नागपुर में प्रणब मुखर्जी का संबोधन

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं मुखर्जी ने कहा कि लोकतंत्र में सभी राष्ट्रीय महत्त्व के प्रश्नों पर लोक संवाद ही समाधान का सर्वश्रेष्ठ तरीका है। किसी भी समाज में मत भिन्नता तो होगी ही। सहमत होना या असहमत होना मानव…

संघ वही संघ है, प्रणब वही प्रणब हैं

प्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं उन्होंने राष्ट्रवाद की परिभाषा, भाषा व भौगोलिक सीमा के उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि एक देश की संस्कृति व सभ्यता के रूप में की। उन्होंने कहा कि यूरोपीय राष्ट्रीय…

स्कूली खेलों को बढ़ावा कब ?

भूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं पिछले कई दशकों से बंद पड़े ड्रिल के पीरियड को अभी तक सुचारू रूप से शुरू नहीं किया जा सका है। राज्य में स्कूली क्रीड़ा संगठन को मजबूत बनाकर ही हम राज्य के विद्यालयों में पढ़ रहे लाखों…

भाजपा को अब काम ही दिलाएगा वोट

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं कर्नाटक की क्षणिक जीत के बाद मोदी और शाह खुद को फिर से अजेय साबित करने में लगे ही थे कि सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया। अंततः कर्नाटक हाथ से निकल गया। उसके बाद…

पर्यटन तंत्र को संवारने की चुनौती

अनुज कुमार आचार्य लेखक, बैजनाथ से हैं हिमाचल के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में सस्ती पार्किंग सुविधा एवं रात्रि ठहराव की सहूलियतों में सुधार की गुंजाइश है। मनाली के एक होटल में बाहर से आए पर्यटकों को बंद करना एवं धर्मशाला में सैलानियों के…

क्यों रूठ गया है आम आदमी ?

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं सरकार को चाहिए कि फसलों की खरीद के दाम को बढ़ाने के बजाय किसान को सीधे भूमि के आधार पर सबसिडी दे। वर्तमान में फूड कारपोरेशन दाल को ऊंचे दाम पर खरीदेगी तथा इसे सस्ते दाम पर…

भिंडरांवाला अभी भी जिंदा है

कुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं निस्संदेह प्रधानमंत्री (तत्कालीन) इंदिरा गांधी अकालियों को खत्म करना चाहती थीं तथा भिंडरांवाला को चुनौती देते समय उन्हें इसका एक अवसर भी मिला। वास्तव में इसमें उससे कहीं अधिक था जो आंखों ने देखा। एक…

अंबेडकर ने समझाया रिलीजन और धर्म का अंतर

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं उन्होंने मजहब या रिलीजन शब्द की परिधि निश्चित करते हुए लिखा कि मजहब का अर्थ है-‘ईश्वर में विश्वास, आत्मा में विश्वास, ईश्वर की पूजा, आत्मा का सुधार, प्रार्थना इत्यादि करके ईश्वर को…

हिंदुत्व को नीचा दिखा रही पंथनिरपेक्षता

प्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं हमारे संविधान निर्माताओं को पंथनिरपेक्षता शब्द को संविधान में डालने की जरूरत महसूस नहीं हुई, लेकिन बाद में जब वोट की राजनीति का विकास हुआ तो इसे एक आदर्श के रूप में…

हिमाचल में एथलेटिक्स का सफर

भूपिंदर सिंह लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं राज्य में इस समय धर्मशाला व हमीरपुर में दो जगह सिंथेटिक ट्रैक बनकर तैयार हैं तथा बिलासपुर व शिलारू में निर्माणाधीन हैं। राज्य में इस समय कई एथलेटिक्स प्रशिक्षक व शारीरिक शिक्षक कई जगह…

मजबूत सिस्टम रोकेगा भ्रष्टाचार

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं यदि सिस्टम मजबूत हो, बेईमानी पर तुरंत सजा होती हो, तो ये लोग बेईमानी की कोशिश नहीं करते। लेकिन यदि वे यह देखें कि बेईमानी करने वाला फल-फूल रहा है, उसे कोई सजा नहीं मिल रही, बल्कि…

‘धर्म राज्य’ के संविधान की परिकल्पना उपयुक्त नहीं

उपाध्याय जीवन पर्यंत हमारे संविधान के आलोचक रहे। वर्ष 1965 में उन्होंने अपने ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) के सिद्धांतों के तहत इसे बदलने की अपनी योजना प्रस्तुत की। एक नए भारत, ‘धर्म राज्य’ के विषय में उनके विचार भाजपा द्वारा इसके…

तेल के ऊंचे मूल्य का स्वागत कीजिए

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं अमरीका एवं भारत की तुलना करें तो विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार साठ के दशक में भारत की अर्थिक विकास दर 3.4 फीसदी प्रति वर्ष थी, जबकि अमरीका की 4.3 फीसदी। सत्तर एवं अस्सी के…

कर्त्तव्य का पुनः स्मरण

कुलभूषण उपमन्यु अध्यक्ष, हिमालयन नीति अभियान पांच जून विश्व पर्यावरण दिवस एक बार फिर द्वार पर है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि पर्यावरणीय संकट में घिरी पृथ्वी के प्रति हमारे अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए क्या कर्त्तव्य हैं। हमें…

महज एक दिन काफी नहीं

कर्म सिंह ठाकुर लेखक, मंडी से हैं मनुष्य तथा पर्यावरण दोनों परस्पर एक-दूसरे के इतने संबंधित हैं कि उन्हें अलग करना कठिन है। जिस दिन पर्यावरण का अस्तित्व मिट गया, उस दिन मानव जाति का अस्तित्व ही मिट जाएगा। पर्यावरण को बचाने के लिए…