हिमाचली पुरुषार्थ : विज्ञान और लेखन में लय बांधते डा. सुरेंद्र पाल

पहाड़ी भाषा को लिम्का बुक ऑफ  रिकार्ड में स्थान दिलाने में डा. सुरेंद्र पाल ने योगदान दिया। वह अमरीका, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में अपने शोध कार्य प्रदर्शित कर चुके हैं। डा. पाल ने पीजीआई में मिर्गी के रोग पर गहन रिसर्च की और इस खोज से विदेशों में भी अपनी रिसर्च का लोहा मनवाया…

अर्की तहसील के एक छोटे से गांव तनसेटा में जन्मे डा. सुरेंद्र पाल वर्तमान पीढ़ी के लिए एक उदाहरण हैं। अमरीका में अपने शोध का लोहा मनवा कर अवार्ड पाने वाले सूबे में दूरदराज के लोगों को सस्ता इलाज देने के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर खोलने की हसरत रखे हुए हैं। डा. पाल आजकल सहायक निदेशक एवं मीडिया अधिकारी क्षेत्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रेंज धर्मशाला में कई अहम पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। फोरेंसिक विज्ञान में उनके शोध का कार्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक पत्रिकाओं में भी छपा है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सरकारी हाई स्कूल वलेरा सहित अर्की से हासिल की। डीएवी कालेज चंडीगढ़ से स्नातक और पंजाब विश्वविद्यालय एवं पीजीआई चंडीगढ़ में पीएचडी की उपाधि हासिल की। डा. पाल ने हिमाचल के हितों की हमेशा पैरवी की। पंजाब विवि में पहाड़ी भाषा को कैंपस रिपोर्टर में जगह दिलाई और मैगजीन के संपादक रहे। पहाड़ी भाषा को लिम्का बुक ऑफ  रिकार्ड में स्थान दिलाने में योगदान दिया। अमरीका, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में अपने शोध कार्य प्रदर्शित कर चुके हैं। डा. पाल ने पीजीआई में मिर्गी के रोग पर गहन रिसर्च की और इस खोज से विदेशों में भी अपनी रिसर्च का लोहा मनवाया। डा. पाल ने मिर्गी के रोगियों के लिए कई सार्थक इलाज बताएं हैं। 2006 में अमरीका में यंग इन्वेस्टिगेटर अवार्ड पाने वाले पहले भारतीय बने। डा. पाल का उद्देश्य आज के युवाओं में बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति को रोकना है। उनका मानना है कि देश में जितने भी अपराध हो रहे हैं उनका कारण ज्यादातर नशा रहता है इसमें संलिप्त होकर युवा अपराध कर बैठते हैं। अपराधों पर रोक लगाना है तो युवाओं को नशे के मकड़जाल से निकालना जरूरी है, क्योंकि आज का युवा देश का भविष्य है और अगर भविष्य ही नशे के जाल में हंसा रहेगा तो देश कैसे प्रगति करेगा। युवाओं को इससे  निकालने के लिए सबसे अहम रोल माता-पिता का होता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को ज्यादातर अपना ध्यान खेल में, पढ़ाई में और ऐसी एक्टिविटीज में लगाना चाहिए, जिससे उनका ध्यान नशे की ओर न जाए। क्योंकि नशे से कई प्रकार के रोग जैसे गले का कैंसर, मुंह का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर तथा अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं। कई ऐसी बीमारियां हैं जिनका इलाज करवा पाना गरीब माता-पिता के वश की बात भी नहीं होती, क्योंकि यह इलाज बहुत महंगे होते हैं और कई बार गरीब मां-बाप अपने बच्चों का इलाज करवाने में असमर्थ भी होते हैं व कई बार इन बीमारियों का पता ही आखिरी स्टेज पर लगता है। उन्होंने युवाओं को नशे से दूर रहने का आह्वान किया है, ताकि युवा नशे से दूर रहें तथा अपराधों में भी कमी आए।

अजय गुप्ता, अर्की

जब रू-ब-रू हुए… पहाड़ी बोली देती है भाईचारे और बंधुत्व का संदेश…

अपराध के खिलाफ विज्ञान कितनी सहायक भूमिका निभा रहा है?

