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कम्पीटीशन रिव्यू


हिमाचली शिक्षा के हर रिकार्ड तक नरेंद्र अवस्थी

सेवानिवृत्ति के बाद भी डा. अवस्थी रीजनल सेंटर धर्मशाला के छात्रों को इकॉनोमिक्स का अध्ययन करवा रहे हैं। साथ ही अब भारत सरकार अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय द्वारा इंस्पेक्टिंग अथोरिटी के रूप में पर्यवेक्षक के पद पर नियुक्त किया गया है। डा. के निरीक्षण में सही पाए जाने पर ही अल्पसंख्यक स्कूल, कालेज और एनजीओ को ग्रांट जारी की जाएगी…

नरेंद्र अवस्थीपहाड़ी राज्य हिमाचल में शिक्षा को नई दिशा दिखाते हुए डा. नरेंद्र अवस्थी सेवानिवृत होने के बाद अभी भी शिक्षा की लौ जलाने का कार्य कर रहे हैं। प्रदेश में शिक्षा का स्तर और आधुनिक नई तकनीक को शुरू करने को डा. नरेंद्र ने कई सकारात्मक कदम उठाए। इतना ही नहीं भौगोलिक परिस्थितियों के रूप में कठिन माने जाने वाले प्रदेश के सरकारी कालेजों में शिक्षा का नया अध्याय जोड़ते हुए एड ऑन कोर्स और वोकेशनल कोर्स शुरू करवाए। सेवानिवृत्ति के बाद भी डा. अवस्थी रीजनल सेंटर धर्मशाला के छात्रों को इकॉनोमिक्स का अध्ययन करवा रहे हैं। साथ ही अब भारत सरकार अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय द्वारा इंस्पेक्टिंग अथोरिटी के रूप में पर्यवेक्षक के पद पर नियुक्त किया गया है। डा. के निरीक्षण में सही पाए जाने पर ही अल्पसंख्यक स्कूल, कालेज और एनजीओ को ग्रांट जारी की जाएगी।

डा. नरेंद्र अवस्थी जिला कांगड़ा के बैजनाथ उस्तेहड़ गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता मदन लाल अवस्थी तकनीकी विवि में कार्यरत थे, जबकि माता पावनो देवी गृहिणी थीं। परिवार में दो बहनों के एक भाई नरेंद्र ने स्कूलिंग पपरोला और स्नातक बैजनाथ कालेज से की। डा. अवस्थी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और भोपाल विश्वविद्यालय में अपना अध्ययन जारी रखा। इस दौरान उन्होंने एमए, एमफिल, पीएचडी, एलएलबी और सीआईसी का अध्ययन किया। उन्होंने भोपाल विवि में ही वर्ष 1979 में अध्यापन का कार्य शुरू किया। इस दौरान ही पिता की मृत्यु होने के बाद शिक्षा के स्तर में नई शुरुआत करते हुए स्कूल कैडर लेक्चरर के रूप में शुरू किया। पीजी कालेज धर्मशाला में 1984-85 से 1996 तक बतौर अर्थशास्त्र विषय के प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दी। वर्ष 1996 में पदोन्नति के बाद मंडी कालेज में बतौर प्रिंसीपल कार्यभार संभाला। मंडी में उन्होंने दो वर्ष, हमीरपुर कालेज में तीन वर्ष और उसके बाद पीजी कालेज धर्मशाला और फिर शाहपुर में प्रिंसीपल का कार्यभार संभाला। इस दौरान उन्होंने बासा, शाहपुर, बैजनाथ और नगरोटा बगवां में भी महाविद्यालय की शुरुआत की।

