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कम छात्र संख्या स्कूलों का क्या किया जाए

प्रथम

एसके भटनागर बैजनाथ, कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश में शिक्षा विभाग ने स्कूलों में छात्र संख्या का आकलन करते हुए पाया कि ज्यादा संख्या में विशेषकर प्राथमिक विद्यालय हैं, जहां छात्र-छात्राओं की संख्या दस से कम है। सरकारी व्यय व व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए पाया गया कि ऐसे कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को चलाए रखने का औचित्य नहीं है तो क्या ऐसे स्कूलों को बिलकुल बंद करना उचित होगा? कदापि नहीं। स्कूलों में कम संख्या के प्रमुख दो कारणों को दूर करना तो संभव नहीं है, क्योंकि पहला कारण लोगों की राजनीतिक तुष्टि के लिए अधिकाधिक स्कूल खोल देना है व दूसरा कारण धड़ाधड़ निजी स्कूलों को खोलने की बिना सोच-विचार मान्यता देना है। इन मुख्य कारणों से विशेषकर प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या में निरंतर कमी आती रही। अब प्रश्न है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का क्या किया जाए? शिक्षण व समाज की दृष्टि से ऐसे स्कूलों को निकटवर्ती दूसरे स्कूलों मंे मर्ज कर देना एकमात्र सुलभ व लाभकारी उपाय है। निकटवर्ती दूसरे स्कूल में मर्ज करने से उन स्कूलों में छात्र संख्या बढ़ जाएगी, बच्चों को अधिक दूर भी नहीं जाना पड़ेगा व अध्यापक संख्या में वृद्धि होने के कारण पढ़ाई में सुधार होगा। लोगों में भी रोष नहीं होगा। समूचे स्कूल प्रबंधन में भी सुधार हो सकेगा। हां, यदि मर्ज स्कूल में पहले से अध्यापक संख्या पर्याप्त हो तो कम संख्या वाले स्कूलों के अध्यापकों को उन स्कूलों में भेज देना चाहिए जहां और अधिक अध्यापक वांछित हों। विशेषकर ‘एकल अध्यापक’ वाले स्कूलों में कम से कम दो अध्यापक कर देने चाहिएं। इससे न केवल कम छात्र संख्या वाले स्कूल नहीं रहेंगे अपितु कम अध्यापकों वाले स्कूलों में भी अध्यापक संख्या बढ़ेगी। इस प्रकार ‘एक पंथ दो काज’ वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। इसके अतिरिक्त अन्य लाभ भी हो सकता है। कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के भवनों में आवश्यकतानुसार कोई सरकारी कार्यालय, उचित मूल्य की दुकान, डिपो, डाकघर, पंचायत घर, आंगनबाड़ी, सरकारी आवास, डिस्पेंसरी, सरकारी स्टोर/गोदाम खोला जा सकता है। अतः कम संख्या वाले स्कूलों को निकटवर्ती दूसरे स्कूलों में मर्ज कर देने से जहां विद्यार्थी एवं अध्यापक संख्या बढ़ेगी, वहीं खाली होने वाले भवनों के सदुपयोग का सुअवसर कम छात्र संख्या वाले निकटवर्ती स्कूलोंें के मर्ज करने से हो सकेगा।

