परिवार  संस्था और उसका महत्त्व

विश्व परिवार दिवस 15 मई पर विशेष

वर्तमान संक्रमण काल के बाद विविध परिस्थितियों में परिवार संस्था पुनर्गठित होकर मानव के उत्कर्ष में अपना योगदान जारी रखेगी। वस्तुतः मानवीय जीवन में जो कुछ भी आनंदमय, रसपूर्ण, साथ ही कर्त्तव्य और धर्म का सारतत्त्व है, वह हिंदू-परिवार में सरलता से मिल जाता है। हमारे समाज-शिल्पियों ने ‘परिवार संस्थान’ की नींव में ऐसे अमृततत्त्वों के बीज वपन कर दिए हैं जिनके कारण भारतीय परिवार अपना अस्तित्व कायम रखेगा…

भारतीय समाज निर्माताओं ने मनुष्य के आंतरिक-बाह्य जीवन को अधिकाधिक परिष्कृत, उन्नत, विकसित करने के लिए भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में नाना प्रयोग किए। नाना आदर्शों व संस्थाओं की स्थापना की। धर्म, दर्शन, अर्थविज्ञान, वर्ण-व्यवस्था, आश्रम आदि इसी प्रकार के प्रयोग थे। लेकिन जीवन में विभिन्न पहलुओं का एकीकरण करते हुए उन्होंने परिवार संस्था का एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था, जो व्यावहारिक, सहज सुलभ, सुखकर सिद्ध हुआ। परिवार संस्था ने मनुष्य के जीवन को आदि काल से ऐसा मार्गदर्शन किया है जैसा अन्य किसी भी संस्था ने नहीं किया होगा।

इतिहास बदल गए, दुनिया का नक्शा बदल गया, समाज संस्थाओं में बड़े-बड़े परिवर्तन हुए, लेकिन भारतीय समाज में परिवार संस्था आज भी ध्रुव बिंदु की तरह जीवित है। यद्यपि वर्तमान युग में कई आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव अब परिवार पर भी पड़ने लगा है, लेकिन भारतीय परिवार के मूल में जो विशाल भावना जीवित प्रेरणा का काम कर रही है, वह उसे मिटने नहीं देगी।

वर्तमान संक्रमण काल के बाद विविध परिस्थितियों में परिवार संस्था पुनर्गठित होकर मानव के उत्कर्ष में अपना योगदान जारी रखेगी। वस्तुतः मानवीय जीवन में जो कुछ भी आनंदमय, रसपूर्ण, साथ ही कर्त्तव्य और धर्म का सारतत्त्व है, वह हिंदू-परिवार में सरलता से मिल जाता है। हमारे समाज-शिल्पियों ने ‘परिवार संस्थान’ की नींव में ऐसे अमृततत्त्वों के बीज वपन कर दिए हैं जिनके कारण काल के अनंत प्रवाह में भी भारतीय परिवार अपना अस्तित्व सदा-सदा कायम रखेगा।

भारतीय मनीषियों की एक विशेषता रही है, वह यह है कि उनके प्रयोग केवल स्थूल पक्ष अथवा भौतिक तथ्यों तक ही सीमित नहीं रहते थे। वे सूक्ष्म क्षेत्रों में विश्व का संचालन करने वाले सार्वभौमिक तथ्यों की खोज करते थे और फिर उन्हें भौतिक विधानों में व्यवस्थित करते थे। परिवार संस्था के मूल में किसी ऋषि के इसी तरह के सूक्ष्म अन्वेषण का रहस्य छुपा हुआ है। नारी और पुरुष परिवार संस्था के दो मूल स्तंभ हैं। दोनों मानो नदी के दो तट हों जिनके मध्य से पारिवारिक जीवन की धारा बहती है। वैदिक साहित्य में स्त्री-पुरुष की उपमा पृथ्वी और द्युलोक से दी गई है। विवाह संस्कार के अवसर पर भी पुरुष, स्त्री से कहता है ‘द्योरहं पृथ्वी त्वम।’ अर्थात मैं द्यो हूं, तू पृथ्वी। आकाश और धरती, पुरुष और प्रकृति के संयोग से ही विश्व परिवार का उदय हुआ, ठीक इसी तरह स्त्री और पुरुष के संयोग से परिवार संस्था का निर्माण होता है। हिंदू परिवार की मूल प्रेरणा बहुत विशाल है जिसमें हिंदू धर्म की वह मूल भावना सुरक्षित रहती है जिसके अनुसार हमारे यहां स्थूल और नश्वर का संबंध विश्वव्यापी चिरंतन नित्य सूक्ष्म सत्ता के विधान से मिलाया गया है। परिवार संस्था केवल स्थूल व्यवस्था मात्र नहीं है, अपितु उसमें भी एक सूक्ष्म किंतु सनातन सत्य की जीवन ज्योति समाई हुई है।

