तुरंत गिरफ्तारी मौलिक अधिकार के खिलाफ

एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली— एससी-एसटी एक्ट मामले में तत्काल एफआईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जुलाई में सुनवाई करेगा। एससी/एसटी एक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है कि किसी की भी गिरफ्तारी निष्पक्ष और उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। अगर बिना निष्पक्ष और उचित प्रक्रिया के किसी को सलाखों के पीछे भेजा जाता है तो समझिए कि हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं। प्रत्येक कानून को जीवन के अधिकार से संबंधित मौलिक अधिकार के दायरे में देखना होगा। इस अधिकार को संसद भी कम नहीं कर सकती। जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने मामले में कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया, यानी सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गोयल ने टिप्पणी की है कि जो भी कानून है, उसे अनुच्छेद-21 (जीवन के अधिकार) के दायरे में देखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी संबंधी वाद में इस बाबत व्यवस्था दी थी। अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार का दायरा काफी बड़ा है और कानून को उसी चश्मे से देखना होगा। इस अधिकार को नहीं छीना जा सकता या कमतर नहीं किया जा सकता है। कोई इसे कम नहीं कर सकता, यहां तक कि संसद भी इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। किसी की गिरफ्तारी बिना किसी निष्पक्ष प्रक्रिया के कैसे हो सकती है। इसे अनुच्छेद-21 के संदर्भ में अनिवार्य तौर पर देखना होगा। गिरफ्तारी उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। अगर बिना निष्पक्ष प्रक्रिया के किसी को अंदर भेजा जाता है तो हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं। बिना उचित प्रक्रिया के किसी को अंदर नहीं रखा जा सकता।

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