Divya Himachal Logo Aug 24th, 2017

प्रतिबिम्ब


कहानी की फसल सूखी जाए रे

आजकल हिमाचल में कवि तो बड़ी उछलकूद मचा रहे हैं, परंतु कथाकारों की चाल धीमी हो गई है। क्या कथा की जमीन इतनी पथरीली है, इतनी खुश्क है कि तोड़ने में बहुत ताकत लगती है और सब्र और समय चाहिए। क्या ज्यादा कागज काले करने पड़ते हैं। कहानी से सृजनकर्मी बचते हुए क्यों दिखते हैं। प्रारंभ के कथाकारों को ही देख लीजिए। ‘बर्फ के हीरे’ के ग्यारह हीरों में केवल खेमराज गुप्त और रतन सिंह हिमेश में ही चमक बची रही। ‘एक कथा परिवेश’ के 17 कथाकारों में पहले दो के अलावा सुंदर लोहिया, सुशील कुमार फुल्ल, विजय सहगल, जिया सिद्दिकी, कैलाश भारद्वाज, ले. कर्नल विष्णु शर्मा ही आगे जा कर कहानीकार बने। शेष कुछ उपन्यासकार हो गए और कुछ कवि। छठे दशक में कथाकार त्रयी  सामने आई, जिस में सुंदर लोहिया, विजय सहगल और सुशील कुमार फुल्ल थे। आठवें दशक में एक और कथाकार त्रयी केशव, सुदर्शन वशिष्ठ और योगेश्वर शर्मा। सन् 2000 के बाद फिर एसआर हरनोट, राज कुमार राकेश और बद्रीसिंह भाटिया त्रयी। सन् 2009-10 के बाद मुरारी शर्मा अकेले पड़ गए लगते हैं। उनका साथ किसी ने नहीं दिया। ऐसा नहीं है कि इन तिकडि़यों के समय और कथाकार नहीं आए। इस बीच कम से कम तीस कथाकारों की सूची है, जिसमें कुछ नाम छूट भी गए होंगे। गंगाराम राजी, कृष्ण कुमार नूतन, रमेश चंद्र शर्मा, सत्यपाल, सैनी अशेष, महाराज कृष्ण काव, श्रीनिवास जोशी, यशवीर धर्माणी, अशोक सरीन, गौतम व्यथित, प्रत्यूष गुलेरी, ज्ञान वर्मा, संसारचंद प्रभाकर, एमसी सक्सेना, रतन चंद रत्नेश, साधुराम दर्शक, दिनेश धर्मपाल, शंकर लाल शर्मा, पीसीके प्रेम, अरुण भारती, वासुदेव प्रशांत, रजनीकांत, ओंकार राही, प्रेम कुमारी ठाकुर, कुलदीप चंदेल, केआर भारती, त्रिलोक मेहरा, जगदीश शर्मा, मदन गुप्ता सपाटू, सुदर्शन भाटिया, श्याम सिंह घुना, संतोष शैलजा, सुदर्शना पटियाल, उषा दीपा मेहता, स्नेहलता भारद्वाज, भारती कुठियाला, डा. राज कुमार, आत्मा रंजन, सुरेश शांडिल्य, ओम भारद्वाज, उमेश कुमार अश्क, आशु जेठी आदि। मंडी और पालमपुर की जमीन कथाकारों के लिए बहुत उपजाऊ सिद्ध हुई। मंडी, जो साहित्यकारों का गढ़ माना जाता है, कथा का भी घर रहा। छठे दशक में कहानी में राष्ट्रीय स्तर पर दिखते हुए सुंदर लोहिया ने जल्दी ही चुप्पी साध ली। उनकी जगह योगेश्वर शर्मा नें ढाढस बंधाया और कभी-कभी लिखते हुए भी ‘भराड़ी घाट आ गया’ तक का सफर किया। एक और युवा नरेश पंडित बिजली की चमक से आए और आंखें चुंधियाते हुए बादलों में विलीन हो गए। हंसराज भारती भी बीच-बीच में कहानी- कहानी खेलते रहे। ऐसे ही एक और तेजेंद्र शर्मा बादलों में छिपते और झांकते रहे। पालमपुर की सर जमीन ने केशव सा कथाकार दिया, जिसका अंतर्मन काव्यमय रूप में कहानी देता रहा। सुशील कुमार फुल्ल समय-समय पर रहस्यमयी स्ट्रोक देते रहे। सुदर्शन वशिष्ठ सीधी सादी भाषा में कुछ न कुछ हौले-हौले सुनाते रहे। वैसे साहित्य का संसार भी अनोखा है जनाब। साहित्य परंपरा से भी चलता है। गुलरी जी ने मात्र साढ़े तीन कहानियां लिखीं तो यशपाल ने कितने ही उपन्यासों के  साथ सत्रह कहानी संग्रह लिख डाले। कोई क्या कर सकता है। कोई भी गुलेरी बन सकता है तो कोई भी यशपाल। इधर शिमला में बद्री सिंह भाटिया गांव की मिट्टी लाए। राजेंद्र राजन बीच-बीच में गुनगुनाते रहे। एसआर हरनोट ने ग्राम्य परिवेश से भारत भर में कुछ न कुछ पहुंचाया। मंडी के ही राजकुमार राकेश ने शिमला आकर एक रहस्यमयी चादर दूर तक फैला दी। धीरे-धीरे पुनः खामोशी छाने लगी। कवि ऊंचे-ऊंचे स्वरों में गाने लगे। कथाकारों की फुसफुसाहट दबने लगी। एक वीराना सा छाने लगा। आज कथा से मुलाकात कभी-कभी होती है। फुल्ल बीच-बीच में बुरांस से लाल हो जाते हैं तो कभी हरनोट अमलतास से लिखते हैं। राजन फेसबुक में बतियाते हैं, हंसराज भारती देर बाद लाल सुर्ख हो जाते हैं, तो भाटिया पीली सरसों से महकते हैं। राजकुमार कहीं दूर जा कर तान छेड़ते हैं। मुरारी अकेले ही गाते हैं। वशिष्ठ यह सब देख मंद-मंद मुसकराते हैं। बाकी तो वीराना है। भाई जी पाठक बड़ा सयाना है।

