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उत्‍सव


यह राह नहीं आसां

राजनीति का ककहरा इतना जटिल है कि अपने-अपने क्षेत्रों के माहिर भी कई बार इस क्षेत्र में नौसिखिए साबित होते हैं। इरोम शर्मिला को मणिपुर के चुनावों में महज 90 वोट मिलना इस बात को साबित करता है कि राजनीति में सफलता के लिए अच्छी भावनाओं के साथ और भी बहुत कुछ होना चाहिए…

यह राह नहीं आसांमणिपुर में कई वर्षों के अनशन से इरोम शर्मिला की पहचान एक लौह इरादों वाली महिला की बनी थी। एक ऐसी महिला, जो संकल्प की धनी हैं और बदलाव के लिए अपने अस्तित्व को भी दांव पर लगा सकती हैं। किसी कानून के खिलाफ देश ही नहीं, दुनिया में सबसे लंबी भूख हड़ताल करने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला को लौह महिला कहा जाता है। 16 साल लंबे अनशन से बदलाव आता न देखकर उन्होंने इसे भंग कर दिया था और राजनीति में आकर इसे बदलने का प्रयास किया। मणिपुर में हुए चुनावों में उन्हें न के बराबर समर्थन मिला और यह बात फिर साबित हुई कि राजनीति टेढ़ी डगर पर चलना सबके वश की बात नहीं है। मणिपुर के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के खिलाफ मैदान में उतरी इरोम को सौ वोट भी नहीं मिल सके और उनकी जमानत जब्त हो गई। सशस्त्र बल विशेषाधिकार आंदोलन के विरोध की प्रतीक बनीं इरोम को वोटरों ने बुरी तरह नकार दिया। इरोम ने मणिपुर में करीब छह दशकों से लागू ‘सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम’ के खिलाफ वर्ष 2000 में आमरण अनशन शुरू किया था।  उनका यह अनशन 2016 में जाकर खत्म हुआ। उसी समय उन्होंने राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। दिसंबर में उन्होंने औपचारिक तौर पर अपनी नई पार्टी ‘पीपुल्स रीसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस’ (प्रजा) का गठन करते हुए 20 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। इरोम का कहना था कि मेरी लड़ाई की रणनीति बदली है मंजिल नहीं। मेरा लक्ष्य सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को खत्म करना है।

वह मुख्यमंत्री बन कर यह काम करना चाहती थीं, लेकिन महज तीन उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से यह संभावना तो पहले ही धूमिल हो गई थी। इबोबी सिंह की पारंपरिक थाउबल सीट से मैदान में उतरी इरोम को वोटरों ने बुरी तरह नकार दिया। इन नतीजों को लेकर इरोम कहती हैं कि मुझे नतीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह लोगों की सोच पर निर्भर है। नतीजे के बाद भी  इरोम हार मानने को तैयार नहीं हैं। हालांकि उन्होंने भविष्य में कभी चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। उनकी पार्टी के बाकी दोनों उम्मीदवार भी हार गए हैं। इनमें राज्य की पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार नजीमा बीबी भी शामिल हैं।

– डा.  जयप्रकाश सिंह

उदाहरण और भी

इरोम शर्मिला को मणिपुर में संपन्न हुए हालिया चुनाव में  सिर्फ 90 वोट मिले। यह इस बात का एक उदाहरण है कि सामाजिक संघर्ष, राजनीतिक विजय के पर्याय नहीं होते।   राजनीति में जीत हासिल करने के लिए संकल्प के साथ रणनीति भी चाहिए। 44 वर्षीय इरोम के पास इसका अभाव दिखा। उनके चुनावी काफिले में समर्थकों की तादाद सुरक्षाकर्मियों से भी कम थी। भाषण सुनने वालों की भीड़ भी नहीं दिखती थी। इसी का नतीजा है कि उन्हें 90 वोट मिले, जबकि इरोम के चुनाव क्षेत्र में 143 लोगों ने नोटा का विकल्प चुना। आंदोलनकारियों के राजनीतिज्ञ के रूप में विफल होने का इरोम ताजा उदाहरण है लेकिन पहला नहीं। इरोम से पहले भी कई सामाजिक कार्यकर्ता आंदोलन के मार्ग को छोड़कर राजनीति के जरिए परिवर्तन का प्रयास कर चुके हैं लेकिन ये असफल साबित हुए हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, सोनी सोरी और कुडनकुलम विद्युत परियोजना विरोधी  एसपी उदय कुमार ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन इन सभी को हार का मुंह देखना पड़ा।

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