पीठ-शक्तियों के बाद चक्रनायक का पूजन

उपरोक्त पीठ शक्तियों का पूजन करने के बाद चक्रनायक का पूजन करना चाहिए। यथा ः ऐं परायै अपरायै परापरायै हसौः। सदाशिव महाप्रेत पद्मासनाय नमः। पीठ पूजा के पश्चात पुनः पुष्पांजलि अर्पित करें ः  हृं श्रीं प्रकट गुप्तगुप्ततर संप्रदाय कुलनिगर्भरहस्या तिरहस्य परापर रहस्य संज्ञक श्रीचक्रगत योगिनी पादुकाभ्यौ नमः…

-गतांक से आगे…

ओउम कं कलतत्त्वाय नमः।

ओउम विं विद्यातत्त्वाय नमः।

ओउम णं परतत्त्वाय नमः।

ओउम बं ब्रह्मप्रेताय नमः।

ओउम विं विष्णुप्रेताय नमः।

ओउम रुं रुद्रप्रेताय नमः।

ओउम इं ईश्वरप्रेताय नमः।

ओउम सं सदाशिवप्रेताय नमः।

ओउम सुधार्णवानाय नमः।

ओउम प्रेताम्बुजासनाय नमः।

ओउम दिव्यासनाय नमः।

ओउम चक्रासनाय नमः।

ओउम सर्वयंत्रासनाय नमः।

ओउम साध्यसिद्धासनाय नमः।

इसके बाद श्रीयंत्र का विधि-विधान से पूजन कर पूर्वादि दिशाओं व मध्य में नौ पीठ शक्तियों का पूजन करें। यथा ः

ओउम इं इच्छायै नमः।

ओउम ज्ञां ज्ञानायै नमः।

ओउम क्रिं क्रियायै नमः।

ओउम कां कामिन्यै नमः।

ओउम कां कामदायिन्यै नमः।

मध्य में

ओउम रं रत्यै नमः।

ओउम रतिप्रियायै नमः।

ओउम नं नंदायै नमः।

ओउम मं नंदायै नमः।

उपरोक्त पीठ शक्तियों का पूजन करने के बाद चक्रनायक का पूजन करना चाहिए। यथा ः

ऐं परायै अपरायै परापरायै हसौः।

सदाशिव महाप्रेत पद्मासनाय नमः।

पीठ पूजा के पश्चात पुनः पुष्पांजलि अर्पित करें ः

ह्रीं श्रीं प्रकट गुप्तगुप्ततर संप्रदाय कुलनिगर्भरहस्या तिरहस्य परापर रहस्य संज्ञक श्रीचक्रगत योगिनी पादुकाभ्यौ नमः।

अब त्रिखंड मुद्रा बनाकर तथा अंजलि में पुष्प लेकर पूर्व वर्णित (बालार्कायुत तेजसां त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनीं। नानालंकृति राजमानवपुषं बलोडुराट् शेखरम।। हस्तैरिक्षुधनुः सृणिसमुशरंपाशं मुगा बिभ्रतीं। श्रीचक्रस्थित सुंदरीं त्रिजगतामाधारभूतां स्मरेत।।) मंत्र देवी के स्वरूप का ध्यान कर मूल मंत्र का उच्चारण करें, फिर हृदयकमल से नासिकारंध्र में निर्गत एवं ब्रह्मरंध्र मार्ग से स्रावित चैतन्य (तेज) को पुष्पांजलि, आवाहनी मुद्रा में लेकर श्रीचक्रराज पर स्थापित कर निम्नलिखित उच्चारण करें ः

महापद्मवनांतस्थे कारणानंदधिग्रहे।

सर्वभूतहिते मातरेह्रोहि परमेश्वरि।।

देवेशि भक्तिसुलभे सर्वावरण संयुते।

यावत्त्वां पूजयिष्यामि तावत्त्वं सुस्थिराभव।। 

भैरवी मंत्र

ह्स्त्रें ह्स्क्ल्रीं ह्सौः।

स्थापना मंत्र

श्रीमत्रिपुरसुंदरि चक्रेअस्मिन कुरु सान्निध्य नमः।

इस प्रकार स्थापना के बाद स्थापनी, सन्निधान, सन्निरोध, सम्मुखी, सकलीकरण, अवगुंठन, अमृतीकरण, परमीकरण आदि मुद्राओं को प्रदर्शित करें। तत्पश्चात मूल मंत्र से पाद्यादि उपचारों से लेकर पुष्प अर्पित करने तक विधिवत पूजन कर तीन बार तर्पण करें। फिर पुष्पांजलि लेकर भगवती का विधिवत ध्यान कर आवरण-पूजा हेतु भगवती की आज्ञा लेकर पूजा आरंभ करें।

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