमालय सहित समस्त भारत को अक्षुण्ण बनाए रखता। फलस्वरूप भारत में अव्यवस्था एवं अराजकता फैलने लगी तथा तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा…

पूर्व मध्यकालीन हिमाचल

गुप्त संस्कृति के साथ-साथ कला की भी 5वीं शताब्दी से लेकर आठवीं शताब्दी तक हिमालय की इन घाटियों में बड़ा विकास हुआ और कई मंदिर तथा शिव, दुर्गा, गणेश, सूर्य तथा विष्णु की मूर्तियों का निर्माण हुआ। जैसा पहले लिखा जा चुका था कि समुद्रगुप्त से लेकर हर्ष के समय तक नेपाल, कुमाऊं गढ़वाल से लेकर कांगड़ा-जम्मू तक के पर्वतीय प्रदेश के स्थानीय राज्य गुप्त तथा हर्ष के आधिपत्य में रहे और गुप्त कला का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। दूसरे 5वीं और छठी शताब्दी में जब उत्तरी भारत पर हूण, गुज्जर आदि क्रूरकर्मा जातियों का आक्रमण हुआ तो यहां के शिल्पी, आक्रमण के कारण बेरोजगार हो गए। उनमें से कुछ तो दक्षिण की ओर, कुछ हिमालय के इन भू-खंडों में आकर बस गए और कुछ नेपाल तथा तिब्बत की ओर भागे। जो यहां आकर बसे उन्हें यहां के राजाओं ने प्रोत्साहन दिया और उन्होंने कुमाऊं, गढ़वाल से लेकर कांगड़ा, चंबा व जम्मू तक गुप्त तथा उत्तर गुप्तकालीन कला शैली के मंदिर तथा मूर्तियां बनाईं।इस काल में बहुधा, दुर्गा, शिव, गणेश व विष्णु की मूर्तियां व मंदिर बनते रहे हैं। विशेषकर विष्णु मूर्ति कला तो गुप्त काल से ही आरंभ हुई। एक उल्लेखनीय बात यह है कि गुप्त कला के मंदिर के छप्पर ढलवां और स्लेटों  के बने हुए हैं। जैसे कि कुमाऊं गढ़वाल के जागेश्वर, बागेश्वर, द्वारहाट, बैजनाथ और पांडुकेश्र आदि के मंदिर। यहां पर थोड़ा सा स्थानीय रूप भी दिया हुआ है, क्योंकि यहां पर हिमपात बहुत होता है। इसलिए भारी हिमपात से मंदिरों तथा घरों की रक्षा करने के उद्देश्य से इनके छप्पर मध्य से ऊंचे और किनारे से ढलवां होते हैं, जिसे कई विदेशी लेखक ‘चाइनीज स्टाइल’ लिखते हैं, जो मिथ्या है। सत्य तो यह है कि यह गुप्तकालीन कला है। मंदिर और मूर्तियां हिमालय के इन भू-खंडों में इसलिए सुरक्षित रहीं कि यहां तक कोई भी आक्रमणकारी नहीं पहुंच पाया। सम्राट हर्षवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात, विशेषतया उत्तरी भारत में, ऐसा कोई शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जो हिमालय सहित समस्त भारत को अक्षुण्ण बनाए रखता। फलस्वरूप भारत में अव्यवस्था एवं अराजकता फैलने लगी तथा तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इस उथल-पुथल के कारण जहां एक ओर राजवंशों ने जन्म लिया, वहीं दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था में कई परिवर्तन हुए। इन नए राजवंशों का संबंध राजपूत जाति से माना जाता था, परंतु इससे पूर्व भारतीय इतिहास तथा साहित्य में कहीं भी ‘राजपूत’ जाति का उल्लेख नहीं मिलता, बल्कि ऐसा आभास होता है कि कालांतर में प्राचीनकाल के वीर क्षत्रियों का स्थान नवउदित राजपूतों ने ग्रहण किया होगा। राजपूत लोग कौन थे तथा कहां से आए और कैसे क्षत्रिय बनें, इस बारे कुछ भी नहीं कहा जा सकता। सबसे अद्भुत बात यह है कि वह स्वयं को राम और कृष्ण के वंशज मानते रहे और अपने वंश को सूर्य, चंद्रमा और अग्नि से  जोड़ते रहे।                         — क्रमशः

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