न अमरीका; न यूरोप, यह पीएचडी सिर्फ सोलन में

सोलन  – न अमरीका और न ही यूरोप अब कीट पतंगों की पीएचडी होगी तो सिर्फ हिमाचल के सोलन जिला में। जी हां! दुनिया के किसी भी कोने में हायमेनोटेरा यानी रंगड़ों, कीड़े मकौड़ों व बड़े कीट पतंगों (कलापक्ष) व सॉफ्लाइस पर अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों व विद्यार्थियों को पढ़ाई पूरी करने के लिए सोलन स्थित भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग का विजिट करना ही पड़ेगा। इसका कारण यह है कि विभाग द्वारा महत्त्वाकांक्षी परियोजना के तहत बनाई जा रही हिमालयन रिपोजिटरी में इस ग्रुप के ऐसे होलो टाइप इंसेक्ट्स रखे जाएंगे, जो कि दुनिया की अन्य रिपोजिटरी में उपलब्ध नहीं होंगे। ऐसे में इस ग्रुप पर कार्य करने वालों को अध्ययन पूरा करने के लिए हिमालयन रिपोजिटरी आना अनिवार्य हो जाएगा। इस रिपोजिटरी का निर्माण अंतिम चरण में है और संभवतः अक्तूबर में इसका शुभारंभ कर दिया जाएगा। करीब 1.50 करोड़ रुपए की लागत से बनने जा रही यह रिपोजिटरी उत्तर भारत की पहली हिमालयन रिपोजिटरी होगी और इससे हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, जे एंड के व उत्तराखंड के वैज्ञानिकों व विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा। इस रिपोजिटरी में देश भर में पश्चिमी हिमालय प्राणी संपदा पर हुए शोध रखे जाएंगे। वैज्ञानिकों के लिए यह एक अमूल्य संपदा है और इससे न केवल उन्हें लाभ मिलेगा, वहीं सोलन भी विश्व मानचित्र पर और तेजी से उभरेगा।

विलुप्त फौना का भी होगा संरक्षण

पश्चिमी हिमालय प्राणी संपदा पर अब तक काफी कार्य हुआ है, लेकिन कोई रिपोजिटरी न होने से यह सारा शोध बिखरा हुआ है। रिपोजिटरी को स्थापित करने का उद्देश्य यह भी है कि भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग द्वारा आज तक किए गए शोध कार्य जनसाधारण तक पहुंच सकें। वहीं, हिमालयन रेंज में मिलने वाले विलुप्त हो रहे फौना का संरक्षण हो सके।

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