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प्रतिबिम्ब


अमरभाषा है संस्कृत

सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इसे कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है। शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी संभावना नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है…

विश्व की सर्वाधिक प्राचीन भाषाओं में से एक भारत की शास्त्रीय भाषा ‘संस्कृत’ को देववाणी अथवा सुरभारती भी कहा जाता है। संस्कृत विश्व की सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ वेद की भाषा है। इसे विश्व की प्रथम भाषा माना जाता है।  सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण इसकी सर्वश्रेष्ठता भी स्वयंसिद्ध है। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। इसे देवभाषा माना जाता है। जिस प्रकार देवता अमर हैं, उसी प्रकार संस्कृत भाषा भी अपने विशाल-साहित्य, लोकहित की भावना, विभिन्न प्रयासों तथा उपसर्गों के द्वारा नवीन-नवीन शब्दों के निर्माण की क्षमता आदि के द्वारा अमर है।

आधुनिक भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत हिंद-यूरोपीय भाषा परिवार की हिंद-ईरानी शाखा की हिंद-आर्य उपशाखा में शामिल है। आधुनिक भारतीय भाषाएं जैसे हिंदी, उर्दू, कश्मीरी, उडि़या, बांग्ला, मराठी, सिंधी, पंजाबी, नेपाली आदि संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमनी भाषा भी शामिल है। भारत के लिए संस्कृत की महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि सनातन वैदिक अर्थात हिंदू धर्म से संबंधित लगभग सभी धर्मग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं।

विद्वानों के अनुसार संस्कृत भाषा का अखंड प्रवाह सहस्त्राब्दियों से निरंतर बहता चला आ रहा है। भारत में यह आर्यभाषा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, व्यापक और संपन्न स्वरूप है। इसके माध्यम से भारत की उत्कृष्टतम मनीषा, प्रतिभा, अमूल्य-चिंतन, मनन, विवेक, रचनात्मक-सर्जना और वैचारिक प्रज्ञा का अभिव्यंजन हुआ है।

आज भी सभी क्षेत्रों में इस भाषा के द्वारा ग्रंथ निर्माण की क्षीण धारा अविरल रूप से बह रही है। आज भी यह भाषा बोली जाती है। इसमें व्याख्यान होते हैं और भारत के विभिन्न प्रादेशिक भाषा-भाषी जन इसका परस्पर वार्तालाप में प्रयोग करते हैं। बौद्ध धर्म, विशेषकर महायान संप्रदाय तथा जैन धर्म के भी कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। हिंदुओं के सांस्कारिक कार्यों में आज भी यह प्रयुक्त होती है तथा अधिकतर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही संपन्न होते हैं। इसी कारण ग्रीक और लैटिन आदि प्राचीन मृत भाषाओं अर्थात डेड लैंग्वेजेज से संस्कृत की स्थिति भिन्न है।

यह मृतभाषा नहीं, अपितु अमरभाषा है। फोर्ब्स पत्रिका जुलाई, 1987 की एक रिपोर्ट के अनुसार संस्कृत को सभी उच्च भाषाओं की जननी माना जाता है। इसका कारण है, इसकी सर्वाधिक शुद्धता और इसीलिए यह कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए एक उपयुक्त भाषा है। संस्कृत भाषा के शब्द मूल रूप से सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं में हैं। सभी भारतीय भाषाओं में एकता की रक्षा संस्कृत के माध्यम से ही हो सकती है। मलयालम, कन्नड़ और तेलुगु आदि दक्षिणात्य भाषाएं संस्कृत से बहुत प्रभावित हैं।

संस्कृत भारत-नेपाल सहित विश्व के कई देशों में बोली जाती है। इसकी लेखन प्रणाली वस्तुतः देवनागरी लिपि है और रोमन लिपि में भी लिखी जाती है। भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है। भारतीय संविधान की धारा-343 धारा-348 तथा 351 का सारांश यह है कि देवनागरी लिपि में लिखी और मूलतः संस्कृत से अपनी पारिभाषिक शब्दावली को लेने वाली हिंदी राजभाषा है। भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाली संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यंत प्राचीन विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान और साहित्य का अखंड भंडार है। इसके अध्ययन से निस्संदेह ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढ़ावा मिलेगा।

संस्कृत का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान समय में प्राप्त सबसे प्राचीन संस्कृत ग्रंथ ऋग्वेद है, जो वैदिक मान्यतानुसार आदिकाल की रचना है। ऋग्संहिता की भाषा को संस्कृत का आद्यतम उपलब्ध रूप कहा जा सकता है। वैदिक भाषा अभ्रांत रूप से संस्कृत भाषा का आद्य उपलब्ध रूप है। पाणिनि ने संस्कृत भाषा को लोकभाषा या लौकिक भाषा के रूप में माना है। आचार्य पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य नामक प्रसिद्ध शब्दानुशासन के आरंभ में भी वैदिक भाषा और लौकिक भाषा के शब्दों का उल्लेख हुआ है-संस्कृत नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः। श्लोक में उद्धृत देवभाषा या संस्कृत शब्द से यह स्पष्ट हो जाता है कि यास्क, पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि के समय तक छंदोभाषा अर्थात वैदिक भाषा एवं लोकभाषा के दो नामों, स्तरों व रूपों में व्यक्त थी। हिंदी सहित भारत की सभी भाषाओं एवं विश्व की सभी भाषाओं की जन्मदात्री वैदिक संस्कृत भारतीय संविधान में घोषित व अनुसूचित 22 आधिकारिक भाषाओं मे से एक है। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द है और हर शब्द गुण आधारित है।

इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं। अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन संस्कृत शब्द इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ इस प्रकार किया है- तदेतत् र्त्यक्षर हृदयमिति, हृ इत्येकमक्षरमभिहरित, द इत्येकमक्षर ददाति, य इत्येकमक्षरमिति।

अर्थात हृदय शब्द हृ, हरणे द दाने तथा इण् गतौ इन तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। हृ से हरित अर्थात शिराओं से अशुद्ध रक्त लेता है, द से ददाति अर्थात शुद्ध करने के लिए फेफड़ों को देता है और य से याति अर्थात सारे शरीर में रक्त को गति प्रदान करता है। इस सिद्धांत की खोज हार्वे ने 1922 में की थी, जिसे हृदय शब्द स्वयं लाखों वर्षों से उजागर कर रहा था ।

संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द रूप बनाए जाते, जो उन्हें व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूल शब्द के अंत में प्रत्यय लगाकर बनाए जाते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अंतःश्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को महापुरुषों ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। देवनागरी लिपि वास्तव में संस्कृत के लिए ही बनी है, इसलिए इसमें हरेक चिन्ह के लिए एक और केवल एक ही ध्वनि है। देवनागरी में 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं, बल्कि संस्कारित भाषा भी है, अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है, जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं, बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।

इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का प्रायः एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इसे कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है। शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।  संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी संभावना नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है।

जैसे-अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहं दोनों ही ठीक हैं। संस्कृत विश्व की सर्वाधिक पूर्ण एवं तर्कसम्मत भाषा है। संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं।  इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरंतर होती आ रही है। संस्कृत केवल एक भाषा मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। संस्कृत एक भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक संस्कृति है और संस्कार भी है। संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है और वसुधैव कुटुंबकम की भावना भी है ।

— अशोक  प्रवृद्ध, करमटोली- गुमला नगर, गुमला

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