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कोई इंसान महान कैसे बनता है?

यह सवाल अकसर उठता रहता है कि कोई इनसान महान कैसे बनता है। इसके लिए आदि शंकराचार्य के जीवन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। संप्रति हम इस बार आदि शंकराचार्य के जीवन पर प्रकाश डाल रहे हैं। शंकराचार्य ने पूरे ब्रह्मांड को माया बताया था। क्या है माया का अर्थ? जानते हैं उनके इस दर्शन के बारे में विस्तार से। शंकराचार्य एक महान बौद्धिक हस्ती थे, भाषाओं के महारथी और सबसे बड़ी बात कि एक आध्यात्मिक प्रकाश पुंज व भारत का गौरव थे। बेहद कम उम्र में उन्होंने ज्ञान और विवेक का जो स्तर दिखाया था, उसने उन्हें मानवता के लिए एक चमकती ज्योति बना दिया। आप ऐसे प्राणियों को कैसे रचते हैं? अपनी अल्पायु में ही उन्होंने भारत देश को लंबाई और चौड़ाई में नाप डाला। भारत के सुदूर दक्षिणी छोर से चलते हुए वह देश के मध्य में पहुंचे और जहां से वह उत्तर भारत में आगे की ओर बढ़े और फिर वह पूर्व और पश्चिम की तरफ गए। सवाल उठता है कि उनमें इसके लिए जरूरी ऊर्जा, उत्साह, विवेक कहां से आया? इसका एक पहलू महत्त्वपूर्ण और प्रतीकात्मक दोनों है कि शंकराचार्य दक्षिण भारत स्थित कालड़ी नामक एक गांव से आते थे, जो आज एक छोटा सा कस्बा है। कालड़ी का शाब्दिक अर्थ होता है-‘पैरों के नीचे या पैरों तले’। दक्षिण में हम लोग भारत माता के चरणों में रहते हैं, यह चीज कई रूपों में हमारे लिए फायदेमंद रही है। आने वाली पीढ़ी ऐसी सभी चीजों को नकार देगी, जो उनकी तार्किकता पर खरी नहीं उतरेगी या उन्हें तार्किक रूप से ठीक नहीं लगेगी और जो वैज्ञानिक रूप से ठीक नहीं होगी। महाभारत का एक सुंदर प्रसंग है, जिसके बारे में आपमें से ज्यादातर लोग जानते होंगे। जब कुरुक्षेत्र का युद्ध तय हो गया तो अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही श्री कृष्ण का सहयोग लेने के लिए उनके पास पहुंचे। श्री कृष्ण उस समय सो रहे थे। दुर्योधन उनके सिर के पास जाकर खड़े हो गए और अर्जुन उनके पांवों के पास। दोनों की स्थितियों ने सब कुछ तय कर दिया। उस दोपहर जब अर्जुन श्री कृष्ण के चरणों के पास खड़े हुए थे, उसी दौरान उन्होंने महाभारत का युद्ध जीत लिया था। यह हमारे देश और संस्कृति की बुनियादी प्रकृति है-क्योंकि हम हर चीज के प्रति नमन करते हैं, इसलिए ऊपर उठते हैं। हम लोग कोहनी मार कर या दूसरों को ठेल कर अपना रास्ता नहीं बनाते, बल्कि हम चीज के प्रति झुक कर आगे बढ़ते हैं।

उनकी प्रज्ञा और ज्ञान, आत्म-ज्ञान का परिणाम है

भारत का मतलब है कि हमने हमेशा सीखा है कि दैवीयता के चरणों में कैसे रहा जाए। यह संस्कृति आडंबर या दिखावे की नहीं, बल्कि स्वाभाविक भक्ति की है। चाहे वह भगवान हों, स्त्री हो, पुरुष हो, बच्चा हो, जानवर हो, पेड़ हो या फिर एक पत्थर हो, हमने हर चीज के सामने नमन करना सीखा है। सिर्फ एक इसी पहलू के चलते हम लोग महान प्राणी रचने में सक्षम रहे। दैवीयता के चरणों में रह कर ही हमने सीखा, खुद को विकसित किया, निखारा, हम पल्लवित हुए और लंबे समय तक हम पूरी दुनिया के लिए प्रकाश पुंजों का काम करते रहे। हजारों साल पहले, शंकराचार्य से भी पहले, आदियोगी से लेकर तमाम योगियों, रहस्यदर्शियों, दिव्यात्माओं, साधु व संतों ने यह बात कई तरह से कही है। उन्होंने जिस बौद्धिक स्पष्टता के साथ इसे अभिव्यक्त किया, जिस उत्साह व ऊर्जा के साथ इस विचार को पूरे देश में फैलाया, उसने शंकराचार्य को सबसे अलग खड़ा कर दिया। आज के दौर में एक पहलू बहुत महत्त्वपूर्ण है कि यह सारी प्रज्ञा, सारा ज्ञान किसी मत या विश्वास के चलते नहीं आया है, बल्कि यह आत्म-ज्ञान से आया है। जब तक कि आध्यात्मिक प्रक्रिया किसी न किसी रूप में बुनियादी मानव तर्क व मौजूदा विज्ञान की खोज से जुड़ी नहीं होगी, लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे।

पांच इंद्रियों की सूचना भ्रमित करती है

इसी तरह से आप जिस तरह से इस अस्तित्व या सृष्टि को देखते हैं, आप अपनी पांच ज्ञानेंद्रियों द्वारा इस सृष्टि को समझते व महसूस करते हैं, वह सब पूरी तरह से वास्तविकता से दूर है, यह भ्रम या माया है। यह एक तरह की मृगतृष्णा या मरीचिका है। अगर आप हाइवे पर चले जा रहे हैं तो कभी-कभी काफी दूर पर आपको पानी सा कुछ दिखाई देता है। लेकिन जब आप वहां पहुंचते हैं तो आपको वहां पानी बिलकुल नहीं मिलता। इसका यह मतलब नहीं था कि वहां कुछ नहीं था। वहां प्रकाश का कुछ ऐसा परावर्तन हुआ कि जिसने वहां दूर से पानी होने का भ्रम पैदा कर दिया। जो एक चीज थी, वह दूसरे होने का भ्रम पैदा कर रही थी। आप जिसे ‘मैं’ समझ रहे हैं, वास्तव में वह सब कुछ है, यही माया है। आप जिसे दूसरा समझ रहे हैं, वही वास्तव में आप हैं। आप जिसे सब कुछ समझ रहे हैं, वह शून्य भी है। तो शंकराचार्य इस माया की बात कर रहे हैं।

  -सद्गुरु जग्गी वासुदेव

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