द्वितीय

जसवंत सिंह चंदेल कलोल, बिलासपुर

मैं गांव में रहता हूं, जिसमें लगभग 120 परिवार बसते हैं। इस गांव में एक सरकारी जमा दो स्कूल, एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय है और एक प्राइवेट स्कूल है। एक और प्राइवेट स्कूल का भवन तैयार हो रहा है। इस गांव के एक तरफ एक किलोमीटर की दूरी पर एक और सरकारी प्राइमरी स्कूल है, तो दूसरी तरफ भी एक किलोमीटर की दूरी पर सरकारी मिडल स्कूल है। अब सवाल उठता है कि इन तीनों स्कूलों में बच्चे पढ़ने आएं तो कहां से आएं? इन स्कूलों को खोलने से पहले क्या उस समय के विधायक या दूसरे अमले ने कोई सर्वे करवाया था कि इन सकूलों की वहां पर आवश्कयता है भी या नहीं? शायद ऐसा नहीं हुआ होगा। यह तो वोट बटोरने का एक तरीका था और है। प्रश्न यह भी उठता है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम क्यों और कैसे हुई है या हो रही है। सबसे बड़ा कारण तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर है। सरकारी स्कूल में पढ़ रहा बच्चा हिंदी का एक प्रार्थना पत्र नहीं लिख सकता है। अंग्रेजी की बात तो छोड़ो सरकारी स्कूलों के बच्चे नकल किए बिना बहुत कम उत्तीर्ण हो रहे हैं। आजकल इम्तिहान हो रहे हैं और विद्यार्थी इम्तिहान के सुपरवाइजरों पर जानलेवा हमले कर रहे हैं। दूसरा कारण अध्यापकों की अध्यापन से अरुचि मानी जा सकती है। अधिकतर अध्यापक न स्वयं पढ़ते हैं और न ही पढ़ाने में रुचि रखते हैं। तीसरा कारण सरकारी स्कूलों के अध्यापकों की कमी मानी जा सकती है। चौथा कारण लोगों का अंग्रेजी स्कूलों का क्रेज है। हालांकि प्राइवेट स्कूल अंग्रेजी स्कूल नहीं है, मगर उनके नाम अंग्रेजों वाले हैं और वर्दियां भी अंग्रेजों वाली ही हैं। पांचवां कारण सरकारी स्कूलों में नर्सरी क्लास का न होना माना जाता है। हालांकि आंगनबाड़ी केंद्र खुले हैं, मगर वहां पर नर्सरी जैसी कोई गतिविधि नहीं होती है। छठा कारण बच्चों की कम आबादी। आज एक या दो बच्चों का चलन है और अभिभावक मानते हैं कि बच्चों की पढ़ाई पर पैसा खर्च करना सही है, सरकारी स्कूलों में न तो पूरे अध्यापक होते हैं और न ही अच्छी पढ़ाई होती है। वैसे मेरा मानना यह भी है कि हर सरकारी स्कूल का इतना बुरा हाल नहीं है। बहुत सारे स्कूलों में पढ़ाई अव्वल दर्जे की है। अब सवाल है कि जिन स्कूलों में बच्चों की संख्या कम है, उनका क्या किया जाए? लोगों का कहना है कि इन्हें बंद कर दिया जाए और बच्चों को नजदीकी स्कूलों में मर्ज कर दिया जाए। मेरे हिसाब से ऐसा ही किया भी जाना चाहिए। जिन स्कूलों के बच्चे दूसरे स्कूलों में मर्ज हों, उन स्कूलों के भवनों का दूसरे कामों के लिए सदुपयोग हो सकता है। इसके अलावा भी सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार की तरफ से उपाय किए जाने चाहिए। शिक्षा के पुराने ढर्रे को बदल कर शिक्षा को रुचिकर बनाया जाए।

