पहाड़ी जीवन की चुनौतियां

स्वास्तिक ठाकुर, पांगी, चंबा

पहाड़ पर जीवन की हर मौसम में अपनी कुछ चुनौतियां रही हैं और इसी क्रम में अब सामना बरसात से है। बरसात के मौसम में अब तक प्रदेश को करोड़ों रुपए की चपत लग चुकी है,  जबकि भारी बारिश में आम जनजीवन के पहिए बार-बार थम रहे हैं। हर साल इस तरह की आफत से निपटने में वैसे तो हिमाचल अब आदि हो चुका है, लेकिन क्या केंद्र सरकार या पड़ोसी राज्य कभी संकट में हमारे मददगार बनेंगे? बरसात के मौसम से पहले या बाद में जब हिमाचली नदियां पड़ोसी राज्यों की जल संबंधी जरूरतों को पूरा करती हैं, तो हिमाचल को फरिश्ते के रूप में देखा जाता है। वे राज्य आज आफत की इन घडि़यों में हिमाचल के साथ क्यों खड़े नजर नहीं आते हैं? जम्मू-कश्मीर, बिहार या महाराष्ट्र के राज्य जब कभी बरसाती बाढ़ में तंग होते हैं, तो केंद्रीय मदद बिना वक्त गंवाए वहां डेरा डाल लेती है, परंतु हिमाचल प्रदेश के लिए यह मदद सरकारी मुआयने तक ही क्यों सिमट जाती है? महज चार लोकसभा सीटों के रूप में हिमाचल को गिनने वाले केंद्रीय सत्ताधारियों को कब यह महसूस होगा कि इन चार क्षेत्रों में भी जीवन बसता है। बहरहाल किसी बाहरी इमदाद की अपेक्षा किए बगैर हिमाचल सरकार को स्वयं ही अपने प्रबंध पुख्ता करने होंगे, ताकि बरसाती नुकसान को न्यूनतम स्तर तक सीमित किया जा सके।

 

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