विश्व जीवन में द्योः और पृथ्वी से लेकर परिवार में स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन की मधुर कल्पना में ऋषि का एक ही दार्शनिक दृष्टिकोण रहा है। जैसे द्युलोक और पृथ्वी एक ही संस्थान के पूरक तत्त्व हैं, उसी तरह स्त्री और पुरुष भी परिवार संस्था के पूरक अंग हैं। स्त्री-पुरुष की अभेदता को व्यक्त करते हुए पुरुष, स्त्री से कहता है – ‘सामोऽहस्मि ऋकत्व’- मैं यह हूं, तू वह है। तू वह है, मैं यह हूं। मैं साम हूं, तू ऋक् है। किसी वस्तु का व्यास अथवा परिधि परस्पर अभिन्न होते हैं। व्यास न हो तो परिधि का अस्तित्व नहीं, परिधि न हो तो व्यास कहां से आए? सृष्टि के मूलभूत हेतु में जिस तरह द्युलोक और पृथ्वी का स्थान है, उसी तरह परिवार संस्था में स्त्री व पुरुष का योगदान है। परिवार संस्था में जहां स्त्री-पुरुष की अभेदता का प्रतिपादन किया गया है, वहीं पूरे संस्थान को कर्त्तव्य धर्म की मर्यादाओं में बांध कर उसे सभी भांति अनुशासन, सेवा, त्याग, सहिष्णुता-प्रिय बनाया जाता है और इन पारिवारिक मर्यादाओं पर ही समाज की सुव्यवस्था, शांति व विकास निर्भर करता है। परिवार में माता-पिता, पुत्र, बहन, भाई, पति-पत्नी, नातेदार, रिश्तेदार, परस्पर कर्त्तव्य धर्म से बंधे हुए होते हैं। कर्त्तव्य की भावना मनुष्य में एक-दूसरे के प्रति सेवा सद्भावना उत्सर्ग की सद्वृत्तियां पैदा करती हैं। हिंदू परिवार में समस्त व्यवहार कर्त्तव्य की भावना पर टिका हुआ है।

सभी सदस्य एक-दूसरे के लिए सहर्ष कष्ट सहन करते हैं, त्याग करते हैं। दूसरों के लिए अपने सुख और स्वार्थ का प्रसन्नता के साथ त्याग करते हैं। शास्त्रकारों की भाषा में यही स्वर्गीय जीवन है। इसके विपरीत जहां अपने सुख और स्वार्थ के लिए दूसरों के हकों की छीनाझपटी, अपने अधिकार जताकर केवल पाने या लेने ही लेने का व्यवहार सामूहिक जीवन में परस्पर तनाव और संघर्ष को जन्म देता है, वहां विरोध, द्वेष, ईर्ष्या पैदा हो जाती है। इसे ही नीतिकारों ने नरक कहा है। यदि धरती पर स्वर्गीय जीवन की प्रत्यक्ष रचना कहीं हुई है तो वह है भारतीय परिवार संस्था। रस, आनंद, त्याग, उत्सर्ग, सेवा व सहिष्णुता का स्वर्गीय वातावरण यदि कहीं देखना हो तो वह हिंदू परिवार में सफलता से देखा जा सकता है। रामायण का आदर्श, हिंदू परिवार का ज्वलंत उदाहरण है। इसमें स्वार्थपरता, पदलोलुपता, बुराइयों के ऊपर त्याग, सेवा, सद्गुणों की विजय बताई गई है। परिवार ने जहां व्यक्ति के विकास में भारी योगदान दिया है, वहां सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान में भी इसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। परंपरा को आधार बना कर उससे आगे नियमित विकास और संतुलित प्रगति के क्षेत्र में परिवार संस्था सदा-सदा कार्य करती रही है। समाज के लिए जो भी हितकर व आवश्यक है, उसकी रक्षा परिवार संस्था ने पूरी की है।

पर्व, त्योहार, कला, सौजन्य, उत्साह, उमंग को परिवार संस्था ने ही सदा-सदा जीवित रखा है। समाज और संस्कृति के विकास में परंपरा का अपना एक महत्त्व रहा है। लोग अपनी परंपरा को शानदार बनाए रखने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करते हैं और इस तरह के आदर्श कुलों का जहां बाहुल्य होता है, वह समाज भी आदर्श और महान बन जाता है। महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर को आदर्श कुलों के आधार बताते हुए कहा था ‘तप, दम, ब्रह्म-ज्ञान, यज्ञ, दान, शुद्ध विवाह, सम्यक विचारों से कुल आदर्श बनते हैं।’ इन बातों में कहीं भी ऐसा नहीं है कि धन अथवा भौतिक ऐश्वर्य संपदाओं से कुल की मर्यादा बढ़ती है।

धर्म के आचरण से ही परिवार उन्नत होते हैं। प्रत्येक सदस्य परिवार की शान के लिए, उसकी समृद्धि व विकास के लिए अपने जीवन में बड़े से बड़ा काम करने की इच्छा रखता है और ऐसी उत्साहयुक्त भावना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए बहुत ही हितकर सिद्ध होती है। व्यक्ति जहां परिवार के भवन में धर्म आदर्श की सीढि़यों पर ऊंचे से ऊंचा चढ़ता है, वहां ऐसे व्यक्तियों से समाज भी समुन्नत होता है और अनेक सदस्यों से युक्त परिवार का उत्थान सभी भांति स्वच्छ फूलता-फलता, समृद्ध और विकसित होता रहता है।

परिवार संस्थान तपस्थली है जहां व्यक्ति स्वेच्छा से तप -त्याग धर्माचरण का अवलंबन लेता है। परिवार में मनुष्य का आत्मिक-मानसिक विकास सरलता से हो जाता है। परस्पर एक-दूसरे के प्रति अपने कर्त्तव्य निभाने का धर्म मनुष्यों का जीवन निखार देता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे देश में हिंदू परिवार का व्यक्तिगत जीवन निर्माण के साथ-साथ सामाजिक जीवन की समृद्धि के लिए एक महान प्रयोग हुआ है। अनेक आक्रमणों, आघातों को सहकर भी आज जो हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रही है, उसके मूल में परिवार संस्था का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि आज के परिवर्तनों, परिस्थितियों में परिवार संस्था को पुनर्गठित करके समाज की इस जीवनदायिनी धारा को अधिक शक्तिशाली और समृद्ध बनाया जाए।

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