अभी भी चेहरे में बचपना

आलिया भट्ट

यूं तो आलिया भट्ट किसी फिल्म के लिए बाकायदा उसकी स्क्रिप्ट और हिंदी डायलॉग्स पढ़कर ही हां बोलती हैं, लेकिन मेघना ने जब उन्हें ‘राजी’ की सहमत की कहानी सुनाई, तो वह उससे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने बिना स्क्रिप्ट के ही हां बोल दिया और कहा कि मुझे कैसे भी यह फिल्म करनी है। इसके बाद मेघना ने आलिया को जहन में रखकर ‘राजी’ की स्क्रिप्ट लिखी। हाल ही में  दिल्ली आईं आलिया ने हमसे खास बातचीत की …

क्या आपकी असल जिंदगी में कभी कोई ‘सहमत’ जैसा पल आया?

अभी तक मेरी जिंदगी में देश के लिए कोई ‘सहमत’ पल नहीं आया। किसी ने मुझे कभी ऐसा कुछ करने को कहा भी नहीं है कि मुझे अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर देश की खातिर कोई टास्क पूरा करना है। मुझे लगता भी नहीं है कि आज की पीढ़ी में वह बात है कि कोई अपने देश के लिए जान दांव पर लगा दे। इसलिए ही हमने यह फिल्म बनाई है।

क्या घरवालों ने आप पर भरोसा करके कभी कोई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है?

बात घरवालों की दी गई जिम्मेदारियों की करें, तो जब आप अकेले रहने लगते हो, तो अपने आप आपके ऊपर आ जाती हैं। जब आप काम करने लगते हो, तो आपकी खुद-ब-खुद एक जिम्मेदारी होती है। खासकर जब आप एक पब्लिक फिगर हो, तो आप क्या बोलते हो, क्या कहते हो और किस तरह से पेश आते हो, यह भी अपने आप में एक जिम्मेदारी ही है।

इस रोल का ऑफर जब आपको मिला तो आपका फर्स्ट रिएक्शन क्या था?

मैं जब इस फिल्म के सिलसिले में पहली बार मेघना से मिली, तो उस वक्त उनके पास फिल्म की स्क्रिप्ट भी नहीं थी। दरअसल, मेघना मुझे दिमाग में रखकर स्क्रिप्ट लिखना चाहती थीं। मैं मेघना के मुंह से यह कहानी सुनकर हैरान थी कि ऐसा भी हुआ था और यह एक सच कहानी है। एक ऐसी लड़की जिसे जासूसी के बारे में कुछ नहीं पता है और तो और महज 20 साल की उम्र में उसे अपनी जिंदगी के बारे में भी कुछ नहीं पता है। वह पाकिस्तान पहुंच जाती है और सबसे बड़ी बात कि वह अपनी मर्जी से जाती है। इसलिए इस फिल्म का टाइटल ‘राजी’ भी बेहद अहम है, क्योंकि वह खुद ऐसा करने के लिए राजी हुई थी और उसे ऐसा करने के लिए फोर्स नहीं किया गया था। आमतौर पर मैं अपनी फिल्मों के लिए हां उनकी स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद ही करती हूं, लेकिन इस फिल्म के लिए मैंने बगैर स्क्रिप्ट के ही हां कर दिया था। मैंने मेघना को बोल दिया था कि मेरे को कैसे भी करके यह फिल्म करनी है। मैं इसके लिए अपनी डेट्स भी एजस्ट करने को तैयार हूं।

कैसा लगता है, जब डायरेक्टर आपको जहन में रखकर स्क्रिप्ट लिखता है?

बेशक, बहुत अच्छा लगता है। खासतौर पर जब मेघना जैसी कोई डायरेक्टर आपको ध्यान में रखकर स्क्रिप्ट लिखता है, तो बहुत स्पेशल फील होता है। मैंने उनके साथ काम किया है। वह चीजों को बहुत सीरियसली करती हैं। वह एक सीन को भी ऐसे ही ओके नहीं करती हैं और अगर अपने काम को लेकर इतनी सीरियस डायरेक्टर मेघना का मानना है कि सहमत का रोल सिर्फ  मैं कर सकती हूं, तो मेरे लिए बेहद खास एहसास है।

मेघना का कहना है कि यह रोल सिर्फ  आप ही कर सकती थीं। उन्हें एक ऐसी हीरोइन की तलाश थी, जो 20 साल की सीधी-सादी लड़की का रोल कर सके। आप क्या कहेंगी?

