अपने कदमों पर साहित्य

एसआर हरनोट

शिमला में एक लहर सी उठी और साहित्य चलकर मंजिल तक पहुंचने का सबब बन गया। सहज आयोजनों की एक नई परिपाटी में परिभाषित होते हस्ताक्षर अब सरकारी तंत्र की कुंडली नहीं ढूंढ रहे, तो स्वाभाविक मंजिलें नजदीक आ रही हैं। प्रदेश के बहुआयामी तथा चर्चित लेखकों का नेतृत्व आपसी सहमति की उड़ान पर है, फिर भी प्रयत्नों की पींगें डालते हुए एचआर हरनोट नए आयाम की कहानी लिख रहे हैं। साहित्यकार अब साहित्य की प्रासंगिकता में स्थल, संभावना और संयोजन का दायरा खुद तय करने लगा है, तो यकायक शिमला की पटरी पर चिन्हित होते इरादे खिलौना ट्रेन से बहुत कुछ साझा कर लेते हैं। कहीं से भलकु चाचा की स्मृतियां सामने आकर किताबों के पन्ने खोलने लग पड़ती हैं और तब लेखक समुदाय का संवाद अपने अभिप्राय के शब्द अर्पित कर देता है। बुक कैफे को अब कुछ न कुछ सुनने की आदत पड़ गई है और इसलिए जब कभी साहित्यिक कारवां दस्तक देता है तो बंद किताबों से निकल कर अर्थ के घुंघरू बज उठते हैं। सुन्न राहों के साक्षी बनकर शिमला का साहित्यिक संसार अपने आकाश से चांदनी समेट कर बुक कैफे को सौंप देता है। वहां राष्ट्रीय पर्व अब खिलखिला कर लेखकों का इंतजार करते हैं। देश के जज्बात जब गूंजते हैं, तो कविता कारगिल का ऊंचा साहस बनकर अपना साम्राज्य कायम कर लेती है। लगता है साहित्य खुद चलने लगा है और जब हरनोट हांक लगाते हैं कि 19 अगस्त की ट्रेन पर साहित्य सवार रहेगा, तो टिकट की गुंजाइश में सरोकार खिड़की पर खड़े हो जाते हैं। अब दूरदराज गांव के चौपाल पर कविता, कहानी या कथा जब बैठेगी, तो सुनने वाले पात्र अलंकृत होंगे। प्रतिष्ठित साहित्यिकार एसआर हरनोट वाकई साहित्य को परिवेश के सुपुर्द करने की रूपरेखा में काम कर रहे हैं। साहित्य अपने मंच से उतरकर चलने लगा है, तो आयोजनों के कक्ष भी बदलेंगे। बेहतर होगा कि सरकारी आयोजनों के बेजुबान मकसद से कहीं आगे निकलने की राह पर खड़ी सृजनशीलता अपने कदमों की आहट खुद सुने। शिमला के लेखकों ने मुकाम व समय अपने नाम कर लिया, इससे बड़ी विजय साहित्य की नहीं हो सकती।

-फीचर डेस्क

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