मिंजर की परंपरा निभा रहा मिर्जा परिवार

 चंबा  —रावी औेर साल नदियों के बीच बसे हजार वर्ष पुराने खूबसूरत शहर चंबा के एहितासिक मैदान में साबन माह के दूसरे रविवार को लगने वाला आठ दिवसीय मिंजर मेला कई साबन की फुहारों के साथ आपसी भाईचारे का भी रंग विखेरात है। मुस्लिम मिर्जा परिवार की ओर से भगवान रघुनाथ एवं लक्ष्मी नारायण को मिंजर अर्पित करने के बाद मिंजर मेले का आगाज  होता है। यह प्रथा सदियों से चली आ रही है। कलाकारी में निपुण जरी गोटों एवं रेशम के धागों से कढ़ाई के क्षेत्र में रंग विखेरने वाले मिर्जा परिवार को राजा पृथ्वी सिंह चंबा लाए थे। तभी से लेकर यह परिवार अपने हाथों से मक्की धान के तिल्ले से बनी मिंजर रघुनाथ को अर्पित करते हैं ओर मिंजर का शुभारंभ होता। माना जाता है कि 17 शताब्दी में चंबा के राजा पृथ्वी सिंह जब नूरपुर के राजा जीत सिंह को पराजित कर  चंबा पहुंचे थे, तो लोगों ने मक्की एवं धान की मिंजर पहना का उनका भव्य स्वागत किया था।  तब से यह मिंजर उत्सव मनाया जाता है। सप्ताहभर चलने वाले मेले का आगजा हर रोज मल्हार गा कर किया जाता है। जो चंबा के धरोहर गीत हैं। कहा जाता है कि 17 वीं सदी के आरंभ में शुरू हुए मिंजर मेले का समापन कट्टे (भैंसा)को रावी में बहा कर किया जाता था। भैंसा पानी के बहाव में बह जाता था तो शुभ माना जाता था, लेकिन पानी के बहाव से किनारे पर तैर कर कटा बच जाता था तो यह उतना शुभ संकेते नहीं होता था। बाद में यह परंपरा बदल गई अब फूल नारियाल के साथ बहन की ओर से भाई को पहनाई गई मिंजर को पूजा अर्चना के बाद नदी में विसर्जित किया जाता है।  मिंजर के समापन समारोह पर देवी देवताओं की झांकियां निकाली जाती हैं।  जिससे यह त्योहार आस्था के साथ सौहार्द एवं भाईचारे की मिसाल पेश करता हे।

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