संघ वही संघ है, प्रणब वही प्रणब हैं

प्रो. एनके सिंह

लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं

उन्होंने राष्ट्रवाद की परिभाषा, भाषा व भौगोलिक सीमा के उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि एक देश की संस्कृति व सभ्यता के रूप में की। उन्होंने कहा कि यूरोपीय राष्ट्रीय राज्यों से बहुत पहले भारत में सर्वेभवंतु सुखिना अर्थात सभी सुखी हों- के रूप में वैश्विक समभाव था। अन्य शब्दों में भारत का राष्ट्रवाद यूनिवर्सलिज्म का उत्पाद था, जबकि अन्य राष्ट्रों का राष्ट्रवाद भौगोलिक सीमाओं तक केंद्रित था। भारतीय राष्ट्रवाद की व्यापकता के कारण ही आज वैश्वीकरण हिंदू नजरिए को ग्रहण कर रहा है…

भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वार्षिक समारोह में उसके कार्यकर्ताओं को संबोधित करने का आमंत्रण स्वीकार कर लिया। इससे एक धूल भरी आंधी आ गई जो दिल्ली में पूरी तरह तथा शेष भारत में भी कुछ हद तक खलबली मचा रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विश्व में व्याख्या बीबीसी ने सबसे बड़े सामाजिक संगठन के रूप में की है, जबकि घरेलू स्तर पर यह संगठन विवाद का विषय रहा है क्योंकि इस पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगता रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ऐसे ही आरोपों के कारण कोर्ट केस का सामना कर रहे हैं, उन पर मानहानि का मुकदमा चल रहा है तथा वह अंडर ट्रायल चल रहे हैं। नाथू राम गोड़से, जिसने महात्मा गांधी पर गोली चलाई थी, उस समय आरएसएस का सदस्य नहीं था, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि निश्चित ही एक हिंदू कार्यकर्ता की थी। कुछ लोगों का विश्वास है कि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी भगत सिंह, जिन्हें फांसी दी गई थी, को गांधी बचा सकते थे। बताया जाता है कि एक ब्रिटिश अधिकारी ने स्वतंत्रता के बाद टिप्पणी की थी कि अगर गांधी व नेहरू ने सरकार से भगत सिंह को लेकर अपील की होती, तो उन्हें दिए गए मृत्यु दंड पर ब्रिटिश सरकार पुनर्विचार कर सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ऐसा लगा जैसे ये नेता भी उन्हें मृत्यु दंड के पक्ष में थे। ऐसी पृष्ठभूमि के चलते किसी ने भी नहीं, विशेषकर कांग्रेस के किसी सदस्य ने ऐसा नहीं सोचा था कि इंदिरा के करीबी रहे तथा वर्षों से कांग्रेस के प्रति वफादार रहे प्रणब मुखर्जी संघ के समारोह में शामिल होकर राजनीतिक तूफान ला देंगे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एक अवसर को छोड़कर प्रणब हमेशा वफादार कांग्रेसी रहे हैं।

हालांकि एक अवसर ऐसा भी आया जब राजीव गांधी ने उन्हें गलत ढंग से पार्टी से बाहर कर दिया और उस समय प्रणब ने अपनी ही पार्टी चलाने की कोशिश भी की थी। राजीव गांधी की मृत्यु के बाद जब प्रधानमंत्री चुनने का अवसर आया तो प्रणब सबसे वरिष्ठ व पात्रता रखने वाले व्यक्ति थे, लेकिन सोनिया गांधी ने उनकी अनदेखी कर दी। सभी लोगों को इस बात पर आश्चर्य हुआ था कि क्यों ऐसा हुआ, किंतु अब यह स्पष्ट हो चुका है कि क्यों सोनिया ने वरिष्ठ व्यक्ति को किनारे कर दिया और उनसे कनिष्ठ व्यक्ति मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना डाला। उनके साथ काम करते हुए मैंने यह बात देखी थी। प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के सबसे बेहतरीन नेता हैं, परंतु वह मनमोहन सिंह के उलट अपने ही दिमाग से चलते हैं। संघ के आमंत्रण को स्वीकार कर उन्होंने इस बात को प्रमाणित किया है कि वह अपनी सोच के मालिक हैं तथा गांधी परिवार के गुलाम नहीं हैं। बदलाव को देखने के लिए इस मीटिंग की पांच बातें महत्त्वपूर्ण हैं। पहला यह कि आमंत्रण को स्वीकार करना कांग्रेस के लिए बमबारी जैसा था तथा इसने इस सोच व प्रचार को बदला है कि संघ एक फासीवादी व अलगाववादी संगठन है।

