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कम्पीटीशन रिव्यू


हिमाचली पुरुषार्थ : हरिमन शर्मा की सेब को संजीवनी

आज से करीब 20 साल पहले गर्म जलवायु में सेब उगाने की नामुमिकन बात को प्रगतिशील बागबान हरिमन शर्मा ने कड़ी मेहनत से मुमकिन कर दिखाया है। यही वजह रही कि गर्म बिलासपुर में सेब की एचआरएमएन-99 वैरायटी उगाकर अपनी जीतोड़ मेहनत के बूते आज बागबानी क्षेत्र में पूरे हिमाचल में उन्होंने एक अलग पहचान कायम कर ली है…

cereer कोई डिग्री न ही कोई डिप्लोमा, फिर भी एक वैज्ञानिक के रूप में पहचान। बात हो रही है उपमंडल घुमारवीं के पन्याला गांव के प्रगतिशील बागबान हरिमन शर्मा की। हरिमन का जन्म 4 अप्रैल, 1956 को गलासीं गांव में हुआ। नौवीं तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद इनका रुझान बागबानी की तरफ हो गया। आज से करीब 20 साल पहले गर्म जलवायु में सेब उगाने की नामुमकिन बात को प्रगतिशील बागबान हरिमन शर्मा ने कड़ी मेहनत से मुमकिन कर दिखाया है। यही वजह रही कि गर्म बिलासपुर में सेब की एचआरएमएन-99 वैरायटी उगाकर अपनी जी तोड़ मेहनत के बूते आज बागबानी क्षेत्र में पूरे हिमाचल में उन्होंने एक अलग पहचान कायम कर ली है। प्रगतिशील बागबान हरिमन शर्मा ने गर्म जलवायु में उगने वाली सेब की प्रजाति तैयार करके अपना नाम देश भर में चमकाया है। देश भर के गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में आज हरिमन शर्मा की विकसित की गई सेब की प्रजाति एचआरएमएन-1999 के पौधे लहलहा रहे हैं। जबकि कई राज्यों में इन पौधों ने फल देना भी शुरू कर दिया है। हरिमन शर्मा के सेब के पौधे राष्ट्रपति भवन से लेकर राजस्थान व जम्मू-कश्मीर सहित 27 राज्यों में लहलहा रहे हैं। इस उपलब्धि के बाद प्रगतिशील बागबान हरिमन शर्मा को इंडयन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर ने प्रगतिशील किसानों की सूची में शामिल किया है।  इस सूची में देश भर से 21 किसानों को शामिल किया है। पूसा की प्रगतिशील किसानों की सूची में शामिल होने के बाद अब हरिमन शर्मा वहां पर आयोजित बैठकों व समारोहों में भाग लेंगे। इस दौरान किसी प्रजाति पर होने वाली रिसर्च में बागबान हरिमन शर्मा के सुझावों को भी सम्मलित किया जाएगा। एक छोटे से गांव से निकला किसान राष्ट्रपति भवन तक  जा पहुंचा, यह महज भाग्य नहीं हो सकता। इसके पीछे हरिमन की कड़ी मेहनत छिपी है।  लगातार कड़ी मेहनत के बाद इनके द्वारा विकसित की गई सेब की यह प्रजाति देशभर में लहलहा रही है। सेब की इस प्रजाति को उगाने के बाद उन्हें कई अवार्डों से भी नवाजा जा चुका है। जबकि अब इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर (दिल्ली) ने देश भर के बनाई गई प्रगतिशील किसानों की सूची में हरिमन शर्मा को भी शामिल किया है। प्रगतिशील बागबान हरिमन शर्मा ने बिलासपुर जिला के पन्याला गांव में सेब की इस प्रजाति का बागीचा भी तैयार किया है। जिसका इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीच्यूट क्षेत्रीय कार्यालय शिमला केवैज्ञानिकों ने निरीक्षण भी किया है तथा इस पर तीन वर्षों तक शोध भी किया है।

– राज कुमार सेन, घुमारवीं 

cereerजब रू-ब-रू हुए…

प्रभावी विकल्प बन सकती है जैविक खेती

जो काम हमारे वैज्ञानिक, बागबानी विशेषज्ञ या विश्वविद्यालय अनुसंधान नहीं कर पाए, आपने कैसे कर दिया?

किसानों-बागबानों के हित में कुछ करने के जज्बे ने एचआरएमएन-99 सेब की प्रजाति तैयार करने को प्रेरित किया।

हिमाचल को अगर पूरी तरह फल राज्य बनाना है, तो क्या करना होगा?

हिमाचल प्रदेश में बागबानी से संबंधित अपार संभावनाएं मौजूद हैं। इन संभावनाओं को परिणाम में बदलने के लिए सेब के साथ-साथ आम तथा किन्नू को भी राज्य स्तरीय श्रेणी के फलों में शामिल करना होगा। अगर सेब के साथ-साथ इन फलों के उत्पादन को भी प्रोत्साहित किया जाता है, तो बागबानों की आर्थिक खुशहाली के साथ राज्य की अर्थव्यवस्था को भी संबल मिलेगा।

सेब को मैदान तक पहुंचाने के पीछे आपकी सोच क्या है और इस दिशा में कितनी संभावना है?

