रथ पर जगन्नाथ

जगन्नाथ रथयात्रा दस दिवसीय महोत्सव होता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। देश-विदेश से लाखों लोग इस पर्व के साक्षी बनने हर वर्ष यहां आते हैं। भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं। साथ ही यहां बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं। वर्तमान रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु, कृष्ण, वामन और बुद्ध हैं…

जगन्नाथपुरी की रथयात्रा वस्तुतः भक्ति की यात्रा है। भक्ति का जैसा सैलाब यहां पर दिखता है, वह अनूठा है। यह यात्रा बताती है कि अनुभूति तर्क से बड़ी है। यदि व्यक्ति अनुभूति को उपलब्ध हो जाता है, तो उसे तर्क की बैसाखी की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह यात्रा सामाजिक-समरसता का भी सबसे बड़ा संदेश है। इसमें सबकी सहभागिता के लिए स्थान खुला हुआ है। जाति, लिंग, वर्ण का भेद समाप्त हो जाता है। इसलिए भक्ति अपने उत्कृष्टतम रूप में इस यात्रा के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। यह यात्रा भक्ति का कुंभ है। दुनिया भर में आस्था के इस सैलाब को आश्चर्य का विश्व माना जा सकता है, लेकिन हमारे लिए तो यह भक्ति-परंपरा की जीवंत यात्रा है। सागर तट पर बसे पुरी शहर में होने वाले जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव के समय आस्था का जो विराट वैभव देखने को मिलता है, वह और कहीं दुर्लभ है। इस रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुंचने का बहुत ही सुनहरा अवसर प्राप्त होता है। जगन्नाथ रथयात्रा दस दिवसीय महोत्सव होता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। देश-विदेश से लाखों लोग इस पर्व के साक्षी बनने हर वर्ष यहां आते हैं। भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं। साथ ही यहां बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं। वर्तमान रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु, कृष्ण, वामन और बुद्ध हैं। जगन्नाथ मंदिर में पूजा, आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन धर्मावलंबियों ने भी प्रभावित किया है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होता है, ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करती है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता, बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है। रथयात्रा आरंभ होने से पूर्व पुराने राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से सोने के हत्थे वाली झाडू से ठाकुर जी के प्रस्थान मार्ग को बुहारते हैं। इसके बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ रथयात्रा शुरू होती है। कई वाद्ययंत्रों की ध्वनि के मध्य विशाल रथों को हजारों लोग मोटे-मोटे रस्सों से खींचते हैं। सबसे पहले बलभद्र का रथ तालध्वज प्रस्थान करता है। थोड़ी देर बाद सुभद्रा की यात्रा शुरू होती है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। लोग मानते हैं कि रथयात्रा में सहयोग से मोक्ष मिलता है, अतः सभी कुछ पल के लिए रथ खींचने को आतुर रहते हैं। जगन्नाथ जी की यह रथयात्रा गुंडीचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। गुंडीचा मंदिर वहीं है, जहां विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। इसे गुंडीचा बाड़ी भी कहते हैं। यह भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। सूर्यास्त तक यदि कोई रथ गुंडीचा मंदिर नहीं पहुंच पाता तो वह अगले दिन यात्रा पूरी करता है। गुंडीचा मंदिर में भगवान एक सप्ताह प्रवास करते हैं। इस बीच इनकी पूजा अर्चना यहीं होती है। जगन्नाथ जी की रथयात्रा में श्रीकृष्ण के साथ राधा या रुक्मिणी के स्थान पर बलराम और सुभद्रा होते हैं। इस संबंध में कथा इस प्रकार है – एक बार द्वारिका में श्रीकृष्ण रुक्मिणी आदि राजमहिषियों के साथ शयन करते हुए निद्रा में राधे-राधे बोल पड़े। महारानियों को आश्चर्य हुआ। सुबह जागने पर श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं किया। रुक्मिणी ने रानियों से बात की कि वृंदावन में राधा नाम की गोपकुमारी है जिसको प्रभु हम सबकी इतनी सेवा, निष्ठा और भक्ति के बाद भी नहीं भूल पाए हैं। राधा की श्रीकृष्ण के साथ रासलीलाओं के विषय में माता रोहिणी को ज्ञान होगा। अतः उनसे सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की, कि वह इस विषय में बताएं। पहले तो माता रोहिणी ने इनकार किया, किंतु महारानियों के अति आग्रह पर उन्होंने कहा कि ठीक है, पहले सुभद्रा को पहरे पर बिठा दो, कोई भी अंदर न आ पाए, चाहे वह बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों।

