स्कूली वाहनों में छात्रों की सुरक्षा

निबंध  प्रतियोगिता

प्रथम

अदित कंसल, नालागढ़, सोलन

हाल ही में नौ अप्रैल को नूरपुर में बच्चों को छोड़ने जा रही निजी विद्यालय बस दुर्घटना का शिकार हो गई तथा 27 मासूमों व चालक सहित 30 लोगों की मृत्यु हो गई। दुर्भाग्यवश हिमाचल में सरकार हादसे के बाद जागती है। प्रशासन की चिरनिद्रा भी टूटती है। सर्वप्रथम सरकार को चाहिए कि निजी विद्यालयों पर शिकंजा कसे। किताबों, वर्दी, फीस, फंड, ट्रांसपोर्ट चार्जेज, डोनेशन व अन्य सामग्री के माध्यम से गरीब अभिभावकों की जेब पर डाका डालने वाले निजी विद्यालयों के लिए शीघ्र ही ‘नियामक व नियंत्रण’ आयोग बनाया जाए। स्कूली वाहनों को लेकर नीतियां खामोश हैं, जबकि यातायात के हिसाब से मानक व मानदंड स्पष्ट हैं। स्कूल प्रबंधन सुविधाओं व छात्र सुरक्षा के नाम पर ठेंगा दिखा रहे हैं। ्रदेश सरकार को सड़कों व लिंक रोड की हालत सुधारनी चाहिए। पहाड़ी राज्य होने के कारण सड़कों पर पैरापिट, क्रेटवाल व क्रैश बैरियर होने से सड़क हादसों को कम किया जा सकता है। स्कूली बसों की दुर्घटनाओं का बड़ा कारण ओवरलोडिंग है। न्यायालय के आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। कोई भी स्कूल बस या वैन पीले रंंग की होनी चाहिए। गाड़ी के आगे और पीछे दोनों तरफ ‘स्कूल ड्यूटी पर’ लिखा होना जरूरी है। स्कूल बस की स्पीड लिमिट निर्धारित हो तथा स्पीड गवर्नर लगाए जाएं। गाड़ी में फर्स्ट एड बॉक्स के साथ-साथ जीपीएस  की अनिवार्यता होनी चाहिए। चालक के पास कम से कम पांच वर्ष का अनुभव होना चाहिए। वर्ष में दो बार चालकों-परिचालकों के ब्लड, शुगर लेवल, ईसीजी, कार्डियोलॉजी व आंखों की जांच की जाए। बच्चों को बसों से उतारने-चढ़ाने व सड़क क्रॉस करवाने हेतु केयरटेकर होना चाहिए। स्कूली बसों की वर्कशाप में नियमित जांच, मरम्मत व रखरखाव सुनिश्चित हो। स्कूली वाहनों को केवल सरकार व प्रशासन के हवाले नहीं किया जा सकता। बसों में छात्रों की ओवरलोडिंग, चालक की मनमानी व किसी प्रकार की लापरवाही की शिकायत प्रशासन से करें। स्कूल प्रबंधन पर अतिरिक्त वाहन चलाने का दबाव बनाएं। स्कूल शिक्षा बोर्ड को भी चाहिए कि वह मान्यता देते समय सुरक्षा मापदंडों को गंभीरता से परखें। समय-समय पर नियमों की जांच करे। बहुत हास्यप्रद है कि शिक्षा बोर्ड जिस जिला में है उसी जिला में ऐसी दुर्घटनाएं नहीं रोक पा रहा। इस प्रकार के कुछ उपाय कर के हम स्कूली वाहनों की दुर्घटनाओं में कमी ला सकते हैं।