ऊपर वाले का शुक्र है कि मेरे चेहरे पर अभी भी बचपना कायम है। लोग अकसर मेरे से कहते हैं कि आप 12 साल की लगती हो। मैं कभी-कभी उस बात से चिढ़ती थी कि अब मैं 25 साल की हो गई हूं, लेकिन अब मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे चेहरे पर कायम बचपने की वजह से ही मुझे फिल्म राजी की सहमत बनने में मदद मिली।

दिल्ली आकर कैसा लग रहा है?

दिल्ली आना मुझे हमेशा ही बहुत अच्छा लगता है। दिल्ली आकर मैं लंच में सब्जी-रोटी की बजाय चाट खाना पसंद करती हूं। मुझे लगता है कि दिल्ली आकर चाट नहीं खाना गुनाह है। अभी भी हम ढेर सारी चटपटी चाट खाकर आ रहे हैं। चाट की वजह से मैंने अपना दही नहीं खाने का रूल भी तोड़ दिया। वरना मैं कई दिन से दही नहीं खा रही थी। हालांकि मैंने मेघना और विकी की प्लेट के छोले-भटूरे मिस किए। डीप फ्राइड होने की वजह से मैं इन्हें खाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।

आजकल लीड रोल में हीरोइनों वाली फिल्मों को काफी पसंद किया जा रहा है। इस बदलाव को आप कैसे देखती हैं?

मैंने तो हमेशा ऐसी ही फिल्में की हैं। इन्हें मैं लीड रोल की बजाय फीमेल कैरेक्टर के लिए अच्छे रोल्स कहूंगी। कपूर ऐंड संस में करीब 30 से 40 मिनट का रोल है। उसमें भी मुझे शुरू से आखिर तक पूरा कैरक्टर मिला है। मैंने अभी तक इसी तरह के रोल किए हैं। फिल्म में भले ही मेरा स्क्रीन टाइम कितना भी हो, लेकिन अगर उस कैरेक्टर में उतना दम नहीं है, जिसमें मैं कुछ कर दिखाऊं तो मुझे उसमें इंटरेस्ट नहीं होता। लोग हमेशा कहते हैं कि फलां महिला प्रधान फिल्म है। यह सब कुछ नहीं होता है। आप कभी पुरुष प्रधान फिल्म नहीं कहते, तो फिर महिला प्रधान क्यों कहते हैं। वरना हम मेरे पापा के टाइम से महिला प्रधान फिल्में बना रहे हैं। उन्होंने अर्थ बनाई थी, जो कि शबाना जी की कहानी थी। उनकी सारी फिल्मों में हीरोइनों का किरदार काफी मजबूत था। मुझे लगता है कि आजकल हीरोइनों को काफी अच्छे रोल इसलिए मिल रहे हैं, क्योंकि हम राइटर्स और उनकी अहमियत को समझ रहे हैं। राइटर्स के बिना कोई कहानी नहीं है, कहानी के बिना फिल्म नहीं है और फिल्म के बिना एक्टर नहीं हैं।

अपनी मेहनत के दम पर कम समय में ही आप ऊंचाइयों पर पहुंच गईं। ऐसे में, नईं फिल्में सिलेक्ट करते वक्त कितना प्रेशर होता है?

दरअसल, मुझे डर सिर्फ  फिल्म की रिलीज के दौरान लगता है। आजकल वह डर वाला पीरियड चालू हो गया है।  अगर मैं फिल्म साइन करते वक्त डरूंगी, तो फिर शायद मैं अच्छी फिल्में न कर पाऊं। मैं फिल्म को सिर्फ  कैरेक्टर के आधार पर सिलेक्ट करती हूं, न कि इसे कितनी ओपनिंग मिलेगी टाइप की चीजें सोचकर और अगर मैंने एक बार फिल्म साइन कर ली तो मैं फिर उसे लेकर अफसोस नहीं करती। मेरी अभी तक सिर्फ  एक फिल्म ने बॉक्स आफिस पर अच्छा नहीं किया और लोगों ने उसे पसंद नहीं किया। मुझे उस फिल्म को करने का भी कोई अफसोस नहीं है। मैं हर फिल्म एक अच्छी वजह से चुनती हूं। कई बार वह अच्छी चल सकती है और कई बार नहीं भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अगर फिल्म नहीं चली तो आप उसे अपने जहन से ही निकाल दें।

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