तृतीय

पूजा सुर्यवंशी भ्यूली, मंडी

शिक्षा का क्षेत्र किसी भी देश या राज्य की प्रगति में महत्त्वपूर्ण व अग्रणी भूमिका निभाता है। हर सरकार गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने का दावा तो करती है, परंतु वास्तविकता हमारे सामने है। शिक्षा का क्षेत्र बहुत सी चुनौतियों से जूझ रहा है। शिक्षा संबंधी सबसे बड़ी समस्या जो विकराल रूप धारण किए है, वह है स्कूलों में छात्रों की संख्या में हो रही लगातार कमी। सरकार ने उन स्कूलों को जिनकी छात्र संख्या दस से कम है बंद करने का फरमान जारी कर दिया है और कम छात्र संख्या वाली करीब सौ से अधिक पाठशालाएं बंद हो चुकी हैं। सरकार बंद होने वाले स्कूलों को आसपास के स्कूलों में विलय करने की योजना बना रही है। सरकार का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के मकसद से कम छात्रों वाले स्कूलों को समायोजित करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश में स्कूलों की संख्या बहुत है, लेकिन उसके अनुपात में शिक्षकों की नियुक्ति बहुत ही कम है। यदि शिक्षक पर्याप्त हैं तो स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। बहुत से स्कूल मात्र एक ही शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में सरकार पर्याप्त शिक्षक तैनात करने में नाकामयाब रही है। अनेक ऐसे स्कूल हैं, जो सिर्फ राजनीतिक लाभ पाने व वाहवाही लूटने के उद्देश्य से खोले गए, जबकि इस तरह की घोषणा से पूर्व वास्तविक जरूरत का अध्ययन ही नहीं किया गया। स्कूलों की गुणवत्ता को मापने के लिए माकूल व्यवस्था नहीं है। शिक्षकों की गैर शैक्षणिक गतिविधियों में ड्यूटी लगाई जाती है। इस दौरान शिक्षकों की अनुपस्थिति से छात्रों के अध्ययन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे अभिभावकों में असंतोष फैला है। इन्हीं कारणों के चलते  अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से हटकर निजी स्कूल में दाखिला करवा रहे हैं। माता-पिता की यह धारणा बन चुकी है कि निजी स्कूलों में बच्चों की देखभाल अच्छी होती है। बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर स्कूल केवल दोपहर के भोजन का जरिया बनकर रह गए हैं। मजदूर भी अपने बच्चों को गांवांे से दूर बेहतर पढ़ाई के लिए निजी स्कूलांे में दाखिल करवा रहे हैं। यह हमारे सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति नहीं तो और क्या है कि प्रारंभिक शिक्षा के निःशुल्क होते हुए भी अभिभावक निजी स्कूलों में अपने बच्चों को दाखिल करवाकर भारी भरकम शुल्क अदा करने को उत्सुक हैं। यदि सरकारी स्कूल भी अपना स्तर सुधारें तो निजी स्कूलों से बेहतर शिक्षा सरकारी स्कूलों में दी जा सकती है। फिर स्कूलों में कम हो रही छात्रों की संख्या पर स्वतः ही रोक लग जाएगी।

इनके प्रयास भी सराहनीय रहे

सुनीता कुमारी देहरा, कांगड़ा

पिछले कुछ वर्षों से केंद्र और राज्य सरकार द्वारा भरपूर शिक्षा में गुणवत्ता लाने के पूरे प्रयास किए गए हैं। कहीं न कहीं कुछ कमियां जरूर रही हैं कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम हारेती जा रही है। इस वजह से 600 स्कूलों को मर्ज किया जाना चिंता का विषय है। स्कूलों को मर्ज करना भी सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या कम होने का समाधान नहीं है…

नरेश शर्मा बैहली, सोलन

किसी भी समाज के विकास में स्वास्थ्य एवं यातायात सुविधा के साथ-साथ शिक्षा का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। ऐसा भी समय था कि 25-25 गांवों के लिए एक ही स्कूल था। उस समय न तो अध्यापकों की कमी थी और न ही छात्रों की संख्या कम थी। उस समय बजट भी इतना नहीं होता था। आज सरकार द्वारा इतनी सुविधाएं देने के बाद भी सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या घट रही है  …

वनिता वत्ता

ओल्ड डीसी आफिस,सोलन

मानव जीवन की सफलता के लिए शिक्षा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सरकार ने स्कूल तो खोल दिए हैं, पर कमरे की छतें गायब हैं और दूसरी व्यवस्थाएं भी नहीं हैं। स्कूल प्रशासन की अनदेखी के कारण कई इमारतें बरसात में गिर जाती हैं। कई कमियों के कारण सरकारी स्कूलों से छात्रों का मोहभंग हो गया है। सुविधाएं देने के बावजूद सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या कम हो रही है…

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