श्री विश्वकर्मा पुराण

धर्मराज के ऐसे वचन सुनकर कार्तिक तथा नारदजी को चिंता होने लगी कि जिस तीर्थ को सबसे महानता प्राप्त है, उसका नाश हो ये किसको अच्छा लगे, फिर इस बात में इस दोष भी क्या था ब्रह्माजी ने प्रश्न किया था और जब उसका किसी ने उत्तर न दिया, तब ही इसने उत्तर दिया था…

इस सभा खंड में विराट के जैमिने हाथ की तरफ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धर्मराज और कार्तिकेय वगैरह दिख रहे थे, सब सभा के बीच में ब्रह्मदेव खड़े हुए तथा विराट सहित सारी सभा को प्रणाम करके मेघ के समान गंभीर वाणी से ब्रह्मदेव बोले, हे तीर्थ देवताओं तुम्हारे सबके एक साथ में दर्शन करने की इच्छा से मैंने आप सबको बुलाया है, अपने आंगन में बिठाए हुए अतिथि का यजमान को उत्तम प्रकार से सत्कार करना, ये गृहस्थ का धर्म है। इसलिए मैं आप सबका यथोचित पूजन करने की इच्छा रखता हूं, परंतु संख्या में अधिक होने से ऐसे आप सबका पूजन करना ये असत्य होने से मुझे क्या करना, इसकी मुझको समझ आती नहीं, इसलिए ये सभा मुझे जिस प्रकार आदेश दे, उसे मैं पूरा करूंगा।  ब्रह्माजी के ऐसे वचन सुनकर विष्णु बोले, हे सब धर्मों को जानने वाले तथा उनका योग्य नीति से पालन करने वाले धर्मराज जो आदेश देंगे, वह सारी सभा को मंजूर होगा। धर्म के बारे में तो उनके समान विशेष योग्यता दूसरे किसकी हो सकती है, विष्णु के इस प्रकार के वचन सुनकर धर्मराज बोले, हे ब्रह्मदेव सब तीर्थों का पूजन करना ये असत्य होने से आप उन सब में जो सबसे महान हो, उसका एक का ही पूजन करो। सबसे बड़े का पूजन करने से सबका पूजन करने के बराबर माना जाता है और इससे दूसरे तीर्थों का पूजन न करने का दोष भी आपको नहीं लगेगा। धर्मराज के इस आदेश से प्रसन्न हुए ब्रह्मदेव तुरंत ही बोले, हे तीर्थ देवताओं तुम सब में महानता की दृष्टि से जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसकी पूजा करने के लिए मैं तैयार हूं। सो आप में से जो सर्वश्रेष्ठ हो, वह मुझसे कहो, जिससे मैं उसकी पूजा कर सकूं। ब्रह्मदेव के वचन सुनकर सब तीर्थ एक-दूसरे की तरफ देखते हुए विचार करने लगे, परंतु कोई भी कुछ बोला नहीं , विराट प्रभु भी यदभावित तद भविष्यति अर्थात जो होना हो वो होना ही है। इस प्रकार अत्यंत समय बीत गया, फिर कोई कुछ बोला नहीं, जब ब्रह्मा जी फिर बोले और वही प्रश्न किया, तब देहधारी स्तंभ तीर्थ के अधिष्ठता देव खड़े हुए तथा सारी सभा को प्रणाम कर ब्रह्मदेव के प्रति बोले, हे ब्रह्मदेव! पृथ्वी स्वर्ग और पाताल में रहे हुए एक करोड़ तीर्थों में सबसे महान तीर्थ मैं हूं, इसलिए आप मेरी पूजा करो, मेरा पूजन करने से इन सब तीर्थों का पूजन करने के बराबर होगा, इसें कोई शंका नहीं स्तंभ तीर्थ के ऐसे वचनों को सुनकर तुरंत ही सभा में से धर्मराज खड़े होकर बोले, हे देवताओं! ऋषियो इस स्तंभ को अपनी महानता का अभिमान है और इसी से ये निर्लज्ज की तरह सभा में अपने आपका बखान कर रहा है, इसलिए ये दंड का पात्र है, इसलिए मैं इसको श्राप देता हूं, कलियुग में इसका नाश होगा और इसका नामोनिशान न रहेगा। धर्मराज के ऐसे वचन सुनकर कार्तिक तथा नारदजी को चिंता होने लगी कि जिस तीर्थ को सबसे महानता प्राप्त है, उसका नाश हो ये किसको अच्छा लगे, फिर इस बात में दोष भी क्या था ब्रह्माजी ने प्रश्न किया था और जब उसका किसी ने उत्तर न दिया, तब ही इसने उत्तर दिया था। कार्तिक बोले, हे धर्मराज धर्म का ही पालन कराने वाले तुम्हारे हाथ से ही इस प्रकार का अन्याय हो, तो इस सृष्टि का नाश होगा, इसलिए आप अपना दिया श्राप वापस लो, इस प्रकार धर्मराज तथा कार्तिक और नारद जी के बीच बहुत देर तक चर्चा चली और धीरे-धीरे वातावरण में उग्रता आने लगी, तब विष्णु ने विचार किया कि जो इस प्रकार ही चलेगा, तो ये दोनों देवता लड़ मरेंगे और इससे अंदर ही अंदर बैर बढ़ेगा, इसलिए इस झगड़े को शीघ्रता से निपटाना चाहिए।

 

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