2010 में पदोन्नत होकर संयुक्त निदेशक उच्चतर शिक्षा व वर्ष 2011 में एचपीयू शिमला में बतौर परीक्षा नियंत्रक अपनी सेवाएं प्रदान की। डा. नरेंद्र अवस्थी ने वर्ष 2003 में नॉर्थ इंडिया में पहली बार धर्मशाला कालेज को बी प्लस ग्रेड दिलवाने का कार्य किया। 12 वर्ष तक एनसीसी आफिसर के रूप में तीन बार कमीशन भी पास किया। उनके प्रयास से पीजी कालेज धर्मशाला को यूजीसी द्वारा ऑटोनमस कालेज बनाया गया, जिसमें एक करोड़ 90 लाख बजट का प्रावधान किया गया। प्रदेश के परीक्षा नियंत्रक के रूप में कई  शैक्षणिक कार्य किए। जिसमें दीमक और चूहे द्वारा न खाए जाने वाली और न ही फटने वाली डिग्री का प्रोजेक्ट भी तैयार किया। डा. अवस्थी ने प्रदेश में इंटिग्रेटेड एग्जामिनेशन मैनजमेंट सिस्टम को शुरू करने का प्लान बनाया। इसके तहत बीकॉम फाइनल की परीक्षा में पॉयटल के रूप में ट्रायल भी करवाया गया, जिसमें अत्याधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से मात्र एक ही दिन में परीक्षा परिणाम जारी कर दिया गया। हिमाचल के शैक्षणिक इतिहास में पहली और अब तक अंतिम बार ही ऐसा करिश्मा हो सका है। इसके बाद योजना को फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, इसे फिर से ईसी द्वारा शुरू किए जाने का प्लान बनाया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य करने पर डा. नरेंद्र अवस्थी  को भारत ज्योति पुरस्कार, हिमाचल केसरी पुरस्कार और साहित्यिक सदन अवार्ड सहित कई पुरस्कार प्रदान किए गए हैं।

एक रंग यह भी

वह शिक्षा के साथ-साथ रंगमंच के भी कलाकार हैं। उन्हें अभिनय के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए बालीवुड के अभिनेता विनोद खन्ना द्वारा ऑल इंडिया अभिनायक अवार्ड से सम्मानित किया गया। डा. अवस्थी ने टेली फिल्म, डीडी नेशनल के सीरियल कॉमेडी बाजार, इंसानी रिश्तों का सफर और चरम स्थली में भूमिकाएं निभाई हैं।

– नरेन कुमार, धर्मशाला

जब रू-ब-रू हुए…

हिमाचल में परीक्षा प्रणाली को बदलने की जरूरत है…

शिक्षा के क्षेत्र में सबसे संतोषजनक दायित्व क्या रहा?

NEWSशिक्षा के क्षेत्र में बतौर प्रिंसीपल मुझे एजुकेशन में काफी सुधार करने का मौका मिला। मैं ईसी मेंबर और बोर्ड ऑफ एजुकेशन मेंबर भी रहा, तो शिक्षा में काफी कार्य करने का मौका मिला।

क्यों सरकारी क्षेत्र में शिक्षा केवल आंकड़ों को ही परिमार्जित करने लगी?

हाथी के दांत दिखाने के कोई और, और खाने के कोई और वाली कहावत एजुकेशन के घुमाने वाले आंकड़ों बारे सटीक बैठती है। ग्रांट के चक्कर में कई आंकड़ों को घुमा फिरा कर दिखया जाता है।

हिमाचल के परिदृश्य में शिक्षा को आप किस स्तर पर देखते हैं?

हिमाचल में शिक्षा का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। मात्र अंकों से ही मूल्यांकन किए जाने का कार्य किया जा रहा है, लेकिन बच्चों को अपने बेसिक कांस्पेट ही क्लीयर नहीं हो पाए हैं।

कोई तीन बदलाव, जिन्हें आजमा कर प्रदेश की क्षमता और प्रतिभा को सम्माननीय हालात में पहुंचाया जा सकता है?

शिक्षा में सुधार के लिए सबसे पहले एग्जामिनेशन पैटर्न को बदलना होगा। साथ ही प्रदेश की जरूरत और रुझान को परख कर सही गाइडेंस देने का कार्य भी करना होगा।

आपकी दृष्टि में बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अभिभावक कौन सा रास्ता चुनें?

सबसे पहले अंकों के आधार पर बच्चों के मूल्यांकन को त्यागना होगा। मात्र स्कोर और अंग्रेजी की तरफ रुझान देखने को मिल रहा है। अभिभावकों को बच्चों के प्रति सोच बदलने की जरूरत है।

प्रदेश के श्रेष्ठ कालेजों की सूची में आप किन्हें अव्वल मानेंगे?

अच्छी फैकल्टी और बेहतर प्रबंधन होने पर प्रदेश के कई कालेजों ने एजुकेशन में बेहतरीन कार्य किया है। इसमें धर्मशाला, मंडी, सेंट बीट शिमला और भटोली कालेज प्रमुख हैं।

जो उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में परोसा जा रहा है, उसे किस नजरिए से देखते हैं?

