समृद्धि का सत्रहवां देश

अब इस एक खरब डालर के क्लब में एक नए सदस्य का प्रवेश है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह कोई देश नहीं बल्कि कंपनी है। आई-फोन और आई-पैड जैसे उपकरणों के जरिए संचार तकनीक को नई परिभाषा देने वाली कंपनी अब एक खरब डालर की कंपनी बन गई है…

2017 में इंडोनेशिया ने ट्रिलियन डालर इकॉनोमी क्लब में 16वें देश के रूप में प्रवेश किया था, तब पूरी दुनिया में इंडोनेशिया की चर्चा एक नई आर्थिक शक्ति के रूप में हुई थी। भारत और रूस 2007 में जाकर ट्रिलियन डालर इकॉनोमी (1 खरब डालर की अर्थव्यवस्था ) बन सके थे। इससे पूरी दुनिया भारत को एक संभावित महाशक्ति के रूप में देखने लगी और दुनिया ने भारत को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया।

अब इस एक खरब डालर के क्लब में एक नए सदस्य का प्रवेश है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह कोई देश नहीं बल्कि कंपनी है। आई-फोन और आई-पैड जैसे उपकरणों के जरिए संचार तकनीक को नई परिभाषा देने वाली कंपनी अब एक खरब डालर की कंपनी बन गई है। एप्पल ने दूसरी बड़ी कंपनियों जैसे अमेजॉन, माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक को पछाड़ते हुए पहली कंपनी बनी है, जिसने एक खरब का आंकड़ा छुआ है।

कंपनी के शेयर में असाधारण बढ़ोतरी के कारण उसको यह उपलब्धि हासिल हुई है। शेयर की कीमत इसलिए तेजी से बढ़ी, क्योंकि कंपनी की पिछले तीन महीने की प्रदर्शन रिपोर्ट काफी उत्साहजनक थी। गौरतलब है कि 2007 में आई-फोन बाजार में आया था और उसके बाद से कंपनी के शेयरों में 1100 फीसदी का उछाल आया है। पिछले साल तो शेयरों की कीमत तकरीबन एक-तिहाई तक बढ़ गई। अगर कंपनी की स्थापना के साल 1980 से देखा जाए तो यह उछाल और हैरान कर देने वाला है। 1980 से अब तक पचास हजार फीसदी तक शेयरों की कीमत बढ़ गई है।

एप्पल की शुरुआत 1976 में इसके सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स ने की थी। शुरुआत में इसे मैक कम्प्यूटर्स के लिए जाना जाता था, लेकिन फिर आया आई-फोन जिसने कंपनी के सितारे ही बदल दिए। पिछले साल 229 अरब डालर की सेल और तकरीबन 48 अरब डालर का फायदा कंपनी ने दर्ज किया।

स्टीव जॉब्स के तकनीकी-नवाचार पर जोर के कारण इस कंपनी ने अन्य प्रतिस्पर्द्धी कंपनियों को बहुत पीछे छोड़ दिया और संचार-तकनीक में आधुनिकता, निजता और सुविधा का ब्रांड बनकर उभरी। एप्पल की कहानी यही बताती है कि आज के दौर में समृद्धि तकनीक केंद्रित है और यह कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आप में सप्रभु देश जैसी बनती जा रही है। उनकी धाक और समृद्धि कई बार बड़े देशों पर भी भारी पड़ जाती है।

– डा. जयप्रकाश सिंह

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