तीन बार सरकारी नौकरी छोड़ अब चलाती हैं स्कूल

बीते जमाने की बात करें तो महिलाओं को चूल्हे- चौके तक ही सीमित रखा जाता था। उस दौर में महिलाओं का अधिक पढ़ाई करना, नौकरी करना और सबसे बड़ी बात अपना काम- धंधा करना तो जैसे समाज एक अपराध समझता था, लेकिन उस दौर में भी कई ऐसी महिलाएं निकली जिन्होंने न सिर्फ पुरुषों से बढ़ कर अपनी काबिलीयत को सिद्ध किया, बल्कि समाज को एक नई सोच और प्रेरणा भी दी। उन्हीं महिलाओं में सुंदरनगर की इंजीनियर अनुराधा जैन भी हैं, जिन्होंने तीन बार सरकारी नौकरी को छोड़ा और विरोध के बाद भी अपना स्वरोजगार शुरू कर आज एक ऐसे शिक्षण संस्थान को खड़ा कर दिया है, जिसका नाम हिमाचल प्रदेश में ही नहीं बल्कि पांच राज्यों में गर्व के साथ लिया जाता है।

जी हां सुंदरनगर में स्थित महावीर पब्लिक स्कूल का नाम आज कौन नहीं जानता है। हर साल बोर्ड मैरिट, राष्ट्रपति के हाथों अवार्ड और न जाने अन्य कितनी ही उपलब्धियां अनुराधा जैन के कुशल नेतृत्व में अब तक दर्ज हो चुकी हैं। अनुराधा की बदौलत इस समय 100 से अधिक लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है।

बता दें कि अनुराधा जैन की प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूल में ही हुई। उनके माता-पिता तारा चंद जैन और सुशीला देवी का एक छोटा सा व्यवसाय था। जिसके बाद कई मुशिकलें को सहते हुए अनुराधा जैन ने कभी हिम्मत नहीं हारी और 1990 के दशक में सम्राट अशोक टेक्नोलॉजिकल इंस्टीच्यूट विदिशा (मध्य प्रदेश) से बीटेक की और उसके बाद वहीं राजक ीय इंजीनियरिंग कालेज में बतौर प्रवक्ता नौकरी शुरू की। उल्लेखनीय है कि उनका मकसद कुछ अलग करने का था। वह वहां से  हिमाचल चली आईं। क्योेंकि उनकी पृष्ठभूमि योल (कांगड़ा) से थी और राजकीय बहुतनीकी कालेज कांगड़ा में बतौर प्रवक्ता ज्वाइन कर लिया।

इसी दौरान उनकी शादी 1994 में जितेंद्र सिंह से हुई, जो आजकल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में बतौर अधीक्षण अभियंता शिमला में तैनात हैं। उसके बाद 1995 से 2000 तक एनआईटी हमीरपुर में बतौर प्रवक्ता सेवा दी, लेकिन जिंदगी में कुछ करने का जुनून उन्हें पति के स्थानांतरण के साथ सुंदरनगर से पैदा हुआ। यहां ललित नगर में उन्होंने 2000 में ही महावीर कोचिंग सेंटर खोला, जो 2004 में प्रदेश शिक्षा बोर्ड से संबद्व होकर महावीर पब्लिक स्कूल के रूप में धरातल पर आया। शिक्षा में कुछ नया करने के इस सफरनामे के कारवां को आगे बढ़ाते हुए 2009 में सीबीएसई से संबद्वता लेते हुए आज यह प्रदेश में शिक्षण संस्थानों की प्रथम पंक्ति में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

वर्तमान में लगभग दो हजार छात्र एवं छात्राओं के साथ लगभग 110 शिक्षक एवं गैर शिक्षक यहां कार्यरत हैं। इस स्कूल में हिमाचल प्रदेश शिक्षा बोर्ड और सीबीएसई बोर्ड दोनों के माध्यम से अलग-अलग कक्षाएं चल रही हैं। स्कूल में प्रदेश भर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

अनुराधा जैन का मानना है कि हिमाचल में एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है कि यहां शिक्षा केवल सरकारी नौकरी को केंद्र बिंदु मानकर ग्रहण की जाती है। जबकि इसके अलावा भी विकल्प हैं। वे अपना उदाहरण देते हुए कहती हैं कि उन्होंने सरकारी नौकरी को तीन बार तिलांजलि देकर हिमालय जैसी चुनौती को स्वीकारते हुए निजी शिक्षण संस्थान खोलकर समाज को प्रेरणा दी है।