आज का पाठयक्रम कहीं भी प्रांसगिक नहीं है। बच्चों को ध्यान में रखकर एक पाठ्यक्रम पढ़ाने का काम मात्र कालेजों में किया जा रहा है। विषय को पढ़ने के बाद बच्चों ने भविष्य में क्या किया? उनमें क्या करने की काबिलीयत थी? इन सब बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। प्राध्यापक विषय पढ़ने वाले बच्चों को बताते भी नहीं कि उन्हें भविष्य में क्या करना चाहिए। साथ ही मानिटरिगं कमेटी का भी गठन कर बच्चों को गाइडेंस भी दी जानी चाहिए।

कोई एक सपना या प्रयोग जिसे आप हिमाचली शिक्षा को अर्पित करना चाहते हों?

प्रदेश में एग्जामिनेशन सिस्टम को बदलना। ओपन बुक एग्जामिनेशन आयोजित करवाई जानी चाहिए, इसमें बच्चों को पाठ्यक्रम किताब ले जाने की अनुमति होनी चाहिए। प्रश्न पत्र को इस तरीके से सेट किया जाए, कि पढ़ने वाले बच्चे सही प्रश्न को खोज उसका सही उत्तर दे सकें। साथ ही प्रयोगात्मक शिक्षा प्रणाली को शुरू करना चाहिए।

शिक्षा के वर्तमान ढर्रे में अभिभावक और शिक्षक से प्रभावशाली नेता हो रहे हैं, तो इस दौर से कैसे बचा जाए?

शिक्षा के मंदिर में राजनीति को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। आज के समय में अध्यापक-प्राध्यापक ही नेताओं के अधिक चक्कर काटते हुए नजर आते हैं। प्रदेश में शिक्षकों सहित हर कर्मचारी के लिए ट्रांसफर पालिसी बनाने की सख्त आवश्यकता है। जिससे बेवजह की राजनीति   सिस्टम में हावी न हो सके और हर तीन वर्ष में हर कर्मचारी की ट्रांसफर होनी तय की जाए।

हिमाचल में राष्ट्रीय स्तर के  शिक्षा संस्थानों की स्थापना को किस तरह सियासत से दूर रखा जा सकता है। ऐसे संस्थानों के लिए स्थल व फैकल्टी चयन में अनिवार्य क्या होगा?

राष्ट्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान अमूमन राजनीति से दूर ही रहते हैं। राष्ट्रीय संस्थान में नेशनल के साथ-साथ प्रदेश की फैकल्टी को शामिल करना चाहिए। बच्चों का चयन भी प्रवेश परीक्षा के आधार पर किया जाता है। संस्थान के लिए स्थान सही जगह निर्धारित कर जल्द ही निर्माण करना चाहिए। सीयू मामले की तरह अन्य संस्थानों को लटकाने से प्रदेश के भविष्य को नुकसान ही झेलना पड़ेगा।

राष्ट्रीय स्तर के किन संस्थानों की हिमाचल में भी इकाई होनी चाहिए?

आईआईटी मंडी और इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मैनजमेंट सहित अन्य संस्थान प्रदेश में खुले हैं, लेकिन हमें अपने हिमाचल के विवि और संस्थान को इतना विकसित करने पर जोर देना चाहिए कि उसकी इकाई को देश के अन्य हिस्सों में खोलने की मांग की जाए।

रूसा कितनी सफल-कितनी असफल और वजह?

हिमाचल प्रदेश में रूसा सिस्टम को लागू करना बहुत बड़ी गलती है। रूसा प्रणाली के कारण अब तक छात्रों को परिणाम नहीं मिल पाए हैं। रूसा के एक कैंपस में चलने वाले सिस्टम को उठाकर प्रदेश में बिना तैयारी के थोप दिया गया, जिसके परिणाम आज सबके सामने हैं।

हिमाचल में रंगमंच पर आपकी राय और इस दिशा में और क्या करना होगा?

हमीरपुर डीसी अनुराधा ठाकुर के सहयोग से जिला सांस्कृतिक केंद्र को पुनः शुरू किया था। डिस्ट्रिक्ट कल्चरल सेंटर को फिर से शुरू करने की जरूरत है।

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