– सुदर्शन वशिष्ठ ने कहानी लेखन के साथ-साथ लोक संस्कृति पर भी महत्त्वपूर्ण काम किया है।

April 10th, 2017

 
 

सूर्य सेन

सूर्य सेन भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारियों और अमर शहीदों में गिने जाते हैं।  सूर्य सेन ‘नेशनल हाई स्कूल’ में उच्च स्नातक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे, जिस कारण लोग उन्हें प्यार से ‘मास्टर दा’ कहते थे।‘चटगांव आर्मरी रेड’ […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

आंचलिकता ने दी है अलग पहचान

किसी एक कहानी के साथ समय कई नई कहानियां जोड़ देता है। इसी कारण कालांतर में कहानी के उत्स को पहचानना और उसके पड़ावों को चिन्हित करना मुश्किल हो जाता है। यह प्रक्रिया हमें इस बात के लिए सजग करती है कि हम अपनी कहानी […] विस्तृत....

April 10th, 2017

 

हावी हो गई है रेवड़ी बांटने की मानसिकता

हाल ही में संसद में हिमाचल प्रदेश की शिमला संसदीय क्षेत्र से सांसद वीरेंद्र कश्यप के प्रदेश के जातीय तथा निचले भूभागों में बोली जाने वाली बोलियों के लुप्त हो जाने पर चिंता जताई। इन बोलियों में किन्नौरी जनजातीय क्षेत्रों, लाहुल-स्पीति आदि अनेक स्थानों की […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

कुछ दायित्व साझे हैं…

चंबा जनपद की हिमाच्छादित पर्वत शृृंखलाएं व मनमोहक घाटियां जिस तरह जनमानस को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, उसी तरह लोक साहित्य में ढली लोक संवेदनाएं भी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। जीवन के विविध आयाम चंबियाली लोक साहित्य में यत्र- तत्र बिखरे […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

अकादमी पर ‘अपनों’ की कुंडली

हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी के तीन विषय हैं-कला संस्कृति और भाषा। नियमानुसार बजट को तीन भागों में बांट कर कला, संस्कृति और भाषा पर व्यय किया जाना चाहिए। खेद की बात है कि कला पर बहुत कम बजट व्यय किया जाता है। पुरस्कारों […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

खटकती है मूल उद्देश्यों के प्रति उदासीनता

मर्म संवेदनशील होता है, मर्म तक पहुंचते भी संवेदनशील लोग ही हैं। इसी कारण यह अपेक्षा की जाती है कि शब्दों के जरिए जीवन और संसार के मर्म को उद्घाटित करने वाले शिल्पियों को भी कुछ ऐसी सुविधाएं प्रदान की जाएं, जो उनकी संवेदनशीलता को […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

अब नहीं दिखता साहित्यिक ‘विजन’

एक नवंबर 1966 को भाषा एवं संस्कृति के आधार पर हिमाचल का वर्तमान स्वरूप उभरा था। डा. यशवंत सिंह परमार मुख्यमंत्री और लाल चंद प्रार्थी, भाषा एवं संस्कृति विभाग के मंत्री बने। इसी दौरान भाषा एवं संस्कृति अकादमी का गठन हुआ। प्रार्थी जी ने इसके […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

माखन लाल चतुर्वेदी

कवि, लेखक, पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 ई. में बावई, मध्य प्रदेश में हुआ था। यह बचपन में काफी रुग्ण और बीमार रहा करते थे। इनका परिवार राधावल्लभ संप्रदाय का अनुयायी था, इसलिए स्वभावतर् उनके व्यक्तित्त्व पर इसका गहरा असर पड़ा।  […] विस्तृत....

April 3rd, 2017

 

विस्तृत हो रहा है फलक

डा. नलिनी विभा नाजली साहित्य और कलाएं सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति के सशक्त एवं खूबसूरत माध्यम हैं। हाल ही में साहित्य अकादमी नई दिल्ली का वर्ष 2016 का पुरस्कार नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास ‘पारिजात’ पर मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि साहित्य-क्षेत्र में महिलाओं […] विस्तृत....

March 27th, 2017

 
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