मैगी खाकर गुजारे 73 दिन, पल-पल टूटती रही रिहाई की उम्मीद

धनभाग तिन्हां दे, जिन्हां दे घर राम परोहणे आए… जिस तरह त्रेता युग में 14 वर्ष का वनवास काट कर वापस अयोध्या आए भगवान राम का माता कौशल्या ने दीपावली मनाकर स्वागत किया था, ठीक उसी तरह रविवार को जिला कांगड़ा की तीन माताएं भी अपने लाड़लों की सुरक्षित घर वापसी पर हाथ में आरती की थाली लिए खुद को भाग्यशाली अनुभव कर रही थीं। मौत के मुंह से बचकर सुरक्षित पहुंचे अपने कलेजे के टुकड़ों को सीने से लगाने का सौभाग्य बिरले मां-बाप को ही प्राप्त होता है। ऐसे में ये माताएं खुद को धनभागी क्यों न समझें…

नगरोटा बगवां  – नाइजीरिया में समुद्री लुटेरों की 73 दिन की कैद के बाद हिमाचल के तीनों लाड़ले घर पहुंच गए। बड़े ही खुशनुमा माहौल में आतिशबाजी और दीयों की रोशनी में परिजनों ने उनका स्वागत किया। रविवार सुबह नगरोटा बगवां के रड्ढ निवासी पंकज की मां सुदर्शना, पिता वेद प्रकाश और बहन प्रियंका तो सुलह की मलोग में पत्नी निरंजन, मां कमला, पिता रमेश सहित दो नन्हीं नन्ही बेटियों मुस्कान व वर्षा द्वारा कई लोगों की उपस्थिति में अजय का घर वापसी पर स्वागत हुआ। नगरोटा बगवां के विधायक अरुण मेहरा तथा प्रशासन की ओर से नगरोटा बगवां के तहसीलदार मनोज कुमार ने दोनों युवकों को अपने अपने घर पहुंचाया तथा परिजनों को बधाई दी। इस दौरान ‘दिव्य हिमाचल’ की खास भेंट वार्ता में युवकों ने अपनी आप बीती सुनाई, जो रिहाई के बाद अब तक भी सहज अनुभव नहीं कर पा रहे थे। मन के भीतर समाई दहशत ओर अनजाना खौफ  उनके चेहरों और जुबान से साफ  महसूस किया जा सकता था, लेकिन अपने परिवार से मिलने की खुशी में अपनी पुरानी यादों को भूलने की कोशिश में उनकी कश्मकश भी साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने बताया कि नवंबर माह के अंतिम दिनों में वे दक्षिण अफ्रीका के बेनिन में जहाज पर चढ़े, लेकिन कंपनी के असूलों के मुताबिक उन्हें नहीं मालूम था कि उनका गंतव्य क्या है। पंकज कुमार अवेलेबल सेल्समैन तथा अजय इलेक्ट्रिशियन के रूप में जहाज में तैनात था, जबकि सुशील कुमार बतौर कैप्टन। उन्होंने बताया कि 31 जनवरी तड़के साढ़े तीन बजे उन्हें करीब एक दर्जन हथियार बंद लुटेरों ने धावा बोल कर बंधक बना लिया तथा सुनसान जंगल में ले गए। जहां एक टैंट में उन्हें रखा गया तथा आपने स्रोतों से 11 मिलियन की फिरौती की मांग को जल्द पूरा करने के लिए दबाव बनाया जाने लगा।

भगवान और सरकार पर था भरोसा

ऐसे खौफनाक हालात से गुजरना उनके लिए दुखद अनुभव था। हालांकि भगवान तथा अपनी सरकार पर भरोसा तो था, लेकिन ज्यों-ज्यों दिन बढ़ रहे थे, उम्मीदें भी टूटती जा रही थीं।

डर था, शायद ही जिंदा घर पहुंचें

सुशील ने बताया कि 73 दिन की कैद से छूटने के बाद अपने परिवार से मिलकर वह बेहद खुश हैं। सुशील ने बताया कि 28 मार्च के बाद संपर्क न होने से उन्हें डर लगने लगा था कि शायद ही वे अब जिंदा घर पहुंचें।

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