जिसे आप रद्दी बनाते, वह उसी से गहने चुन लेती

कहते हैं कि जब मनुष्य में कुछ करने की चाह हो तो वह रद्दी से भी सोना बना सकता है। ऐसा ही सिद्ध कर दिखाया है ऊपरी शिमला के छोआरा वैली की गवास पंचायत के कयानी गांव से संबंध रखने वाली मीनू चौहान  ने। तकरीबन 8-10 साल मीनू ने अपने गांव में जेबीटी के रूप में बच्चों को पढ़ाया। 2005 में शादी हुई और फिर सोलन आ गईं। मीनू चौहान की सात साल की बेटी है और पति अपना व्यवसाय करते हंै। वर्तमान में मीनू राजकीय प्राथमिक पाठशाला सोलन में कार्यरत हैं।  परिवार के सहयोग से हर कार्य कर रही हैं। मीनू चौहान जोकि कागज व न्यूज पपेर से हिमाचली कल्चर के आभूषण तैयार कर लोगों को भी इस तरह से काम करने के लिए प्रेरित कर रही है, ताकि लोगों को महंगे आभूषण न खरीद कर पहनने पड़ें। सोलन में रहने वाली मीनू चौहान पिछले दो महीनों से रद्दी से आभूषण तैयार कर रही हैं साथ ही उन्होंने अपनी बेटी के लिए रद्दी से ही माय ड्रीम प्रोजेक्ट भी तैयार किया था, जोकि स्कूल में लगी प्रदर्शनी में लोगों को पहली ही नजर में भा गया था। इसके बाद से मीनू ने रद्दी से आभूषण तैयार करने के बारे में सोचा और एक हफ्ते की मेहनत  से घर में पड़ी रद्दी से आभूषण तैयार कर दिए। वर्तमान में मीनू चौहान ने रद्दी से आभूषण तैयार कर लोगों के लिए एक मिसाल पेश कर दी है। मीनू ने हिमाचल के अग्रणी समाचार पत्र ‘दिव्य हिमाचल’ से खास बातचीत के दौरान बताया कि आज हिमाचली कल्चर के आभूषण हिमाचल में ही नहीं, बल्कि देश विदेश में प्रसिद्ध हैं और पर्यटकों की पहली पसंद भी हैं। वर्तमान में सोने-चांदी के आभूषण महंगे होने के कारण आम आदमी की खरीद से परे है। मीनू ने बताया कि वह स्कूल के विद्यार्थियों को भी रद्दी से कुछ बनाने के बारे में बताती हैं।

-आदित्य सोफत, सोलन

मुलाकात :कोई भी चीज वेस्ट नहीं होती, बस देखने का नजरिया अलग होता है…

सौंदर्य में आभूषण की भूमिका क्या निर्धारित करती है?

आभूषण नारी की सुंदरता को चार चांद ही नहीं लगाते, अपितु आभूषणों से नारी का सौंदर्य संपूर्ण होता है। प्राचीनकाल से ही अगर हम देखंे तो हमारी देवियां आभूषण आदि से सुसज्जित रही हैं और समय बदलने के साथ-साथ आभूषणों का रूप-आकार बदला है, लेकिन उनके प्रति महिलाओं का आकर्षण कभी कम नहीं हुआ है।

आप स्वयं आभूषणों के प्रति कब, किस उम्र में आकर्षित हुईं?

वैसे तो अपनी माता जी और पाठशाला में अपनी अध्यापिकाओं को गहनों से सजे हुए देखकर विशेषतः तीज-त्योहारों के अवसरों पर मुझे भी लगता था कि कभी मैं भी इस तरह के आभूषण पहन कर खुद को सुसज्जित करूं, तो मैं अपनी माता जी की चूडि़यां, माला आदि भी पहन लिया करती थी। तो बचपन से ही मुझे आभूषणों का शौक रहा है।

आप गहनों से रद्दी तक कैसे पहुंचीं और यह कला किससे सीखी?

पता ही नहीं चला आप यह समझो। मैं अपनी बेटी के लिए प्रोजेक्ट के लिए यूट्यूब पर कुछ न कुछ खोजती रहती थी और अपनी पाठशाला के लिए भी कागज से कुछ न कुछ बनाने के लिए ढूंढते-ढूंढते मुझे एक दिन पेपर आभूषण दिखे। बस वहीं से ये सब करने का ख्याल आया और आज वह हिमाचली पारंपरिक गहनों के रूप में सामने हैं।

रद्दी से गहने बनाते समय आपकी प्रमुख प्राथमिकताएं क्या रहती हैं और क्या लक्ष्य लेकर चलती हैं?

आज मार्केट में हजारों रुपए के गहने मिलते हैं और वह आम आदमी की खरीद से दूर है, तो मेरी प्राथमिता यह है कि जो इन महंगे गहनों को खरीद नहीं सकते वे लोग इन गहनों को ले सकें । साथ ही लक्ष्य यह है कि जो गहने हिमाचली पारंपरिक होते हैं, वे गहने हिमाचल ही नहीं बल्कि हिमाचल के साथ देश विदेश में भी अपनी छाप छोड़ सकें।

अब तक के आभूषणों में आपका बनाया हुआ मास्टर पीस क्या रहा?