माता रोहिणी ने जैसे ही कथा कहना शुरू किया, अचानक श्रीकृष्ण और बलराम महल की ओर आते हुए दिखाई दिए। सुभद्रा ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया, किंतु श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की कथा श्रीकृष्ण और बलराम दोनों को ही सुनाई दी। उसको सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम अद्भुत प्रेमरस का अनुभव करने लगे, सुभद्रा भी भावविह्वल हो गई। अचानक नारद के आने से वे पूर्ववत हो गए। नारद ने श्री भगवान से प्रार्थना की कि -‘हे प्रभु, आपके जिस ‘महाभाव’ में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्यजन के हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे।’ इस पर प्रभु ने तथास्तु कहा।

बाहुड़ा यात्रा

आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा शुरू होती है। इसे बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। शाम से पूर्व ही रथ जगन्नाथ मंदिर तक पहुंच जाते हैं जहां एक दिन प्रतिमाएं भक्तों के दर्शन के लिए रथ में ही रखी रहती हैं। अगले दिन प्रतिमाओं को मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के गर्भगृह में पुनः स्थापित कर दिया जाता है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की सौम्य प्रतिमाओं को श्रद्धालु एकदम निकट से देख सकते हैं। जिस वर्ष अधिमास रूप में आषाढ़ माह अतिरिक्त होता है, उस वर्ष भगवान की नई मूर्तियां बनाई जाती हैं। यह अवसर भी उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही समाधि दी जाती है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से शुरू हो जाती है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं।

गरुड़ध्वज

जगन्नाथ जी का रथ गरुड़ध्वज या कपिलध्वज कहलाता है। 16 पहियों वाला यह रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है जिसमें लाल व पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग होता है। विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी रक्षा करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे त्रैलोक्यमोहिनी या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं।

तालध्वज

बलराम का रथ तालध्वज के नाम से पहचाना जाता है। यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं।

पद्मध्वज या दर्पदलन

सुभद्रा का रथ पद्मध्वज कहलाता है। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का प्रयोग होता है।

श्री जगन्नाथ जी की आरती

आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी,

परसत चरणारविंद आपदा हरी।

निरखत मुखारविंद आपदा हरी,

कंचन धूप ध्यान ज्योति जगमगी।

अग्नि कुंडल घृत पाव सथरी। आरती..

देवन द्वारे ठाड़े रोहिणी खड़ी,

मारकंडे श्वेत गंगा आन करी।

गरुड़ खम्भ सिंह पौर यात्री जुड़ी,

यात्री की भीड़ बहुत बेंत की छड़ी। आरती ..

धन्य-धन्य सूरश्याम आज की घड़ी। आरती ..

जगन्नाथ अष्टकम

कदाचि त्कालिंदी तटविपिनसंगीतकपरो

मुदा गोपीनारी वदनकमलास्वादमधुपः

रमाशंभुब्रह्मा मरपतिगणेशार्चितपदो

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 1 ॥

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिंछं कटितटे

दुकूलं नेत्रांते सहचर कटाक्षं विदधते

सदा श्रीमद्बृंदा वनवसतिलीलापरिचयो

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 2 ॥

महांभोधेस्तीरे कनकरुचिरे नीलशिखरे

वसंप्रासादांत-स्सहजबलभद्रेण बलिना

सुभद्रामध्यस्थ स्सकलसुरसेवावसरदो

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 3 ॥

कथापारावारा स्सजलजलदश्रेणिरुचिरो

रमावाणीसौम स्सुरदमलपद्मोद्भवमुखैः

सुरेंद्रै राराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 4 ॥

रथारूढो गच्छन्पथि मिलङतभूदेवपटलैः

स्तुतिप्रादुर्भावं प्रतिपद मुपाकर्ण्य सदयः

दयासिंधुर्भानु सकलजगता सिंधुसुतया

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 5 ॥

परब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो

निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोनंतशिरसि

रसानंदो राधा सरसवपुरालिंगनसुखो

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 6 ॥

न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकितां भोगविभवं

न याचे2 हं रम्यां निखिलजनकाम्यां वरवधूं

सदा काले काले प्रमथपतिना चीतचरितो

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 7 ॥

हर त्वं संसारं दु्रततर मसारं सुरपते

हर त्वं पापानां वितति मपरां यादवपते

अहो दीनानाथं निहित मचलं निश्चितपदं

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 8 ॥

इति जगन्नाथाष्टकम

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