इमरान वजीर-ए-आजम

इमरान खान ‘नए कप्तान’ की भूमिका में हैं। बेशक पाकिस्तान में नेशनल असेंबली चुनाव का जनादेश त्रिशंकु रहा है, लेकिन इमरान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इनसाफ (पीटीआई) 118 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। कुछ समविचारक दलों और सांसदों के समर्थन से बहुमत का आंकड़ा 137 हासिल किया जा सकता है। लिहाजा इमरान खान का पाकिस्तान के नए वजीर-ए-आजम बनना लगभग तय है। प्रधानमंत्री की औपचारिक नियुक्ति से पहले ही उन्होंने मुल्क की अवाम को संबोधित किया और हुकूमत के तौर पर अपना एजेंडा सार्वजनिक किया। हम उन तमाम बिंदुओं की व्याख्या बाद में करेंगे। फिलहाल कहा जा सकता है कि इमरान भी वैसा ही चेहरा हैं, जैसा पाकिस्तान के सियासतदां और फौज का रहा है। फिर भी एक क्रिकेटर वजीर-ए-आजम बन रहा है। दुनिया में यह प्रथम उदाहरण है। इमरान के नेतृत्व में ही पाकिस्तान की क्रिकेट टीम ने 1992 का विश्व कप जीता था, लिहाजा इमरान की ‘नायक’ की छवि तो पाकिस्तान में रही है। अब भारत और पाकिस्तान के दरमियान क्रिकेट ऐसी भूमिका निभा सकती है, जिससे रिश्ते बेहतर हो सकें। पाकिस्तान का नया चेहरा सामने आना चाहिए, यह इमरान ने बार-बार अवाम से वादा किया है। इमरान नौजवानों की नौकरियों के प्रति भी चिंतित दिखाई दिए, लिहाजा निवेश उनकी प्राथमिकताओं में बहुत पहले है। दोनों मुल्कों के बुनियादी मसले हल होंगे, फिलहाल उम्मीद ही कर सकते हैं। बेशक पाकिस्तान में चुनाव हुए हैं, पीटीआई को जनादेश हासिल हुआ है, हमारे पड़ोस में जम्हूरियत कायम है, लेकिन फिर भी कई सवाल हैं। चुनाव के करीब 85,000 बूथों पर 3,70,000 फौजियों की तैनाती क्या साबित करती है? करीब 10-12 फीसदी मतदाताओं को वोट ही डालने नहीं दिया गया। फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई के खिलाफ इमरान का एक भी बयान नहीं है। वह आतंकवाद के सरगना हाफिज सईद और हक्कानी नेटवर्क को ‘आतंकी’ ही नहीं मानते। तालिबान के समर्थक हैं, लिहाजा उन्हें ‘तालिबान खान’ भी कहा जाता है। इमरान ‘फौज के लाडले’ हैं। लिहाजा आरोप स्वाभाविक हैं कि उनकी पार्टी को चुनाव जितवाया गया है। पाकिस्तान का यह चुनाव ‘फिक्स’ था। वैसे 2013 के संसदीय चुनाव के वक्त नवाज शरीफ को फौज और आईएसआई का समर्थन और सहारा मिला था, लेकिन इस बार बदले माहौल और समीकरणों के मद्देनजर उन्होंने इमरान और पीटीआई का समर्थन किया है। इसमें गलत क्या है? शायद पाकिस्तान में चुनावी रवायत ही ऐसी है! बहरहाल हम अभी से यह दावा नहीं कर सकते कि इमरान की हुकूमत भी फौज और आईएसआई की ‘कठपुतली’ ही साबित होगी! भारत की बुनियादी चिंता कश्मीर और ‘छाया-युद्ध’ की निरंतरता है। कश्मीर इमरान के लिए भी भारत-पाकिस्तान के बीच का अहम मुद्दा है। फिलहाल उनकी जो सोच सामने आई है, वह बिलकुल घिसी-पिटी और अतीत की पुनरावृत्ति है। पड़ोसियों के साथ इमरान भी पाकिस्तान के बेहतर रिश्तों के हिमायती हैं, लेकिन चीन, अफगानिस्तान, सऊदी अरब के बाद हिंदुस्तान का नाम उनकी प्राथमिकता स्पष्ट करता है। अमरीका के साथ भी दोतरफा किस्म के संबंधों की बात इमरान ने की है, लेकिन हिंदुस्तान को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ खूब जहर उगला है। उनका मानना है कि जब से हिंदुस्तान में मोदी सरकार आई है, उसका पाकिस्तान के प्रति रवैया कट्टरपंथ का रहा है। इमरान प्रधानमंत्री मोदी को ‘लीडर’ या ‘स्टेट्समैन’ भी नहीं मानते। कश्मीर पर इमरान की सोच है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पारित प्रस्ताव के दायरे में ब्लूप्रिंट तैयार किया जाए। उसी के आधार पर बातचीत होनी चाहिए। इमरान हिंदुस्तान के साथ बेहतर रिश्ते चाहते हैं, ताकि पाकिस्तान में भी अमन और स्थिरता स्थापित हो सके। इमरान भारत के साथ पाकिस्तान के व्यापारिक संबंध भी सुगढ़ करने के हिमायती हैं। कुल मिलाकर उनका कहना है कि हिंदुस्तान एक कदम बढ़ाए, तो पाकिस्तान दो कदम बढ़ाएगा। इमरान कमोबेश एक कदम यह कहकर बढ़ा सकते हैं कि पाकिस्तान की जमीं दहशतगर्दी के लिए इस्तेमाल नहीं होने दी जाएगी। 2012 में चुनाव से पहले इमरान ने दावा किया था कि 90 दिनों में आतंकवाद खत्म किया जा सकता है। अब तो उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल रहा है, लेकिन उन्होंने अवाम के नाम अपने प्रथम संबोधन में ऐसा कुछ नहीं कहा। विशेषज्ञों का मानना है कि इमरान के वजीर-ए-आजम बनने के बावजूद कश्मीर के हालात नहीं बदलेंगे, घुसपैठ बढ़ेगी, ‘छाया-युद्ध’ जारी रहेगा, सिर्फ जुबानी जमा खर्च ही होगा, क्योंकि नीतियां नहीं बदलने वाली हैं। अंततः फौज और आईएसआई को ही तय करना है। इन संभावनाओं और आशंकाओं के बावजूद इमरान को नई पारी खेलने की शुभकामनाएं…शायद हुकूमत उनकी तुनकमिजाजी, बदमिजाजी को कम कर दे…इन चुनावों में हाफिज सईद के 265 उम्मीदवारों का सफाया कर पाकिस्तानी अवाम ने करारा तमाचा मारा है। हमें इससे ही संतुष्ट होना चाहिए।

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