द्वितीय

जसवंत सिंह चंदेल, कलोल, बिलासपुर

भारतवर्ष में शिक्षा के विकास में गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक संगठनों ने शिक्षा को आगे बढ़ाया है। स्वतंत्रता के पश्चात सरकार ने शिक्षा का सरकारीकरण किया, जो कि एक सीमा तक आवश्यक था। धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों का स्तर गिरता गया, परिणामस्वरूप प्राइवेट स्कूलों के रूप में शिक्षा की दुकानें सज गईं। शिक्षण का स्तर वहां भी अच्छा नहीं है, मगर विकल्प के अभाव में माता-पिता अपने बच्चों को वहां भेजने को विवश हुए। स्कूली वाहन भी केवल और केवल प्राइवेट स्कूलों के पास ही हैं। इनके पास वाहन भी पर्याप्त नहीं हैं और जो हैं उनकी हालत, उनके ड्राइवरों की हालत, उनकी रखरखाव की रूपरेखा दयनीय है। हमें यहां पर बात इन स्कूली वाहनों मंे छात्रांे की सुरक्षा की करनी है। सुरक्षा, रक्षा शब्द से बना है और रक्षा का अर्थ है कष्ट, नाश या दुर्घटना से बचना। इस बचाने वाले को रक्षक कहा जाता है। स्कूली वाहन, स्कूल की मिलकीयत हैं, इसलिए स्कूल का मालिक और मुखिया उस वाहन में सफर करने वाले विद्यार्थियों का रक्षक माना जाना चाहिए। इसलिए मेरा मानना है कि स्कूली वाहनों में छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल की ही है। कुछ नियम इन वाहनों पर लागू होने जरूरी हैं। वाहन में म्यूजिक सिस्टम न हो, चालक को ट्रैफिक रूलों का पूरा ज्ञान हो। मां-बाप अपने बच्चों को स्कूली वाहन में बैठाकर सोचते हैं कि स्कूली वाहन में उनके बच्चे सुरक्षित रहेंगे और सुरक्षित स्कूल पहुंच जाएंगे तथा स्कूल के बाद सुरक्षित घर वापस आ जाएंगे। उनकी सोच में कोई गलती नहीं है क्योंकि वे इसके लिए पैसा देते हैं। स्कूली वाहन में बच्चों से कोई शरारत, अश्लील हरकत न हो, वाहन चालक वाहनों को तेज गति से न चलाए, रास्ते में ट्रैफिक नियमों का पूरी तरह पालन करे और स्कूली वाहन में ओवरलोडिंग न हो, यह सुनिश्चित करना स्कूल का काम है। पुलिस हर मोड़ पर निगरानी नहीं कर सकती है। मगर स्कूल शुरू होने के समय और स्कूल में छुट्टी होने के समय पुलिस के अधिक जवान उस जगहों पर तैनात कर दिए जाएं, जहां वाहन हादसा होने का अंदेशा हो। स्कूली बस में फर्स्ट एड बॉक्स जरूर रखा जाए, ताकि खुदा न खास्ता कभी हादसा हो भी जाए तो बच्चों की मरहम पट्टी हो सके। ड्राइवर को इसकी ट्रेनिंग भी देना जरूरी है। स्कूली बस में पीने के पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। हर महीने ड्राइवर का मेडिकल चैकअप करवाया जाए। इसी तरह स्कूली वाहन को भी तयशुदा समय पर वर्कशॉप में भेजकर दुरुस्त करवाया जाए। स्कूली वाहन की खिड़कियों पर लोहे की जाली लगी हो, ताकि बच्चे हाथ, बाजू और सिर बाहर न हिमाचल प्रदेश सड़कें सपरीली हैं तथा तंग हैं। स्कूली वाहन चालकों को सतर्क रहने की आवश्यकता है।

