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प्रतिबिम्ब


अछूती आलोचना को छूते आग्रह

हिमाचल में आजकल रचनात्मक साहित्य तो खूब लिखा जा रहा है, पर अच्छे आलोचनात्मक लेखन की कमी है। आलोचक लगभग चुप हैं और स्तुति-निंदा को आलोचना का नाम दिया जा रहा है। असल में आलोचना, रचना और रचनाकार के द्वारा पाठकों को दुनिया की पहचान कराती है…

आलोचना के सिद्धांत और व्याख्या पक्ष का इतिहास लंबा और काफी पेचीदा रहा है। भारत के हिंदी साहित्य में विद्वतापूर्ण आलोचना, समालोचना, समीक्षा एवं विवेचना की गौरवमयी संस्कृति रही है। ‘समीक्षा’ का आशय है मूल्यांकन, यानी किसी भी कृति या रचना का गुण-दोष के आधार पर उचित, संतुलित, ईमानदार व सही आकलन। समीक्षा रचना या रचनाकार के इस या उस पक्ष में झुकी हुई नहीं होनी चाहिए। अगर समीक्षक किसी कृति में लेखक द्वारा व्यक्त किए गए अर्थ के बजाय अपना ही अर्थ ढूंढने का प्रयास करेगा, तो समीक्षा औचित्यपूर्ण नहीं हो पाएगी। जोश में रचना के हाथ में आते ही प्रतिक्रियास्वरूप आधिकारिक राय देना या फिर उस पर टूट पड़ना या रचना का रस निचोड़कर, उसे बेजान बना देना, समीक्षक धर्म के विपरीत है।

आलोचना की बात करें तो अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष, रुचि-अरुचि से बचकर किसी कृति या रचना की सम्यक व्याख्या और मूल्यांकन करना ही ‘आलोचना’ है। श्रेष्ठ आलोचक अपने समय के विशिष्ठ लेखन को अलग से पहचान सकने की योग्यता व धैर्य रखता है।  मुक्तिबोध ने अपने प्रसिद्ध सैद्धांतिक निबंध ‘समीक्षा की सीमाएं’ में लिखा है कि समीक्षा को भी चरित्र की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी की लेखक को ईमानदारी की। मुक्तिबोध जिस खतरे को महसूस करके अपने दौर में लिख रहे थे, आज वह वास्तविक बनकर हमारे सामने है। आलोचक व समीक्षक के चरित्र का लोप हिंदी आलोचना के संकट का सबसे बड़ा कारण है। हिंदी आलोचना निष्प्रभावी और निस्तेज होकर दम तोड़ती नजर आ रही है। कहानी, कविता, लघुकथा, उपन्यास व भिन्न-भिन्न विधाओं में तो हलचल नजर आ रही है, लेकिन आलोचना के क्षेत्र में लगभग सन्नाटा पसरा है।

हिंदी की राष्ट्रीय धारा में हिमाचल के लेखकों और साहित्यकारों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। आजादी के बाद के आधुनिक लेखन व चिंतन में हिमाचल की उपस्थिति तो दर्ज है ही, वहीं आज़ादी से पहले भी उल्लेखनीय साहित्य सृजन हुआ है। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि आलोचना की मुख्य धारा में हिमाचल उभर कर नहीं आ पाया। बावजूद इसके जबकि श्रीनिवास श्रीकांत, डा.हेमराज कौशिक, कुमार कृष्ण, सुंदर लोहिया, सुशील कुमार फुल्ल, निरंजन देव शर्मा, डा. पीयूष गुलेरी, ठाकुर मौलूराम, सुदर्शन वशिष्ठ, पीसीके प्रेम, प्रत्यूष गुलेरी जैसे सृजनधर्मी, आलोचना विधा में सक्रिय हैं। ऐसा नहीं है कि हिमाचल में समीक्षा और आलोचना में अच्छा कार्य नहीं हुआ है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी व यशपाल जैसे मूर्धन्य समीक्षकों को कौन भूल सकता है? श्रीनिवास श्रीकांत ने भी आलोचना की भूमि पर अपनी पहचान दर्ज कराई है, पर इनका भी कहना है कि आज गुटबंदी ज्यादा है, सब अपने-अपनों को सराहते हैं। वास्तव में हिमाचल में आलोचना हो ही नहीं रही है। आलोचक का मूल उद्देश्य पाठक तक यह पहुंचाना होता है कि लेखक अपनी रचना के माध्यम से क्या कहना चाहता है? रचनाकार अपनी रचना के माध्यम से जो कुछ भी अभिव्यक्त करना चाहता है, कर पाया या नहीं। लेखक अपने कथ्य को संप्रेषित करने में सफल हो सका है या नहीं या सफल हुआ है तो किस सीमा तक हो पाया है।