एक देश, एक सोच, एक फल की तर्ज पर देश भर में सेब उगाने का स्वप्न लिया। इसके लिए नेशनल इन्नोवेशन फाउंडेशन के सहयोग से आज देश भर के सभी राज्यों में सेब के पौधे उगाए गए हैं, जबकि सेब को पहले बर्फ बहुल क्षेत्रों का ही फल माना जाता था।

अब तक के अनुभव यानी जब आपके पौधे राष्ट्र्रपति भवन में उगे, तो महामहिम की तरफ से आपकी आशा में किस तरह इजाफा हुआ?

साल में एक बार जब भी मुगल गार्डन आम जनता के लिए खुलता है, तो उसमें  देश भर से आने वाले लाखों लोग राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले नवप्रर्वतन उत्सव में सेब के बारे जानकारी प्राप्त करते हैं। लोग सैकड़ों की संख्या में सेब के पौधों की डिमांड देते हैं, जिन्हें कुरियर के माध्यम से हर राज्य में पहुंचा दिया जाता है। इस प्रकार सेब की जड़ें देश भर में फैल रही हैं।

केंद्रीय मंत्री जी आपके संपर्क में आए, तो क्या हिमाचली संस्थाएं भी आपके प्रशंसनीय कार्य की सहभागी बनीं?

हां, केंद्रीय मंत्री मेनका  गांधी के संपर्क में आने के बाद हिमाचल सरकार ने भी सम्मानित किया तथा नौणी यूनिवर्सिटी की रिसर्च काउंसिल में सदस्य नियुक्त किया।

हिमाचली परिप्रेक्ष्य में विश्वविद्यालयों, विभागों से वैज्ञानिकों तक कभी निराशा के बिंदु उभरे या कुछ प्रेरक बने?

विभागों व वैज्ञानिकों से कोई निराशा नहीं। जितना संभव था, उन्होंने अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास किया है। हां, कई वैज्ञानिक व विभाग उनके प्रेरक जरूर बने।

सेब की तरह आप अन्य किस पौध को लेकर आशावान हैं?

कॉफी तथा हींग।

कृषि-बागबानी के प्रति आपका ख्वाब या प्रस्ताव जिसे हिमाचल पूरा कर सकता है?

सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे। पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं जिस तरह से बढ़ती जा रही हैं, वहां जैविक कृषि एक प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है। सरकार खेती-बागबानी को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक स्तर पर काफी प्रयास कर रही है। अब भविष्य की दिशा को बदलते हुए जो अनुदान रासायनिक कीटनाशकों या उर्वरकों पर दिया जा रहा है, उसे जैविक दवाइयों पर खर्च किया जाए। सरकार चाहे तो देश के पहले जैविक कृषि राज्य सिक्किम के जैविक कृषि मॉडल को समझकर, हिमाचल में भी जैविक कृषि को बढ़ावा दे सकती है। हिमाचल में कुछ किसानों ने अपने दम पर इस दिशा में कुछ कदम बढ़ाए हैं और कितने ही अन्य किसान जैविक कृषि को अपनाने के लिए इच्छुक दिखते हैं। ऐसे में सरकार यदि जैविक कृषि के क्षेत्र में एक समग्र नीति तैयार कर क्रियान्वित करती है, तो कई किसान इसे अपनाएंगे।

अन्य राज्यों में प्रगतिशील किसान-बागबानों के प्रति हमसे बेहतर परिस्थितियां क्या हैं और वहां सरकारी एजेंसियों से क्या सीखा जा सकता है?

मार्केटिंग क्षेत्र में अन्य राज्य हिमाचल प्रदेश से काफी आगे हैं। अन्य राज्यों में किसानों व बागबानों को आसानी से मार्केट उपलब्ध हो जाती है। हिमाचल प्रदेश सरकार भी अन्य राज्यों की तर्ज पर किसानों के उगाए गए उत्पादों  के लिए मार्केट की व्यवस्था करे। निश्चित तौर पर यह प्रयास कई सकारात्मक परिणाम लाने वाला साबित होगा।

अब तक के मिले पुरस्कार और भविष्य की कामना में किस तरह का प्रोत्साहन चाहते हैं?

राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर कई बार पुरस्कार हासिल कर चुके हैं। अब महामहिम के हाथों से अवार्ड लेने की इच्छा है।

हिमाचल के किसान-बागबान को किन तीन प्रमुख बिंदुओं पर आगे बढ़ना चाहिए?

  1. जैविक खेती
  2. मार्केट के अनुसार खेती-बागबानी करना
  3. पारंपरिक खेती (बैलों से जुताई) को बढ़ावा दे सरकार। सबसिडी ट्रैक्टरों पर नहीं, बैलों की खरीद पर दें, ताकि किसान गोबर की खाद स्वयं तैयार कर सकें। यकीनी तौर पर इससे लावारिस पशुओं की बढ़ती समस्या से भी निजात मिलेगी।

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