नई खेल नीति के लिए और कितना इंतजार

राकेश शर्मा

लेखक, जसवां, कांगड़ा से  हैं

पिछली सरकार के समय भी विधानसभा में पारित प्रदेश की नई खेल नीति सचिवालय और राजभवन के बीच गोते खाती रही। इस खेल नीति में खेल संघों पर नकेल कसे जाने के कारण यह राजनीति की भट्ठी में जलकर स्वाह हो गई। अब तो उस खेल नीति की चर्चा और चाल दोनों ही गायब हैं…

हिमाचल प्रदेश खेल नीति 2001, जो लगभग 18 साल पहले बनाई गई थी। आज भी उसी पुरानी खेल नीति के सहारे खेलों में बच्चों को उत्कृष्ट बनाने का सपना देख रही सरकारें खेल और खिलाड़ी के प्रति कितनी उदासीनता का भाव रखती हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। इस पुरानी खेल नीति में जहां ग्रामीण हिमाचल में खेलों के ढांचागत विकास का उद्देश्य निर्धारित करने के साथ-साथ खेलों और खिलाडि़यों के विकास और प्रशिक्षण के लिए बहुत सी बड़ी-बड़ी बातें तो कही गई थीं, परंतु धरातल पर इस खेल नीति को सही रूप से लागू न करके इसमें निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करना तो दूर, उनके पास भी नहीं पहुंचा जा सका।

खेलों और खिलाडि़यों को उन्हीं के हाल पर छोड़कर केवल बातों और वादों से खेल क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने के जो सपने सरकारें देखती हैं, उनसे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। पिछले लगभग 6-7 वर्षों से सरकारों ने इस बात को मानना शुरू कर दिया है कि प्रदेश में खेलों के विकास और उत्थान के लिए खेल नीति में बदलाव करना अत्यंत जरूरी है। इसके अलावा सरकारें इस बात से भी सहमत हैं कि नई खेल नीति बनाकर और पूरे प्रदेश में इसे एक समान रूप से लागू करके प्रदेश में खेलों के स्तर को ऊपर उठाया जा सकता है। नई खेल नीति का यह आश्वासन लंबे समय से सरकारों द्वारा दिया जा रहा है, लेकिन सरकार का नई नीति का पिटारा कब खुलेगा और इसमें से कौन सी सौगात निकलेगी, इसका किसी को कुछ पता नहीं है। सरकारें दूसरे राज्यों की खेल नीति का अनुसरण करने के बहाने बनाकर, इस कार्य में बेवजह देरी कर रही हैं। यह सही है कि हमारे पड़ोसी राज्यों की खेल नीतियां हमसे कहीं बेहतर हैं, विशेषकर हरियाणा की, परंतु क्या हम हमेशा पीछे चलने और अनुसरण करने की नीति ही अपनाते रहेंगे? क्या हम अपनी पुरानी खेल नीति की कमियों को सुधारकर एक नई नीति को नहीं बना सकते हैं, जिसका अनुसरण अन्य प्रदेश कर सकें? नई खेल नीति के न बन पाने के कुछ आंतरिक कारणों को जानना भी बेहद जरूरी है। पिछली सरकार के समय भी विधानसभा में पारित प्रदेश की नई खेल नीति सचिवालय और राजभवन के बीच गोते खाती रही। इस खेल नीति में खेल संघों पर नकेल कसे जाने के कारण यह राजनीति की भट्टी में जलकर स्वाह हो गई। अब तो उस खेल नीति की चर्चा और चाल दोनों ही गायब हैं। पुरानी नीति के सहारे आखिर कब तक खेलों के साथ अन्याय किया जाएगा? प्रदेश का बचपन विद्यालयों में खेलों के विकास की राह देख रहा है। सरकार द्वारा प्रदेश में नए बने मॉडल स्कूलों में खेलों के ढांचागत विकास के लिए जो धनराशि मुहैया करवाई गई थी, उस धन का सख्त निर्देशों के अभाव में दुरुपयोग करने में कुछ विद्यालयों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ विद्यालयों में तो इस धन का प्रयोग कच्चे खेल के मैदानों को पक्का करने में ही खर्च कर दिया गया, जबकि उस पैसे का उपयोग छोटे मल्टीपर्पस स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स को बनाने के लिए किया जा सकता था। ऐसे हालात में किस प्रकार खेलों का स्तर ऊपर उठ पाएगा, जब सरकार पैसे के ऐसे दुरुपयोग पर आंखें बंद करके बैठी रहेगी।

जब भी प्रदेश में कहीं खेलों का कोई बड़ा आयोजन होता है, तो उसमें नई खेल नीति का स्वप्न खिलाडि़यों को दिखाया जाता है और जैसे ही आयोजन समाप्त होता है, तो फिर से चर्चा को अगले बड़े आयोजन तक ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। न जाने प्रदेश के कितने खिलाड़ी नई खेल नीति के इंतजार में अपना करियर खत्म कर चुके हैं और कितने कतार में हैं। सरकार अपनी मौज में है, कभी ग्रेट खली के रेसलिंग शो से युवाओं को खेलों के प्रति जागरूक करने की बात करती है, तो कभी हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में चले खेल महाकुंभ को खेलों के प्रति एक बड़ा कदम बताती है।

खेल महाकुंभ से केवल एक संसदीय क्षेत्र के बच्चों ने कुछ खेलों में अपना दमखम जरूर दिखाया है, परंतु चुनावों के नजदीक आते ही इस तरह के आयोजनों को परवान चढ़ाना और संसदीय क्षेत्र के बाहर इस प्रदर्शन से इन प्रतिस्पर्धियों को क्या लाभ मिलेगा, यह अभी तक यक्ष प्रश्न बना हुआ है। पूरे प्रदेश के बच्चे और युवा यदि खेलों को अपना करियर बनाते हैं, तो उनके सुदृढ़ भविष्य के लिए एक बेहतरीन खेल नीति लाई जानी अत्यंत आवश्यक है। प्रतिदिन प्रदेश में फैल रहे नशे के कारोबार की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। जिस तेज गति से नशे का जाल प्रदेश में फैल रहा है, वह आज की सबसे बड़ी चिंता है। इसके समाधान के लिए युवाओं और बच्चों को पढ़ने के अलावा खेलों के प्रति जागरूक करने और खेलों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। नशे से दूरी बनाने के लिए प्रदेश के भविष्य को रास्ता दिखाने की जरूरत है और इसके लिए खेलों के प्रति उनकी रुचि बढ़ाकर कुछ हद तक उन्हें नशों के सेवन से दूर रखने में मदद मिल सकती है। खेलों के प्रति रुचि पैदा करने के लिए रेसलिंग और खेल महाकुंभ जैसे पार्ट टाइम आयोजनों से बात नहीं बनेगी। इसके लिए एक सुदृढ़ और पूर्णकालिक खेल नीति की आवश्यकता है।

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