जातीय समीकरण में पिछड़ गया विकास

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं भाजपा जानबूझ कर मुस्लिम व ईसाई समाज से दूर रहना चाहती है, क्योंकि इससे हिंदुओं को संतोष रहता है कि भाजपा उनकी अपनी पार्टी है। यदि हिंदुओं में से दलित छिटक जाएं और मुस्लिम समाज के…

आर्थिक विकास से सहज ही जनहित नहीं

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं बाजार में श्रमिक के सच्चे वेतन में वृद्धि हासिल करने के लिए विशेष कदमों की जरूरत है। आर्थिक विकास से सहज ही सच्चे वेतन में वृद्धि नहीं होती है। आर्थिक विकास और श्रमिक के वेतन…

अलवर में मॉब लिंचिंग के सबक

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं इस तरह की घटनाएं जब भी होती हैं, लिंचिंग और लोगों पर हमले सहित, निर्विवाद रूप से मुसलमान व दलित तथाकथित गौ रक्षा के नाम पर हिंसा के शिकार हुए हैं। अपने समाज को बहुलतावादी बनाने की दिशा में हमारे…

असम में एनसीआर से उठे प्रश्न

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं ममता बनर्जी तो दहाड़ रही हैं कि यदि इन अवैध बांग्लादेशियों को बाहर निकाला, तो देश में गृहयुद्ध छिड़ जाएगा। खून की नदियां बह जाएंगी। कांग्रेस नरेश राहुल गांधी कह रहे हैं कि भाजपा…

हिमाचल की बदतर होती स्वास्थ्य सेवाएं

प्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं एक सर्वे में यह तथ्य सामने आया कि 59 फीसदी ग्रामीण तथा 41 फीसदी शहरी जनसंख्या सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई जा रही चिकित्सा सुविधाओं से असंतुष्ट है। 45 फीसदी लोगों के…

पुलिस खिलाड़ी को प्रशिक्षण सुविधा कब तक

भूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं हिमाचल पुलिस में आज खिलाड़ी जवानों के प्रशिक्षण व अन्य खेल सुविधाओं का कोई प्रबंध नहीं है। उच्च स्तरीय खेल परिणाम प्राप्त करने के लिए पूरा वर्ष लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम कई वर्षों तक…

कैसे बदला जा सकता है भारत को ?

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं मैं अमरीकी प्रशासनिक प्रणाली को लागू करने की वकालत करता हूं। अमरीकी राष्ट्रपति देश का मुखिया तो होता है, लेकिन कानून बनाने में उसकी कोई भूमिका नहीं होती, कानून सिर्फ संसद बनाती है।…

बैंकों को सहायता देकर बढ़ रहा भ्रष्टाचार

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य आज उलट  चुका है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसलिए किया गया था कि सामान्य नागरिक को बैंक द्वारा अधिक मात्रा में ऋण दिए जाएंगे, जिससे उसकी आर्थिक…

बोझ क्यों है सैनिक स्कूल की छात्रवृत्ति

अनुज कुमार आचार्य लेखक, बैजनाथ से हैं पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा पिछले 3 शैक्षणिक सत्रों 2015-16, 2016-17 और 2017-18 के लिए प्रदेश के होनहार विद्यार्थियों जो कि सैनिक स्कूल में पढ़ रहे हैं, को स्कॉलरशिप ही नहीं दी गई है। यह बेहद…

पाकिस्तान में सेना की बढ़ती भूमिका

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं वह एक ऐसी कमजोर विकेट पर खड़े हैं कि अगर वह इस तरह का आश्वासन दे भी देते हैं तो उन्हें तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाएगा जब तक सेना प्रमुख उनके रुख का स्पष्ट समर्थन नहीं करते हैं। वर्तमान में इस तरह…

पर्यावरण मित्र फैसलों का स्वागत

कुलभूषण उपमन्यु अध्यक्ष, हिमालयन नीति अभियान आज वनों से हमारी मुख्य मांग पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को पूरा करना है। जैसे-जैसे औद्योगीकरण बढ़ेगा, हमें ज्यादा से ज्यादा वृक्षों की जरूरत शुद्ध वायु के निर्माण के लिए…

गुरु पूर्णिमा पर उनका स्मरण

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं अंबेडकर भीषणतम परिस्थितियों की आग से तपकर निकले थे। समाज में से मिले अपमान के कारण गुस्से में भी थे, लेकिन अंतिम क्षण तक राष्ट्रहित के लिए लड़ते रहे। अंबेडकर बाहर और भीतर से एक समान…

एक अर्थहीन अविश्वास प्रस्ताव

प्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं अगर कांग्रेस यह जानना चाहती थी कि उसके भावी सहयोगी कौन-कौन हो सकते हैं तथा 2019 में उसकी कितनी संभावनाएं हैं, तो वह इसके लिए बेहतर नियोजन व समन्वय कर सकती थी। सदन…

खेलो इंडिया तक हिमाचली बालाएं

भूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं अब भारत सरकार के खेल मंत्रालय ने खेलो इंडिया नामक योजना के अंतर्गत प्रतिभा खोज से चयनित लगभग एक हजार किशोर खिलाडि़यों को विभिन्न खेलों के लिए हर वर्ष चिन्हित कर, उन्हें अगले आठ वर्षों…

राजनीति के शून्य में पिसते भारतवासी

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं सरकार की कमियों पर सरकार की निंदा कर देना मात्र विपक्ष की परिभाषा नहीं है। जब तक विपक्ष देश के विकास की कोई वैकल्पिक योजना पेश नहीं करता, तब तक उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। यह देश…