इसके लिए जहां वह अपनी मां को आदर्श एवं प्रणेता मानती हैं, वहीं अपने पति को अपने जीवन और अपने लक्ष्य के लिए भागीरथ मानती हैं। उल्लेखनीय है कि उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना ही नहीं, अपितु पूरी मुस्तैदी से विद्यार्थी की योग्यतानुसार दार्शनिकता, सकारात्मकता, गुणवत्ता व सूक्ष्म विश्लेषण से नैतिक एवं चहुंमुखी विकसित कर उसे आगे बढ़ाना है।

बेटी है अनमोल

उनकी दो बेटियां हैं, जिनमें एक एमबीबीएस और दूसरी बीटेक कर रही हैं। वह उनके स्कूल में पढ़ रहीं बेटियों को विशेष प्रोत्साहन व सहयोग करती हैं। संस्थान में लड़के व लड़कियों के लिए अलग-अलग छात्रावास भी हैं। इसी परिसर में इनका आवास भी है।

स्कूल को पांच राष्ट्रीय पुरस्कार

अनुराधा के कुशल नेतृत्व के चलते महावीर स्कूल को पांच राष्ट्रीय अवार्ड मिल चुके हैं,  जिसमें एजुकेशनल इन अकादमिक ब्रिलियंस इन एचपी बोर्ड, बेस्ट अवार्ड इन अकेडमिक, टॉप सीबीएससी स्कूल ग्रीन स्कूल अवार्ड, लवली यूनिवर्सिटी की तरफ से टॉप सीबीएससी स्कूल अवार्ड और राष्ट्रपति के हाथों स्कूल के स्काउंड एंड गाइड को राष्ट्रीय अवार्ड मिल चुका है।

1993 में यंग साइंटिस्ट अवार्ड

उस जमाने में जहां महिलाओं का घर से निकलना भी वर्जित होता था, तो अनुराधा जैन ने अपनी काबिलीयत के बल पर यंग सांइसटिस्ट अवार्ड हासिल कर एक कीर्तिमान हासिल किया था।

मुलाकात

हिमाचली बच्चों को भेड़चाल से मुक्त करें…

औरत कब कब पुरुष से आगे रहती है ?

इसका प्रमाणिम उत्तर हमारी संस्कृति में वर्णित है कि जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। परंतु पुरुष प्रधान हमारे समाज की कंटीली तारों को तोड़कर वर्तमान में औरत पुरूषों से अवश्य आगे चल रही है।

नारी को सीमित व संकुचित करने में समाज का सबसे बड़ा दोष और इससे बाहर निकलने का रास्ता ?

उपेक्षित मानवीय संवेदना की चक्की में नारी हमेशा सीमित और संकुचित के पाटों में पिसती रही है। अब इससे बाहर निकलने के रास्ते को नारी जाति ने अपने दृढ़ संकल्प के साथ अपना मार्ग प्रशस्त किया है वह दिन दूर नहीं जब हमारा समाज नारी प्रधान से परिभाषित होगा।

तीन बार सरकारी नौकरी छोड़ने की व्यक्तिगत वजह रही या सफलता के आयाम पर सरकारी कवच पहनने की आपको जरूरत महसूस नहीं हुई ?

तीन बार नौकरी छोड़ने के पीछे मेरी मंशा प्रदेश की युवा पीढ़ी को संदेश देना था कि सरकारी नौकरी पाना आसान होती है जिसके लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है वहीं सरकारी कवच के बाहर भी सफलता को साधकर समाज हित में कार्य करते हुए मुकाम तक पहुंचा जा सकता है।

खुद में कितना शिक्षक और कितना व्यवसायी पाती हैं ?

इनसान कभी परिपूर्ण नहीं हो सकता है। रही बात शिक्षक की, तो उसमें शिक्षण क्षेत्र में आने वाले परिणाम शिक्षक की योग्यता को परिभाषित करते हैं, मेरा मानना इसके विपरीत है कि शिक्षक परिणाम के साथ-साथ एक सभ्य नागरिक व्यक्तित्व

का निर्माण विद्यार्थी मेें करें, तो शिक्षक वर्ग को साधुवाद। यदि शिक्षा के मंदिरों में व्यवसाय शुरू हो जाए तो समाज का पतन निश्चित है।

आपके लिए स्कूल चलाना क्या मायने रखता है ?

निजी क्षेत्र में सीमित संसाधनों के चलते अच्छी शिक्षा व एक संस्कारित नागरिक को समाज में भेजना मेरा मकसद है।

आखिर निजी स्कूल ही क्यों हिमाचली शिक्षा के मानक बनते जा रहे हैं, आधारभूत अंतर है कहां ?

