जनता, सरकार और जवाबदेही

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही यह है कि वह सरकार की खामियां ढूंढे, जनता को उन खामियों से अवगत करवाए और सरकार को सही कदम उठाने पर विवश करे। अपनी छवि बचाने के लिए सत्ता पक्ष अपने तर्क…

कश्मीर में अपनाओ त्रिपुरा की राह

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं त्रिपुरा में जिस बारीकी से काम हुआ, यह केवल भाजपा के बस की बात है। आवश्यकता इस बात की है कि भाजपा कश्मीर को अपने एजेंडे की प्रमुखता में शामिल करे। भाजपा की प्राथमिकता इस समय ज्यादा…

नौकरी, व्यापार और सत्ता का रिश्ता

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं हिंदुत्व एक बड़ी लहर है, पर इस अकेली लहर के सहारे बहुमत मिल जाए, ऐसा मुश्किल लगता है। लब्बोलुआब यह कि जब नौकरियां नहीं हैं और व्यापार बढ़ने के आसार भी कम हैं तो चुनाव में वर्तमान…

कठघरे में मीडिया की प्रासंगिकता

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं समस्या यह है कि या तो मीडिया में इतने बड़े षड्यंत्र की ढंग से तहकीकात कर पाने की काबिलीयत वाले लोग नहीं हैं या फिर उनकी इसमें रुचि ही नहीं है। अलग-अलग दलों के नेताओं और संबंधित…

न किसान की जय, न जवान की

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं नीतियां ऐसी बना दी गई हैं कि खेती एक अलाभप्रद व्यवसाय बन गया है। यह नीतियों की असफलता है, किसानों की नहीं। यहां भी सरकार के पास कोई योजना अथवा दूरदृष्टि नहीं है। यह स्थिति ऐसी है…

यथार्थ से कटी योजनाओं का हश्र

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं योजना बनाते समय जमीनी स्थिति को ध्यान में न रखने का परिणाम ऐसा ही होता है कि सरकार प्रचार करती रहती है और जनता माथा पीटती रहती है। मौजूदा सरकार की अधिकांश योजनाओं का यही हाल है। वह…

निवेश आकर्षण बनाम रोजगार सृजन

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं यह सही है कि यदि चपड़ासी के कुछ पदों के लिए हजारों युवक इच्छुक हों तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। ऐसा क्यों है कि चपड़ासी के पद के लिए बेकरार उच्च शिक्षित युवा मेहनत का कोई और काम…

व्यवस्थागत बेड़ियों ने जकड़ा स्मार्ट इंडिया

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं आम आदमी का रोजमर्रा का वास्ता स्थानीय स्वशासन और राज्य सरकार से है, जबकि यह हमारी शासन व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है। शहरों में पार्षद, विधायक, सांसद चुने जाते हैं, लेकिन उनकी…

मोदी, तोगडि़या और तख्त

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं सन् 2008 में मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो राज्य में अवैध मंदिरों को गिराया गया था, जिससे नाराज होकर तोगडि़या ने मोदी के विरुद्ध बोलना शुरू किया। वह दरार समय के साथ-साथ बढ़ती…

जनहित की हांडी में पकती सियासत

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं सरकारी नौकरियां बेरोजगारी दूर करने का सबसे घटिया साधन है। यदि आवश्यकता न होने पर भी सरकारी पदों की संख्या बढ़ा दी जाए और नए लोग भर्ती कर लिए जाएं, तो नए लोगों का वेतन, भत्ता और…

भारत की लाचार संसदीय प्रणाली

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं नोटबंदी का फैसला हो, जीएसटी लागू करने की बात हो या फिर तीन तलाक का मामला, सब जगह संसद की अवहेलना की गई। कानून बनाने में विपक्ष की भूमिका सिर्फ आलोचना करने तक सीमित है। वह न कोई…

लोकतांत्रिक संस्थाओं की हो हदबंदी

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं यदि हमने भ्रष्टाचार नियंत्रित करने की मंशा से न्यायपालिका को मनमानी करते रहने की छूट दे दी, तो कभी ऐसा हो सकता है कि न्यायपालिका सर्वशक्तिमान बन जाए और ऐसे में न्यायपालिका भी वह सब…

अहंकार में कटी पतंगों का हश्र

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं गुजरात में भाजपा की जीत में उसकी हार छिपी है और कांग्रेस की हार में उसकी जीत छिपी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश का सबक स्पष्ट है कि सत्ता में रहते हुए भी यदि आपने जनता से संपर्क नहीं रखा…

बेलगाम सत्ता पर लगे विपक्ष की नकेल

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं यह अत्यंत खेद की बात है कि प्रधानमंत्री के विरोध को देशद्रोह का दर्जा दिया जाने लगा है। सरकार की यह मनमानी इसलिए चल रही है कि देश में प्रभावी विपक्ष नहीं है। सत्ता में भाजपा हो,…

मीडिया विमर्श का सिमटता दायरा

पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं गुजरात के चुनाव और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना इतनी बड़ी खबरें हैं कि लगता है देश भर की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं, सारे मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। राजनीतिज्ञों को तो…