अपराध के खिलाफ  फोरेंसिक विज्ञान अहम भूमिका निभा रहा है। फोरेंसिक विशेषज्ञ अपराध घटना स्थल से एकत्रित बायोलॉजिकल और भैातिक साक्ष्यों का विशलेषण करके वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार करते हैं जोकि संबंधित अन्वेषण एजेंसी को सौंपी जाती है। फोरेंसिक विज्ञान ने बहुत से जघन्य अपराधों को सुलझाने में मदद की है। आजकल आंख गवाही का दौर समाप्त हो रहा है और वैज्ञानिक तथ्यों तथा सबूतों पर अपराधी को सजा और बेगुनाह को न्याय मिल रहा है।

कोई ऐसी अनसुलझी गुत्थी, जो हिमाचली फोरेंसिक प्रयोगशालाओं ने अनावृत की?

विज्ञान प्रयोगशालाओं ने बहुत से उच्च प्रोफाइल मामले सुलझाए हैं, जिनमें प्रमुख हैंः-

चंबा के किहार में दोहरे हत्याकांड की गुत्थी, रजत आपराधिक मामला, ज्वाली कांगड़ा, युग गुप्ता हत्याकांड,शिमला, बच्चे अदला- बदली मामला,शिमला, जोकि डा.अरुण शर्मा,निदेशक फोरेंसिक निदेशालय हि.प्र. के नेतृत्व में हल किया गया।

अगर पुलिस में वैज्ञानिक दृष्टि बढ़ानी हो, तो क्या करना चाहिए?

पुलिस में वैज्ञानिक दृष्टिकोण बढ़ाने हेतु  अन्वेषण अधिकारियों को फोरेंसिक विज्ञान का समय- समय पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। ताकि वे घटना स्थल पर तथ्यों एवं सबूतों को सही ढंग से एकत्रित कर सकें व फोरेंसिक प्रयोगशाला भेज सकें। जघन्य अपराधों की गुत्थी सुलझाने में फोरेंसिक विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए।

पूरे विश्व में फोरंेसिक साइंस का सफल मॉडल किस देश ने अर्जित किया है?

ब्रिटेन,अमरीका और फ्रांस को पूरे विश्व में सफल मॉडल माना जाता है। ऐडमंड लोकार्ड को फ्रांस का शार्ल्क होल्मस माना जाता है जिसका सिद्धांत था कि हर संपर्क एक निशान छोड़ जाता है। फोरेंसिक विशेषज्ञ इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। वहीं फ्रांस के एलफोंस बर्टीलोन हैं जिन्हेाने एंथ्रोपोमिटृी शारीरिक नरविज्ञान का उपकरण बनाया, जो मानव के शारीरिक अंतरों की पहचान करने तथा उसके जातीय गुणों से संबंध निकालने के लिए किया जाता है। इसी के साथ ही ब्रिटेन के ऐलेक जेफ्री को डीएनए फिंगरप्रिंट का जनक माना जाता है। उन्होंने 1984 मंे डीएनए फिंगर प्रिंट की शुरुआत की जोकि फोरेंसिक विज्ञान के लिए वरदान सिद्ध हुई।

आपके लिए शोध प्रयोग से आगे क्या है? हमारे लिए शोध प्रयोग से वैज्ञानिक अन्वेषण के जरिए बायोलॉजिकल एवं भैातिक साक्ष्यों एवं सबूतों का परीक्षण करके अपराधी एवं आपराधिक घटनास्थल को आपस में जोड़ना है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में सहायता मिल सके। भारतीय परिप्रेक्ष्य में आगामी कुछ वर्षों में आपराधिक तफतीश में आप फोरेंसिक साइंस का योगदान किस पैमाने पर देखते हैं?

आपराधिक तफतीश में आने वाले समय में फोरेंसिक विज्ञान का अहम योगदान रहेगा क्योंकि जैसे- जैसे अपराधी अपराध करने के लिए नए -नए हथकंडे अपना रहे हैं, वैसे ही फोरेंसिक विज्ञान नई-नई तकनीकों का प्रयोग करके अपराधी तक पहुचती है। अपराधी को सजा दिलाने तथा बेगुनाह को न्याय दिलाने में फोरेंसिक विज्ञान विशेष भूमिका निभा रहा है। बढ़़ते हुए अपराधों को वैज्ञानिक परिपेक्ष्य से हल करने के लिए फोरेंसिक विज्ञान ही एकमात्र साधन है।

हिमाचली युवा अगर आपके रास्ते पर निकलें, तो उनकी यात्रा कैसे सफल होगी?

