केसीसी बैंक पर संवैधानिक संकट

नियमों को ताक पर रखकर जीएम की जगह एजीएम बने पावर सेंटर

धर्मशाला— कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक वित्तीय संस्थान होने के बावजूद सियासत का शिकार हो रहा है। बैंक में चल रही राजनीतिक उठापटक की कहानी सुन कर कोई भी दंग रह जाएगा। यह पहला मौका है जब न तो बैंक के पास नियमित चेयरमैन है और न ही नियमित एमडी है। इतना ही नहीं, जीएम की प्रशासकीय शक्तियां भी छीन कर एजीएम को दे दी गई हैं। हालात यह हैं कि बैंक का घाटा लगातार बढ़ रहा है। कर्ज लग नहीं रहा है और खाताधारक घट रहे हैं, जिसके चलते बैंक की साख पर भी खतरा उत्पन्न होने लगा है। अराजकता के चलते अधिकारी कर्मचारी भी जुगाड़ तंत्र में उलझकर रह गए हैं। केसीसी बैंक में पहली बार ऐसे भयानक हालात बने  हैं, जिसे देख कर हर कोई हैरत में है। बैंक को क्लर्क, असिस्टेंट मैनेजर, मैनेजर, सीनियर मैनेजर, एजीएम, जीएम और एमडी सिस्टम को चलाते हैं। बैंक में एक जीएम प्रशासन व एक जीएम लोन है। बैंक का संपूर्ण प्रशासकीय कार्य जरनल मैनेजर के पास होता है। वह कर्मचारियों के तबादलों से लेकर अन्य तमाम कार्य देखता है, लेकिन यहां इसके विपरीत एक सहायक प्रबंधक इन सारी शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। बैंक के वायलाज को देखें तो तमाम प्रशासकीय शक्तियां जीएम प्रशासन में निहित हैं। यह शक्यिं न तो एमडी द्वारा दी जा सकती हैं और न ही छीनी जा सकती हैं। बैंक का एमडी स्वयं ही बोर्ड ऑफ डायरेक्टर द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हैं। बैंक के सहायक महाप्रबंधक कर्मचारियों से जुड़े किसी भी मामले में फैसला लेने में सक्षम नहीं हैं। यह बैंक के सर्विस रूल्ज के भी खिलाफ है। बावजूद इसके प्रदेश के इस बड़े एवं अहम वित्तीय संस्थान में चल रहा खेल इस ढांचे को खोखला कर सकता है। अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भी गुटबाजी हाबी होने लगी है। बैंक के बिगड़ते हालात को देखकर खाताधारक भी मुंह मोड़ने लगे हैं। एनपीए बढ़ रहा है, नए व बड़े कर्ज के मामले हो नहीं रहे हैं, जिससे भविष्य में राज्य के इस बड़े एवं अहम वित्तीय संस्थान को सुचारू रूप से चलाना सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती होगी।

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