मगर आज आलोचक पाठक की आवाज न होकर रचनाकार का प्रवक्ता बन गया है। यूं लगता है मानो आलोचक ने रचनाकार के आगे आत्मसमर्पण कर दिया हो। दूसरे शब्दों में कहूं तो ‘आलोचक’ आलोचना कर रचनाकार से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता। इसका भी एक कारण है। बहुधा आलोचना को ‘रचनाकार’ व्यक्तिगत आलोचना मानकर दुखी, निराश या नाराज हो जाता है। जबकि स्वस्थ आलोचना सदा रचना से संबंध रखती है। रचनाकार या आलोचक के व्यक्तिगत संबंधों से वह प्रभावित नहीं होनी चाहिए। बहुधा आलोचक भी अपनी आलोचना के माध्यम से किसी रचनाकार को उठाने या गिराने का प्रयत्न करते हैं। इस तरह व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित आलोचना कर्म ने आलोचक के चरित्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है।  साहित्यकार, जीवन और उनके अनुभव के जिन तत्त्वों के संश्लेषण से साहित्य रचता है, आलोचना उन्हीं तत्त्वों का विश्लेषण करती है। साहित्य में जहां रागतत्त्व प्रधान है, वहां आलोचना में बुद्धितत्त्व। आलोचना ऐतिहासिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का भी आकलन करती है। इस दृष्टि से हिंदी में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को सर्वश्रेष्ठ आलोचक माना गया है।

नामवर सिंह कहते हैं कि किसी भी कवि को बड़े पुण्य प्रभाव से काव्य-रचना के परिश्रम को समझने वाला ऐसा विद्वान-आलोचक व्यक्ति प्राप्त होता है, जो शब्दों की रचना विधि का भली-भांति विवेचन करता है, सूक्तियां, अनोखी सूझों से आह्लादित होता है, काव्य के सघन रसामृत का पान करता है और रचना के गूढ़ तात्पर्य को ढूंढ निकालता है।

आज की आलोचना जन संपर्क अभियान का हिस्सा बन चुकी है। जिस रचनाकार का जनसंपर्क जितना बेहतर है, वह अपने आप को उतना ही बड़ा रचनाकार घोषित कर लेता है भले ही वह इक्का-दुक्का कविता, कहानियों का ही रचयिता क्यों न हो? इसलिए आज हिंदी में लेखक बनना आसान हो गया है। सोशल मीडिया में भी स्वयं को बढ़-चढ़कर दिखाकर पाठक को भ्रमित किया जा रहा है। पाठकों की स्वीकृति मिले न मिले आलोचकों और समीक्षकों की स्वीकृति मिलने में देर नहीं लगती।

