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खटकती है मूल उद्देश्यों के प्रति उदासीनता

मर्म संवेदनशील होता है, मर्म तक पहुंचते भी संवेदनशील लोग ही हैं। इसी कारण यह अपेक्षा की जाती है कि शब्दों के जरिए जीवन और संसार के मर्म को उद्घाटित करने वाले शिल्पियों को भी कुछ ऐसी सुविधाएं प्रदान की जाएं, जो उनकी संवेदनशीलता को बचाए रखने…

अब नहीं दिखता साहित्यिक ‘विजन’

एक नवंबर 1966 को भाषा एवं संस्कृति के आधार पर हिमाचल का वर्तमान स्वरूप उभरा था। डा. यशवंत सिंह परमार मुख्यमंत्री और लाल चंद प्रार्थी, भाषा एवं संस्कृति विभाग के मंत्री बने। इसी दौरान भाषा एवं संस्कृति अकादमी का गठन हुआ। प्रार्थी जी ने इसके…

माखन लाल चतुर्वेदी

कवि, लेखक, पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 ई. में बावई, मध्य प्रदेश में हुआ था। यह बचपन में काफी रुग्ण और बीमार रहा करते थे। इनका परिवार राधावल्लभ संप्रदाय का अनुयायी था, इसलिए स्वभावतर् उनके व्यक्तित्त्व पर इसका गहरा असर…

विस्तृत हो रहा है फलक

डा. नलिनी विभा नाजली साहित्य और कलाएं सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति के सशक्त एवं खूबसूरत माध्यम हैं। हाल ही में साहित्य अकादमी नई दिल्ली का वर्ष 2016 का पुरस्कार नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास ‘पारिजात’ पर मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि…

आत्मविश्लेषण के साथ बढ़े यह काफिला

मां के आंचल की तरह ही, शब्द की छाया भी हमारे विचारों-संस्कारों को गढ़ती है। पहचान को परिभाषित करने का जिम्मा भी इसी शब्द के पास होता है। पर न जाने क्या बात है कि शब्दों का यह कोमल संसार, आधी दुनिया के आकलन के समय कठोर मुद्रा अख्तियार कर…

संपादन से जुड़ें संबंध

चंद्ररेखा डढवाल लेखन को पुरुष या महिला के स्तर पर बांटने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हैं। लेखन का स्तर सोचने व समझने पर निर्भर करता है। आप जीवन को लेकर क्या सोचते हैं और उसकी पेंचीदगियों को कितना समझ पाते हैं। संवेदना व वैचारिक अनुभवों पर यह…

लेखन की दीर्घ परंपराओं से जुड़ें

रेखा वशिष्ट हिमाचल के साहित्यिक परिदृश्ष्य में यहां के महिला लेखन को अलग से रेखांकित करने का प्रयास नहीं के बराबर हुआ है। यह इसलिए भी कि कभी इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई। पिछले लगभग चालीस वर्षों से हिमाचल में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, मैं…

सरसता की तरफ भी बढ़ें कदम

आशा शैली हिमाचल में जो आज लिखा जा रहा है और जो पूर्व में लिखा गया है उस सब में हिमाचली लेखिकाएं कहां खड़ी हैं, यह देखना वैसे तो समीक्षकों का काम है, परंतु यदि प्रश्न उठ ही खड़ा होता है तो हमें अपनी सीमाओं को निरखने परखने से भी परहेज नहीं…

जरूरी है पाठकों का जुड़ाव

प्रतिक्रिया चर्चित कथाकार, रंगकर्मी और पत्रकार मुरारी शर्मा के अतिथि संपादकत्व में ‘दिव्य हिमाचल’ के साहित्यिक पृष्ठ प्रतिबिंब के माध्यम से साहित्य विमर्श के प्रश्नों का जो रोचक और पठनीय विवरण शब्दों में पिरोया गया है, वह काबिलेतारीफ है।…

साहित्य और पारंपरिक मीडिया बनाम सोशल मीडिया

राजकुमार शर्मा साहित्य और पारंपरिक मीडिया अभी अपने अंतर्संबंधों को लेकर द्वंद्व में ही थे कि नए या सोशल मीडिया के आगमन ने दोनों को सिरे से हिलाकर रख दिया।  जिन प्रवृत्तियों ने साहित्य और पारंपरिक मीडिया के संबंधों में दरारें पैदा की थीं,…

सिनेमा में सार्थक पहल अभी बाकी

डा. देवकन्या ठाकुर दुनिया भर में फिल्मकारों ने महान साहित्यकारों की कृतियों से प्रेरित होकर कई बेहतरीन फिल्में रची हैं। हमारा फिल्म उद्योग उतना ही पुराना है जितना साहित्य से प्रेरित फिल्मों का निर्माण। भारत की पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र…

प्रभाष जोशी

प्रभाष जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट पत्रकार थे, जो गांव, शहर, जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर न केवल समाज…

सहज है साहित्य और मीडिया में थोड़ी असहजता

सचिन संगर साहित्य से प्रेरणा पाने वाले मीडिया तथा साहित्य के रिश्तों में थोड़ी असहजता स्वाभाविक है, कुछ उसी तरह जैसे बाप-बेटे के प्यार भरे रिश्ते में। लेकिन समस्या तब आन खड़ी होती है जब मीडिया, साहित्य होने की कोशिश करता है और साहित्य,…

आंखों में धूल लेकिन सीने में जलन नहीं

मीडिया के लिए न शब्द किसी रुके हुए जल की तरह है और न ही किसी ठहराव में रुकना इसे पसंद है, जबकि इसी शब्द की महिमा किसी साहित्यकार के पास बदल जाती है। वह चाहे तो साहित्य की कमान में, शृंगार के साथ शब्द की यात्रा का खुद सारथी बने और न चाहे तो…

साहित्य और मीडिया पर उपभोक्ता संस्कृति का ग्रहण

सुमित शर्मा आज की उपभोक्ता संस्कृति में उपभोक्ता राजा कहलाता है। यह बात दीगर है कि राजा है कौन? उपभोक्ता या बाजार तथा उसे संचालित करने वाले कारपोरेट। पहले उपभोक्ता को लुभाने के लिए मीडिया का सहारा लिया जाता था और उसका भागी बनता था साहित्य।…
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