निजी क्षेत्र में जवाबदेही तय है वहीं यदि परिणाम अच्छे नहीं होंगे तो प्रतिस्पर्धा के युग में जीवित रहना असंभव है। क्योंकि सरकारी मदद न होने के कारण भी निजी  शिक्षण संस्थान शैक्षणिक माहौल दे रहे हैं। सरकारी क्षेत्र मेें इसका अनुसरण किया जाना चाहिए।

हिमाचली बच्चों के करियर निर्धारण में भेड़चाल से हटकर भी रास्ते हैं। कैसे पता लगाएं कि उनके बच्चों के लिए कौन सी फील्ड अति उपयुक्त है ?

हमें भेड़चाल से सामूहिक सामंजस्य से मुक्ति लेनी होगी, जिसके लिए अभिभावक कुछ हद तक दोषी हैं। हम बच्चोें की सोच, उसके लक्ष्य तथा रूचि को अहमियत नहीं देते हैं, बल्कि दूसरों और अपनी सोच व रूचि को बच्चों पर थोपने का प्रयास करते हैं, हमें इस संस्कृति से बाहर निकलना होगा। मैंने प्रयास किया है अपने शिक्षण संस्थान में एक रूचि प्रकोष्ठ की स्थापना की है। उपयुक्त फील्ड के लिए बच्चों, अभिभावकों व शिक्षण संस्थान का सामंजस्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

हिमाचली परिदृश्य में इंजीनियरिंग या डाक्टरी से हटकर बच्चों को विविध विकल्पों का मार्गदर्शन न के  बराबर है, इस दिशा में आपका स्कूल क्या कर रहा है ?

गूगल बाबा के युग में विविध विकल्प हमारे हाथ पर हैं फिर भी हमने अपने संस्थान में भविष्य निर्धारण परिचर्चा प्रकोष्ठ की स्थापना की है। भविष्य में हम इसे दैनिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं।

क्या आप विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग अनिवार्य मानती हैं ?

हंसते हुए -यह भी भेड़ चाल है और है क्या ? यदि पाठ्यक्रम में कोचिंग शब्द का समावेश हो तो कोचिंग के नाम खुली दुकानें बंद होंगी, वहीं आम विद्यार्थी भी अपेक्षा से अधिक मुकाम पा सकता है।

शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा के बीच छात्रों के मौलिक विकास की परिभाषा खत्म हो रही है, बच्चे किताबों या पाठ्यक्रमों की परिक्रमा तक ही सिमट गए हैं ?

यह बहुत ही विचारणीय है। इसके लिए अभिभावकों को भी सचेत होना होगा। हमें अंक प्रतिशत की भूख को कम करना होगा तभी बच्चों का मौलिक विकास होगा साथ ही बच्चे की सोच के अनुरूप उसकी राह में सहयोगी बनना पड़ेगा।

क्या राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं के वर्तमान ढर्रे के जरिए छात्र योग्यता दक्षता का मूल्यांकन सही मानती हैं ?

अभी एक परंपरा संस्कृति प्रौढ़ अवस्था मेें है जो आने वाले समय में खत्म हो जाएगी। समाज का एक वर्ग का इस पर आधिपत्य था जो अब धीरे- धीरे समाप्त हो रहा है। भविष्य में योग्यता व दक्षता सार्थक परिणाम सामने लाएगी।

उत्तम छात्र  को सही नागरिक व उच्चतम इनसान बनाने में वर्तमान शिक्षा या शैक्षणिक संस्थानों की कोई भूमिका बची है ?

वर्तमान शिक्षा पद्वति अपने आप में लकवाग्रस्त है, इससे क्या आपेक्षित है। शैक्षणिक संस्थान लक्ष्य विहीन हैं, सरकारी तंत्र राजनीतिक इच्छाशक्ति जिसने समाज के भविष्यों को स्वभावानुकूल मार्गदर्शन नहीं होगा तब तक अपेक्षा बेमानी है।

आपका वश चले तो कोई एक सुधार आप वर्तमान शिक्षा पद्धति खासतौर पर परीक्षा प्रणाली में करना चाहेंगी?

वर्तमान परिदृश्य में राजनीतिक इच्छाशक्ति सामाजिक अपेक्षाएं विद्यार्थी जीवन की स्वच्छंदता अभिभावकों की इच्छाशक्ति पर प्रश्नचिन्ह है ? गाहे बगाहे परीक्षा प्रणाली भी प्रश्नचिन्हित होती रही है।

अपने कर्मयोग से कितना इत्मीनान या अभी इस सफर का मुकाम बाकी है- कोई इम्तिहान बाकी है ?

कर्मयोग एक साधना है, जो यह फलरहित कर्म है। किसी भी लक्ष्य का मुकाम नहीं होता। मुकाम के बाद नई मंजिल आपका स्वागत करती है। इम्तिहान जिंदगी की हर पायदान पर आपके मनोबल को प्रश्नांकित करता है।

— सुरेंद्र शर्मा, सुंदरनगर

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