पीयूष राज की गजल के कायल थे ज्ञानी जैल सिंह

पीयूष राज ने अपनी एक गजल की शुरुआत में कमानी ऑडिटोरियम में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के समक्ष गजल गाई, जिसे  उन्होंने  2 घंटे तक सुना तथा सराहा। पीयूष राज केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय से नेशनल स्कॉलरशिप अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके हैं …

चंबा तथा हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक संगीत को ऊपर उठाने में अहम भूमिका निभा चुके प्रसिद्ध लोक गायक पीयूष राज को यह मलाल है कि प्रदेश सरकार ने उनकी प्रतिभा को नहीं पहचाना है, जबकि प्रदेश के लोक संगीत प्रेमी उन्हें अच्छी तरह जानते पहचानते हैं। कई अवार्ड जीत चुके पीयूष राज का कहना है कि प्रदेश की भरपूर समृद्ध लोक संस्कृति को जिस प्रकार वर्तमान में पेश किया जा रहा है, उससे प्रदेश व जिला का लोक संगीत लगभग समाप्ति के कगार पर है। चंबा के समृद्ध फोक को ऊंचा उठाने के मकसद से ही पीयूष राज ने वर्ष 1983 में चंबा से पलायन कर दिल्ली में गुरु- शिष्य परंपरा के जरिए गुरु खोजने की तलाश शुरू की। गजल- भजन व फोक म्यूजिक के जरिए हिट हुए पीयूष राज अपनी जवानी के दिनों से ही इनमें प्रसिद्ध हो गए थे तथा युवा उत्सव व संगीत की प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे। उन्होंने गजल को प्राथमिकता दी तथा इसके लिए आदर्श उस्ताद मेहंदी अली खान साहब को बनाया। क्लासिकल संगीत में पारंपरिक गुरु- शिष्य परंपरा निभाने की सूजी जिस कारण मुझे दिल्ली जाना पड़ा। अपने गुरु की तलाश में दिल्ली में उन्हें बहुत से गुरु मिले, पर आखिरकार ग्वालियर घराने से संबंधित लक्ष्मण कृष्णराव पंडित को अपने पारंपरिक गुरु के रूप में पा ही लिया। पीयूष राज पहले ऐसे व्यक्ति हैं ,जिन्होंने प्रदेश के लोक संगीत को 1983 में व्यावसायिक रूप दिया तथा रितु रानी नाम की कैसेट निकाली जो बहुत हिट हुई। इन्हीं की मेहनत का फल था कि 1980 व 90 के दशक में श्रीकृष्ण निकली जिनमें एक हिमाचल के लोकगीत थे, जिसे एचएमवी जैसी मशहूर कंपनी ने बनाया। पीयूष राज ने अपनी एक गजल की शुरुआत में कमानी ऑडिटोरियम में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के समक्ष गजल गाई, जिसे ज्ञानी जैल सिंह ने 2 घंटे तक सुना तथा सराहा। पीयूष राज केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय से नेशनल स्कॉलरशिप अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके हैं। वह हिमाचली फोक के लिए उन्हें मिला है। इसके अलावा आईसीसीआर ने उन्हें अपने पैनल में बेस्ट परफार्मर गजल तथा फोक म्यूजिकल के लिए चुना है। पीयूष राज ने बंजारा भाग 1 तथा बंजारा भाग 2 वीडियो कैसेट में भी गया तथा फिल्मांकन किया। इन दोनों वीडियो कैसेट ने उन्हें आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा दिया। पीयूष राज एक राजस्थानी फिल्म चूड़ा एक प्रथा में भी प्लेबैक सिंगर के रूप में अपनी आवाज दे चुके हैं।  हिंदी फिल्म फिनिशड लाइन में भी गजल गाई है। ये दोनों ही फिल्में जल्द रिलीज होने वाली हैं।  पीयूष राज का मानना है कि प्रदेश समृद्ध संस्कृति से भरपूर है, मगर मेला व उत्सव में बालीवुड कल्चर प्रदेश पर थोपा जा रहा है। प्रदेश में होने वाले राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय मेलों में वैसे तो करोड़ों का कारोबार हो रहा है। मेलों के दौरान बालीवुड वर्क पंजाबी कल्चर थोपा जा रहा है। 80 से 90 फीसदी पैसा पंजाब व मुंबई जा रहा है। कहने को मेलों के दौरान हिमाचली लोक गीतों का काफी ढोल पीटा जाता है, मगर जब प्रदर्शन देने की बारी आती है, तो अच्छे कलाकारों को सीधे बाहर का रास्ता दिखाया जाता है। मात्र 10 से 15 फीसदी जो कलाकार हिमाचली बचते हैं, उन्हें मंच दिया जाता है, मगर उसमें भी ऐसे कलाकार हैं जो या तो बालीवुड की नकल करते हैं  जिस कारण नई पीढ़ी अपनी लोक परंपरा से दूर होती जा रही है। अनुसार इसकी कमान ऐसे अधिकारियों के हाथों नहीं होनी चाहिए, जिन्हें हिमाचल के लोक संगीत का न तो ध्यान है न पहचान उनके लिए तो मात्र यह हर वर्ष का बजट है इसे खर्च करना ही है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय सांस्कृ तिक विभाग तथा स्थानीय कमेटियों के समन्वयक इस कार्यक्रम को निभाने में अगर अपनी भूमिका दें, तो कोई कारण नहीं कि नई पीढ़ी प्रदेश की समृद्ध संस्कृति से अवगत हो सके। वर्ष 1961 में पीयूष राज का जन्म चंबा में ही हुआ। पीयूष राज के पिता जेसी तूर निरीक्षक रहे हैं। उन्होंने  बचपन में ही गाना शुरू किया था, जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने दादा- चाचा से मिली। अब इन्हीं के नक्शे कदम पर इनकी बेटी भी चली है जो इन दिनों मुंबई में है  काफी फिल्मों में अपनी आवाज दे चुकी है।  पीयूष राज का कहना है कि उन्हें  सरकार से आज तक कोई सम्मान नहीं मिला, जिसकी उन्हें चुभन है। उनके अनुसार वर्ष 2016 में लाइव टाइम आवाज से सम्मानित किया गया जो इसके अलावा वर्ष 2017 में उन्हें एक स्वयंसेवी संगठन हिमानी एक्सप्रेस ने विशेष अतिथि गौरव अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया।