फोरेंसिक विज्ञान एक अद्भुत विज्ञान है, जोकि अपराध जगत की घटनाओं की गुत्थी सुलझाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अगर युवाओं को फोरेंसिक विज्ञान की बारीकियों का ज्ञान होगा तो वे निश्चित तौर पर अपराध को रोकने में विशेष भूमिका अदा कर सकते हैं । आज की युवा पीढ़ी फोरेंसिक विज्ञान को जानने व पढ़ने को उत्सुक है और फोरेंसिक विज्ञान में अपना भविष्य बनाने की चाह भी रखती है। भारतवर्ष में विभिन्न विश्वविद्यालयों में फोरेंसिक विज्ञान विषय के कोर्स करवाए जाते हैं, लेकिन इस दिशा में सफल होने के लिए मेहनत एवं लगन की भी आवश्यकता है।

आप वैज्ञानिक होते हुए भी कितने फीसदी लेखक हैं?

वैज्ञानिक आधार पर निपटाए गए आपराधिक मामलों का विश्लेषण शोध पत्र के रूप में राष्ट्रीय  और अंतराष्टृीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया है जिसमें प्रमुख हैंः-

यौन शोषण का फोरेंसिक अन्वेषण हत्या व आत्महत्या के मामलों का विश्लेषण व कारण और डूबने से होने वाली मौतों का डायटम टेस्ट के जरिए निदान।

हिमाचली भाषा के उद्भव के प्रति आपकी आशा- आशंका?

हिमाचल की भाषा हिंदी है जोकि राजभाषा या सरकारी कामकाज की भाषा है। हिमाचल की बोली पहाड़ी है जोकि सांस्कृतिक तौर पर भाईचारे व बंधुत्व का संदेश देती है व हमारी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। अगर पहाड़ी भाषा का विकास करना है तो इस प्रदेश की कला, संस्कृति एवं साहित्य को प्रचारित एवं प्रसारित करने की आवश्यकता है।

विभिन्न बोलियों से क्या यह संभव नहीं कि राज्य की अपनी भाषा एक आकार ले?

हिमाचल में विभिन्न प्रकार की बोलियां एवं उपबोलियां बोली जातीं है, जिनका अपना एक अस्तित्व है। इनसे हमारे सांस्कृतिक रिश्ते जुड़े हुए हैं। ये बोलियां बहुत प्रचलित हैं जो कि युवा पीढ़ी को संजोए रखने की जरूरत है ताकि वे अपनी सांस्कृतिक धरोहर के इतिहास को समझ सके व इससे जुड़े रह सके।

मिरगी रोग के उपचार में कितनी सफलता संभव है और इसके मूल कारणों में अति भयंकर क्या है?

मिरगी रोग का इलाज संभव है और इसका मूल कारण आनुवंशिक ,तेज बुखार होना,सिर में चोट लगना, मूली ,शलगम,गाजर व पत्ता गोभी को बिना धोए खाना है क्योंकि सब्जियों में फीता कृमि पाया जाता है जोकि हमारे शरीर में बिना धोई सब्जियों के माध्यम से प्रवेश कर दिमाग में पहंुच जाता है जोकि मिरगी के दौरे का कारण बनता है। इसलिए हरी सब्जियां हमेशा गर्म पानी में धोकर खानी चाहिएं।

वैज्ञानिक अनुसंधान की वर्तमान परिपाटी को कितना उपयुक्त ठहराएंगे। विज्ञान प्रयोगशाला को अगर सफल होना है तो क्या करना होगा?

वैज्ञानिक शोध पत्रों के द्वारा लोगों को अहम जानकारियां प्राप्त होती हैं क्योंकि ये जानकारियां अपराध के वैज्ञानिक अन्वेषण द्वारा जुटाई जाती हंै। अगर विज्ञान प्रयोगशाला को सफल होना है तो नई तकनीकों का उपयोग, फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए प्रशिक्षण तथा अन्य मूलभूत सुविधाओं का होना जरूरी है।

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