आत्म पुराण

समाधान — हे मैत्रेयी! एक आनंद स्वरूप आत्मा की छोड़कर पति, जाया, पुत्र आदि जितने सांसारिक पदार्थ हैं, वे स्वभाव से न तो प्रिय रूप हैं और न अप्रिय रूप, परंतु यह पदार्थ हमारे लिए सुख का साधन है, इस प्रकार की अनुकूलता जिस जीव को जिस पदार्थ के विषय में होती है, वही प्रिय जान पड़ता है, जो पदार्थ दुख का कारण जान पड़ता है वह अप्रिय लगता है। इस कारण यही मानना पड़ता है कि संसार में कोई अनात्म पदार्थ वास्तव में प्रिय या अप्रिय नहीं होता। संसार में एकमात्र आनंदस्वरूप आत्मा ही प्रिय  कही जा सकती है और उसका ज्ञान गुरु उपदिष्ट महावाक्यों ही होता है।

शंका— हे भगवन! महावाक्य रूप शब्द प्रमाण के बिना हमारा मन स्वतंत्र रूप से आत्म साक्षात्कार प्राप्त क्यों नहीं कर सकता। समाधान — हे मैत्रेयी! जैसे नेत्रादिक इंद्रियां कभी तो पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कराती हैं और कभी नेत्रादि में उत्पन्न हो जाने अयथार्थ (गलत) ज्ञान भी प्राप्त कराती हैं, उसी प्रकार यह मन भी कभी कोई दोष उत्पन्न हो जाने से यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करने लगता है। उसे यह आग्रह कभी नहीं होता कि हम सत्यज्ञान को ही उत्पन्न करें और अयथार्थ अथवा गलत ज्ञान को कभी न करें। पर यह महावाक्य रूप शब्द प्रमाण तो सदैव केवल यथार्थ रूप ज्ञानी को ही उत्पन्न करते हैं। इसलिए आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति के लिए महावाक्य रूप शब्द प्रमाण ही प्रधान कारण है।

शंका— हे भगवन! यदि आत्म साक्षात्कार के लिए महावाक्य रूप शब्द प्रमाण ही प्रधान हैं, तो वे महावाक्य बिना मन की सहायता के आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति क्यों नहीं कर देते?

समाधान— हे मैत्रेयी! जैसे घट, पट आदि पदार्थों को देखने के लिए नेत्रों की आवश्यकता पड़ती है अर्थात बाह्य इंद्रिय का संबंध हुए बिना किसी पदार्थ की जानकारी नहीं हो सकती। उसी प्रकार महावाक्य द्वारा जो आत्माकार वृत्ति उत्पन्न होती है, उसका ज्ञान तभी होता है, जब आत्मा का मन से संबंध होता है और तभी उस ज्ञान का साक्षात्कार हो सकता है।

शंका— हे भगवन! जिस अधिकारी पुरुष को आत्मा साक्षात्कार हो जाता है उसे उसका क्या फल मिलता है?

समाधान— हे मैत्रेयी! ऐसे अधिकारी पुरुषों को जब श्रवण आदि साधनों द्वारा आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति हो जाती है, तभी उनकी अज्ञान रूप अविद्या निवृत्ति हो जाती है और उस अविद्या रूप कारण के नाश हो जाने पर कर्त्तव्य भोक्तृत्व आदि संपूर्ण दुखों को भी निवृत्ति हो जाती है। इस प्रकार कार्य सहित अविद्या का नाश होने पर इस अधिकारी पुरुष के हृदय में स्वयं ज्योति आनंद स्वरूप अद्वितीय आत्मा का प्रादुर्भाव होता है।

शंका— हे भगवन! जिन पुरुषों का आत्म साक्षात्कार नहीं हुआ है, वे इस जगत में जन्म लें यह तो स्वाभाविक है। पर जिन विद्वानों की कार्य सहित अविद्या का नाश हो गया है, वे भी यदि प्रपंच में पड़ें तो हमको बड़ा आश्चर्य होता है।

समाधान- हे मैत्रेयों! जैसे इस लोक में अज्ञानी पुरुषों का पूर्व-पश्विम आदि दिशाओं में भ्रम हो जाता है, उसी प्रकार का भ्रम सभी विद्वानों को भी हो जाता है। इसलिए जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष को इस अद्वितीय आत्मा में तरह-तरह के संसार जान पड़ते हैं, उसी प्रकार प्राचीन प्रारब्ध कर्मों का लेशमात्र रह जाने से विद्वानों को भी शरीर का अंत होने तक कल्पित रूप में जगत का मान होता है।

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