तृतीय

एसके भटनागर, बैजनाथ, कांगड़ा

हमारे प्रदेश में जहां सड़कें मोड़दार व उतराई-चढ़ाई वाली हैं, ऐसे में स्कूली वाहनों में छात्रों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की नितांत आवश्यकता है। विद्यार्थियों की संख्या के साथ-साथ स्कूलों की संख्या में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। स्कूल सरकारी हों या प्राइवेट, स्कूली छात्रों को दूर पढ़ने आने-जाने के लिए वाहनों का सहारा लेना अनिवार्य हो जाता है। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थी अधिकतर राज्य परिवहन निगम की बसों में यात्रा करते हैं, क्योंकि निगम उन्हें निःशुल्क पास सुविधा भी देता है, परंतु अधिकतर प्राइवेट स्कूलों में छात्र स्कूल बसों में या स्कूल द्वारा किराए पर ली गई बसों में, जीपों, वैनों या निजी वाहनों द्वारा स्कूल आते-जाते हैं। वाहनों द्वारा स्कूलों को आना-जाना समय की अनिवार्य मांग है, जिसका कोई विकल्प नहीं हो सकता। स्कूली वाहनों की दुर्घटनाओं में अकसर दो कारण विशेष रूप से देखे गए हैं। एक ओवरलोडिंग व दूसरा ओवरस्पीडिंग। अधिकतर इन दो मुख्य कारणों से वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते हैं व मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ होता है। स्कूली विद्यार्थी देश-प्रदेश के भावी नायक होते हैं। स्कूलों में जाना, पढ़ना व हर क्षेत्र में आगे बढ़ना उनका न केवल मौलिक अपितु नैतिक अधिकार भी है। ऐसे में वाहनांे का उपयोग अनिवार्य है, परंतु स्कूली वाहनों में छात्र सुरक्षा हमारा सबका उत्तरदायित्व है व नैतिक कर्त्तव्य भी है। विशेषकर स्कूल प्रबंधन, पुलिस का यातायात विभाग, परिवहन विभाग, शिक्षा विभाग सभी मिलकर सचेत रहकर ओवरलोडिंग व ओवरस्पीडिंग इन दो मुख्य एवं भयानक कारणों को दूर करके स्कूली वाहनों में छात्र सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। इसमें कुछ नियम मान्य होने चाहिएं। इसमें चालकों का प्रशिक्षित होना, लाइसेंस होल्डर होना, समझदार व सावधान होना जहां अत्यंत आवश्यकत है, वहीं वाहनों में एक सहायक का होना भी आवश्यक है। सहायक बच्चों को वाहन में चढ़ाने-उतारने में सहायता करे व बस चालक को बस रोकने व चलाने में निर्देश दे। शिक्षा विभाग ने भी सभी स्कूलों को निर्देश जारी करके स्कूल प्रबंधन व संस्थान अथारिटी को छात्र सुरक्षा के लिए जवाबदेह बनाया है। छात्रों को घर से लाने तथा छोड़ने का दायित्व स्कूल प्रबंधन का होना चाहिए। नियंत्रण के लिए चैकिंग पुलिस करे। अतः वाहन चालकों द्वारा वाहनों को सुरक्षित, सावधानी व सूझबूझ से चलाना ही स्कूली छात्रों की सुरक्षा है, जिस पर कड़ा नियंत्रण संबंधित सभी विभागों का होना अपरिहार्य है। इन उपायों से नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।

इनके प्रयास भी सराहनीय रहे

दीपिका चौधरी, जमानाबाद, कांगड़ा

अगर स्कूली वाहनों में छात्रों की सुरक्षा को बनाए रखना है, तो इसके लिए निजी स्कूल प्रबंधन और ट्रांसपोटर्ज को मिलकर काम करने की जरूरत है। सरकार को यह समझना होगा कि निजी वाहन बंद करने या बदलने से कुछ नहीं होगा है। सरकार को यह समझना होगा कि निजी वाहन बदलने से कुछ नहीं होगा, अगर बदलना है तो सबसे पहले लोगों को अपनी सोच बदलना होगा …

नरेश शर्मा,बैहली, सोलन

सड़क सुरक्षा की खामियों के चलते माता-पिता के सपने  और भविष्य के चिराग की की सुरक्षा बहुत बड़ी चिंता का विषय बन गया है। छात्र देश का भविष्य होते हैं। ऐसा भी नहीं कि सड़क पर खुलेआम स्कूली वाहनों की मनमानी किसी को दिखाई नहीं देती।  जरूरत है, सख्ती के साथ सुरक्षा को लेकर बने नियमों की अनुपालना करवाने की। लोग भी नियम का पालन करें …

पूजा भ्यूली,मंडी

हिमाचल में हर रोज ही कोई न कोई सड़क दुर्घटना का समाचार सुबह के अखबारों में मिल ही जाता है। यहां की सड़कें इतनी ज्यादा सर्पीली और खराब हैं कि हादसा हो ही जाता है। नूरपुर हादसे ने तो ऐसे जख्म दे दिए कि देख- सुन कर ही रूह कांप जाती है। अकसर हादसे निजी स्कूलों में ही देखने को मिलते हैं। इनमें कमी तभी आएगी, जब हम इन हादसों से सबक लेंगे…

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