जब रू-ब-रू हुए…

गायन को दिशा देने वाले दर्शक की जरूरत

हिमाचली लोक गायन की वर्तमान स्थिति को आप कैसे देखते हैं?

प्रदेश में लोक गायन की स्थिति वर्तमान दौर में बहुत दयनीय है, ऐसा लगता है कि हमारा फोटो अंतिम सांसें ले रहा है।

प्रमुख कारण जो निराश करते हैं या प्रतिकूलता के बावजूद जहां कहीं आशा के दीप जल रहे हैं?

फोक में वेस्टर्न कल्चर के साथ बीट्स हावी हो रहा है। आशा बिलकुल जग सकती है।

गायन में गुरु की भूमिका कब अंगीकार होती है या आपने किस तरह गुरु पाया?

सही विधि से गाना एक गुरु ही सिखा सकता है।   कालेज के समय मेें संगीत विषय रखा तथा उसी में ही लीन होकर रह गया। कई बार तो मैं म्यूजिक रूम में ही रहा तथा कई रातें गुजारीं। उस समय के संगीत प्रवक्ता पंडित श्याम सुंदर शर्मा के दिशा-निर्देश में   मैंने संगीत सीखा।

कहने को तो हिमाचल में कला संस्कृति एवं भाषा विभाग तथा अकादमी है, फिर कलाकार निराश क्यों हैं?

अगर प्रशासन और सरकार को इस बात का एहसास हो कि लोगों को एक ही परोसा जाए न कि पश्चिमी व पंजाबी सभ्यता। इसमें लोगों का कोई कसूर नहीं जो उन्हें दिखाया जा रहा है, वही वे देख रहे हैं। गायन गॉड गिफ्ट है, मगर उसके साथ उसे दिशा देने वाला भी जरूर होना चाहिए।

क्या लोक कला और लोक कलाकार के पक्ष में कोई खड़ा नहीं है?

स्कूलों में तो मात्र क्लासिकल संगीत की शिक्षा दी जाती है, फोक संगीत की नहीं। लोक कलाकारों के पक्ष में केवल वही लोग खड़े हैं, जो खुद लोक कला से प्यार करते हैं

हिमाचल में करीब चार दर्जन सांस्कृतिक समारोह होते हैं, फिर भी प्रदेश का कलाकार भूखा क्यों है?