मुखर्जी इस बात को लेकर पूरी तरह सचेत थे कि उनके संघ से संबद्ध होने के क्या प्रभाव पडे़ंगे तथा भविष्य की राजनीति किस तरह प्रभावित होगी। दूसरे, यह दर्शाता है कि किस तरह कमजोर कांग्रेस के अस्थि-पंजर दिखने लगे हैं। जो करने में मोदी विफल हुए, वह मोहन भागवत ने कर दिखाया कि प्रणब को बुलाकर वर्ष 2019 से पहले राजनीति का रुख मोड़ दिया। आने वाले चुनाव में संघ निश्चित ही एक निर्णायक कारक होगा। तीसरे, मुखर्जी ने संघ के संस्थापक को आदरांजलि दी तथा उन्हें भारत का एक महान सपूत बताया। उन्होंने संघ को विविधता स्वीकार करने के योग्य बनाया। अब संघ के लिए धर्म की सीमाएं भी नहीं हैं। भागवत ने यह स्पष्ट कर दिया कि संघ मात्र हिंदुओं का संगठन नहीं है, बल्कि इसके दरवाजे सभी धर्मों के लोगों के लिए खुले हैं। उनकी इस बात ने उनके मिशन की व्याख्या की है तथा लोगों तक एक प्रभावकारी संदेश पहुंचा है। चौथे, भागवत संघ की विश्वसनीयता स्थापित करने में सफल रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं था कि हिंदू भारतीय सभ्यता के उत्तराधिकारी थे। मुखर्जी ने भारत में बाद में आने वालों को मुस्लिम आक्रांता के रूप में संबोधित किया तथा व्याख्या की कि कैसे प्राचीन भारत ने नालंदा व तक्षशिला के अपने विश्वविद्यालयों में विज्ञान, ज्ञान व अन्य विज्ञानों का विकास कर लिया था। पांचवें, उन्होंने राष्ट्रवाद की परिभाषा, भाषा व भौगोलिक सीमा के उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि एक देश की संस्कृति व सभ्यता के रूप में की। उन्होंने कहा कि यूरोपीय राष्ट्रीय राज्यों से बहुत पहले भारत में सर्वेभवंतु सुखिना अर्थात सभी सुखी हों- के रूप में वैश्विक समभाव था। अन्य शब्दों में भारत का राष्ट्रवाद यूनिवर्सलिज्म का उत्पाद था, जबकि अन्य राष्ट्रों का राष्ट्रवाद भौगोलिक सीमाओं तक केंद्रित था। भारतीय राष्ट्रवाद की व्यापकता के कारण ही आज वैश्वीकरण हिंदू नजरिए को ग्रहण कर रहा है। प्रणब ने जो कुछ भी कहा, वह संघ के नजरिए से भी मेल खाता है। भागवत ने जिस तरह एकता की बात की, उसका अनुसरण प्रणब ने भी किया। ट्वीटर पर कई लोगों ने टिप्पणी की कि मुखर्जी के प्रिंट किए हुए भाषण की प्रति पहले ही भागवत के पास उपलब्ध थी। प्रणब ने अपना पत्ता समझदारी के साथ खेला।

उन्होंने संघ पर आरोपबाजी की स्थापित परंपरा से स्वयं को दूर रखते हुए उसके कार्यों को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि समानता व स्वतंत्रता लोकतंत्र में हमारे विश्वास के मुख्य आधार हैं। उन्होंने पंथनिरपेक्षता का कोई जिक्र नहीं किया। हिंदुत्व का उल्लेख किए बिना मुखर्जी ने हिंदू मूल्यों व संस्कृति की प्रशंसा की तथा इन्हें भारत की आत्मा कहा। मुखर्जी ने इस राउंड को जीत लिया तथा उनके व्यवहार व संबोधन की सभी ने प्रशंसा की। कांग्रेस ने राहत की सांस लेते हुए कहा कि प्रणब ने संघ  को आईना दिखाने का काम किया है। यह प्रतिक्रिया असंगत है क्योंकि इससे कांग्रेस की घबराहट झलकती है। संघ समर्थित मोदी के खिलाफ राहुल गांधी का पूरा अभियान हवा में फुस्स हो गया है। मुखर्जी भी अपने गहन विश्वास और मूल्यों से पीछे नहीं हटे हैं। भागवत ने ठीक ही कहा कि संघ अब भी वही संघ है तथा मुखर्जी भी वही मुखर्जी बने हुए हैं। इस परिवर्तनकारी बैठक से जो बदला, वह है वह मनोस्थिति जिसका सूत्रपात हुआ है।

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