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उत्‍सव


हफ्ते का खास दिन

पं. जवाहरलाल नेहरू

जन्मदिवस 14 नवंबर

1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई…

नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गए थे। इनका जन्म इलाहाबाद में 14 नवंबर, 1889 ई. को हुआ। वह पं. मोतीलाल नेहरू और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

शिक्षा

उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की। इनमें से सिर्फ एक, फर्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे।  15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी अंग्रेजी विद्यालय इंग्लैंड के हैरो स्कूल में भेजे गए। नेहरू का शिक्षा काल किसी तरह से असाधारण नहीं था। और हैरो से वह कैंब्रिज के ट्रिनिटी कालेज गए, जहां उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। कैंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और उनके अपने ही शब्दों में परीक्षा उत्तीर्ण करने में उन्हें न कीर्ति, न अपकीर्ति’ मिली।

परिवार :  भारत लौटने के चार वर्ष बाद मार्च, 1916 में नेहरू का विवाह कमला कौल के साथ हुआ, जो दिल्ली में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान इंदिरा प्रियदर्शिनी का जन्म 1917 में हुआ। बाद में विवाहोपरांत उनका नाम ‘इंदिरा गांधी’ पड़ा और वह भारत की प्रधानमंत्री बनीं तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ। जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गई थी।

बैरिस्टर के रूप में : 1912 ई. में वह बैरिस्टर बने और उसी वर्ष भारत लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में वकालत प्रारंभ की। वकालत में उनकी विशेष रुचि न थी और शीघ्र ही वह भारतीय राजनीति में भाग लेने लगे। 1912 ई. में उन्होंने बांकीपुर, बिहार में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। भारत लौटने के बाद नेहरू ने पहले वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास किया, लेकिन अपने पिता के विपरीत उनकी इस पेशे में कोई खास रुचि नहीं थी और उन्हें वकालत और वकीलों का साथ, दोनों ही नापसंद थे। उस समय वह अपनी पीढ़ी के कई अन्य लोगों की भांति भीतर से एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो अपने देश की आजादी के लिए बेताब हो, लेकिन अपने अधिकांश समकालीनों की तरह उसे हासिल करने की ठोस योजनाएं न बना पाया हो।

गांधी जी से मुलाकात : 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में वह सर्वप्रथम महात्मा गांधी के संपर्क में आए। गांधी उनसे 20 साल बड़े थे। दोनों में से किसी ने भी आरंभ में एक-दूसरे को बहुत प्रभावित नहीं किया। बहरहाल, 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई। उससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की मांग था। नेहरू की आत्मकथा से भारतीय राजनीति में उनकी गहरी रुचि का पता चलता है। उन्हीं दिनों अपने पिता को लिखे गए पत्रों से भारत की स्वतंत्रता में उन दोनों की समान रुचि दिखाई देती है, लेकिन गांधी से मुलाकात होने तक पिता और पुत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निश्चित योजनाओं का विकास नहीं हुआ था। गांधी ने उन्हें राजनीति में अपना अनुयायी बना लिया। गांधी द्वारा कर्म पर बल दिए जाने के गुण से वे दोनों प्रभावित हुए। 27 मई, 1964 को दिल्ली में उनका देहांत हो गया।

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