हिमाचल में आलोचना की स्थिति की पड़ताल करने निकली तो कुछ लेखक आलोचना के संकट से ही इनकार करते हैं। कुछ इस संकट को स्वीकार करते हैं, पर उनके मूल कारणों पर बहस करने या व्यक्तव्य देने से बचते हैं। इसी कारण आलोचना के गंभीर संकट के बावजूद हिंदी में इस पर सारगर्भित   विचार-विमर्श करना लगभग मुश्किल है। रचनाकार की स्थिति यह बन चुकी है कि वह जब चाहे किसी समीक्षक या आलोचक से अपनी पुस्तकों की मनोनुकूल समीक्षा लिखवा या उस पर व्यक्तव्य दिला सकता है। अधिकतर रचनाकार ही तय कर रहा है कि उसकी पुस्तक की समीक्षा कौन लिखेगा? ऐसी स्थिति में आलोचना कम ही लोगों को स्वीकार्य होती है। यही असहिष्णुता आलोचना की स्वस्थ संस्कृति पैदा होने में बाधा उत्पन्न करती है। ऐसे में आलोचना के साथ न्याय कैसे हो?

सुप्रसिद्ध कहानीकार मुरारी शर्मा कहते हैं कि   हिमाचल में कविता, कहानी की तुलना में आलोचना की जमीन बंजर सी है। आलोचना अपने आप में अलग विधा है, मगर इस दिशा में कुछ खास काम नहीं हुआ है, जिसका खामियाजा यहां के लेखकों को उठाना पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय धारा के कवि सुरेश सेन ‘निशांत’  कहते हैं कि हिमाचल में आलोचना की स्थिति ठीक नहीं है, जबकि समीक्षा व आलोचना करना अत्यंत आवश्यक है।

सच भी है यदि समीक्षा न की जाए तो किसी अवांछित एवं अवैधानिकता पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। आलोचना मनमानेपन को रोकने का जरिया है और आलोचना से ही किसी विचार, अभिव्यक्ति, संरचना इत्यादि को खरा बनाया जा सकता है। प्रत्येक रचनाकार की रचनाओं को शुद्ध-विशुद्ध एवं परिमार्जित करने के लिए ही आलोचना होती है। गुण-दोषों का समान रूप से विवेचन करके तात्विक अवयव को प्रस्तुत करना ही आलोचना है। किसी भी रचनाकार को आलोचना से दूर नहीं भागना चाहिए और न ही चिंतित होना चाहिए।

हिमाचल में आजकल रचनात्मक साहित्य तो खूब लिखा जा रहा है, पर अच्छे आलोचनात्मक लेखन की कमी है। आलोचक लगभग चुप हैं और स्तुति-निंदा को आलोचना का नाम दिया जा रहा है। असल में आलोचना, रचना और रचनाकार के द्वारा पाठकों को दुनिया की पहचान कराती है। जहां आलोचना नहीं, वहां साहित्यिक समाज की गति थम जाती है। वर्तमान की समीक्षा-आलोचना दृष्टि असंतुलित, अस्पष्ट, असंतोषजनक एवं भ्रामक है। आज समीक्षाएं सपाट और सस्ती हो रही हैं। एक रचनाकार दूसरे रचनाकार की पुस्तक की समीक्षा कर रहा है, वह भी सहयोग भाव के साथ। यह मुद्दा ज्वलंत और चिंत्य है।

ख्यातिपात्र कवि आत्मारंजन के कथनानुसार आलोचना विधा की स्थिति हिमाचल क्या हिंदी की मुख्य धारा में भी बहुत अच्छी नहीं है। सतही समीक्षा तक को आलोचना कहने-मानने की दरिद्र स्थिति है। बहुत लोग तो आज के दौर को हिन्दी में आलोचना शून्यता का दौर भी कहते हैं। कहते हैं कि एकनिष्ठ रचना उतनी हानिकारक नहीं होती जितनी कि एकनिष्ठ आलोचना। अन्य क्षेत्रों की तरह हिमाचल की साहित्यिक धरा पर भी सकारात्मक आलोचना का हल जोतने, निष्पक्षता व साहस की खाद डालने, अध्ययनशीलता के बीज बोने व सहानुभूति दृष्टिकोण से सिंचित करने की आवश्यकता है।

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