अब तक का मेरा मास्टर पीस कानों के ब्रागर रहे हैं और गले का टीनमनिया भी मास्टर पीस रहा है। मेरे साथ के सभी अध्यापकों ने इन्हें देखते ही बहुत सराहा था।

क्या नकली गहनों की आबरू में असली जैसा नूर संभव है?

आज जिस तरह से सोने- चांदी का भाव आसमान छू रहा है, उस दौर में अधिकतर महिलाएं नकली गहनों की तरफ आकर्षित हो रही हंै और अधिकतर महिलाएं इन गहनों को अपनी पोशाक से मिलता- जुलता करके पहनने लगी हैं। आज यह ज्यादा लोकप्रिय हैं।

सोने-चांदी के आगे रद्दी की लुगदी तो सिर्फ  कहने मात्र को ही गहनों की पोशाक है। क्या कभी कोई खास हस्ती आपके उत्पाद देखकर मोहित हो गई या गच्चा खा गई?

अभी मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ है और न ही मैं इस बारे कुछ कह सकती हूं क्योंकि मेरे लिए यह एक परिकथा जैसा कुछ हुआ। हां, हाल ही में अपनी बेटी के स्कूल में मदर्स डे के कार्यक्रम में यही आभूषण पहन कर गई, तो स्कूल की पिंसीपल मधु कौशिक ने इसकी खूब तारीफ  की।

इस संबंध में अब तक मिली प्रेरणा से आपका अगला कदम क्या है?

इन गहनों में मुझे एक नई पहचान दिलाई है तो अब यह मेरा जुनून भी बनने लग गया है। दिमाग में कुछ न कुछ डिजाइन हमेशा चला ही रहा होता है और डिजाइन को सोचकर ही अगली योजना के बारे में ठान रही हूं।

क्या गहनों की लुगदी आगे किसी योजना पर काम कर रही है?

दिमाग में यह चल रहा है कि अगर कोई सीखना चाहता है तो उन्हें भी मैं यह सिखाऊं और भविष्य में मेरे द्वारा इनकी प्रदर्शनी लगाने का भी विचार कर रही हूं और मुझे लगता है कि अपने समय को व्यर्थ गवाने से अच्छा है कि हम अपने समय का प्रयोग करते हुए कुछ न कुछ क्रियात्मक गतिविधि करते रहे।

आपके आभूषणों के पीछे जीवन का संदेश क्या है?

अभी तक के आभूषण जो मैंने बनाए हंै, वे हमें हिमाचली होने का संदेश देते हैं। साथ ही यह भी संदेश देते हंै कि हम चाहे जितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, लेकिन हमारी जो परंपराएं हैं, रीति-रिवाज हंै, वे अपने आप में बेमिसाल हैं। हमें अपनी पुरातन धरोहर का सम्मान करना चाहिए।

जिसे मानव, व्यर्थ समझता है  वे तमाम चीजंे आपके लिए कैसे भिन्न हैं?

अगर देखा जाए व्यर्थ तो कुछ भी नहीं होता बस नजरिए का फर्क होता है। आज जिस तरह से हमारा पर्यावरण विनाश की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है, वहां हमें सचेत होने की आवश्यकता है और व्यर्थ चीजों से हम गहनों के अलावा भी बहुत सारी के वस्तुएं बना सकते हैं।

अमूनन नारी सौंदर्य के लिए कौन से आभूषण अनिवार्य मानेे जा सकते हंै?

वैसे इनकी गनती करना असंभव है क्योंकि इनमें नारियों की जान बसती है। मगर मेरी नजर में हाथ के कंगन और गले का हार नारी सौंदर्य के लिए विशेष भूमिका निभाता है। मंगलसूत्र और पायल की अपनी अलग विशेषता है, जो नारी जीवन को उसके नारीत्व होने का एहसास करवाते हुए उसके शादीशुदा होने का प्रतीक होते हैं।

हिमाचली गहनों में आपका प्रिय क्या है। कहां से डिजाइन चुराती हैं या किस तरह आप अपनी कला को हिमाचल से जोड़ पाती हैं?

चंदुहार(माथे का शृंगार), ब्रागर ओर गजरु मेरे प्रिय हैं। डिजाइन चुराने के लिए अगर कहूं तो मैं खुद ऊपरी शिमला से संबंध रखती हूं और अभी तक जो गहने मैंने बनाए हैं, मैंने खुद देखे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें बिलकुल वैसा रूप देने के लिए मैं गूगल पर हिमाचली पारंपरिक आभूषण के डिजाइन देखकर उन्हें स्टडी करती हूं और थोड़ा नया रूप देकर उन्हें बनाती हंू। चंदुहार ओर कमरबंद जो अब बना रही हूं, उनके लिए मैंने अपने रिश्तेदारों से  तस्वीरें मांगी थी।

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