खुद लोक कला से प्यार करते हैं, मगर ये चंद लोग ही हैं वे भी आज निस्सहाय हैं, जिनकी कोई पूछ नहीं। कलाकारों को वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं।  मिंजर मेले की बात करें तो इसकी स्टेज पर चंबा का एक भी कलाकार अपना कार्यक्रम नहीं दे पाएगा, जबकि यहां से तीन- चार लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं।

सामाजिक नजरिए में जो अंतर आ रहा है, उसे कैसे देखते हैं?

जिला में स्टेज न मिले तो गायक किस प्रकार प्रशासन व सरकार से यह उम्मीद रख सकता है। घर की मुर्गी दाल बराबर वाली कहावत हो, तो कलाकार भूखा ही मरेगा।  बुद्धिजीवी सामाजिक नजरिए में लोक संगीत को भारी नुकसान मानते हैं।

अभिभावक बच्चों के टेलेंट को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन शिक्षण -प्रशिक्षण में कोई वचनबद्धता दिखाई नहीं देती, अलबत्ता अधकचरे गायक सारी विद्या को कचरा बना रहे हैं?

आज तो बाहरी कल्चर का इसमें पूरी तरह दखल है यह मात्र प्रशासन के कारण ही है। बच्चे को शुरू से ही अच्छा शिक्षण- प्रशिक्षण मिले और देश अच्छा हो तो वह बड़ों का मुकाबला कर सकता है, मगर प्रशिक्षण सही ढंग से न हुआ तो वह कचरा ही साबित होगा तथा कचरा ही पेश करेगा।

कोई ऐसा अनुभव जिससे दुनिया बदल गई या ऐसा आशीर्वाद जो देवता बन सामने आया? आपके अनुसार प्रोफेशनल सिंगर कैसे बन सकते हैं। ऐसे में हिमाचली प्रतिभाओं को आपका संदेश क्या रहेगा?

दिल्ली में आकाशवाणी में मैंने गाना शुरू किया, तो वहां एस शशि जो शिमला रेडियो के लिए संगीतकार थे उनसे मिला  तथा उनके साथ ने ही मेरी दुनिया बदल दी। उन्होंने ही मुझे कई संगीत के टिप्स बताए। मेरा सिर्फ  यही संदेश है कि अच्छा सीखो बेसिक सीखो तभी प्रोफेशनल बन पाओगे। इसके लिए धैर्य जरूरी है।

पर्वत से निकले संगीत की किस खासियत को आप संजोना चाहेंगे और अगर अवसर मिला तो क्या योगदान करेंगे?

हिमाचली संगीत को विश्व स्तर पर ले जाना एकमात्र इच्छा है। हिमाचल के संगीत में खासकर चंबा के ेसंगीत में वह खासियत है, जो दूसरों में नहीं, अगर मुझे मौका मिला तो मैं चंबा के संगीत को विश्व स्तर पर लाना चाहूंगा।

चंद लोक गीत जिन्हें रूह के करीब पाते हैं? हिमाचली गीत-संगीत की दिशा में नए सृजन की कमी है, तो क्या पहाड़ी लेखक कहीं दूर खड़ा है?

इस बात की मुझे खुशी है कि कलाकार की खोज कभी पूरी होती नहीं, मगर अफसोस जरूर है इस बात का कि लोक गायन पर जिस तरह उन लोगों का नियंत्रण है, जिन्हें संगीत का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं। न ही उन लोगों को हमारे संगीत से कोई लगाव है, तो भूखा रह जाएगा यह आप खुद अंदाजा लगाइए।

अपनी बेटी की सफलता को कैसे देखते हैं। नजर में हिमाचल के अन्य उभरते कलाकार?

मुझे अपनी बेटी पर गर्व है कि उसने लोक संगीत के साथ- साथ पश्चिमी संगीत को भी पूरी तरह ईमानदारी से निभाया है। उसने 34 बालीवुड फिल्मों में भी अपनी आवाज दी है उसे मैंने शुरू से क्लासिकल से लेकर दूसरे संगीत का ज्ञान दिया।

कोई सपना जिसे बस छूना भर बाकी है या अब तक की मंजिलों के बावजूद जिसे ‘पीयूष’ की खोज जारी है?

मेरा सपना तो बस यही है कि प्रदेश के लोकगीत खासकर चंबा के संगीत को विश्व में अच्छी पहचान मिले तथा वह विश्व स्तर पर जाए, मगर आज तू अपने घर में ही बेगाना है।

-हामिद खान, चंबा

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