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प्रतिबिम्ब


उजाले का चेहरा

आसमान ने पहना

मटमैला काला लिबास

मुस्काती सुबह की आंखों ने

पहना काला चश्मा

श्वेत हिम की चादर

प्रतीक्षा करती रहीं

सूरज की चमकीली किरणों का

परंतु दोपहर की आंखें भी

ढकी रह गईं

काले पर्दे की ओट में

प्रकृति का मुख देखने को तरसा

जनमानस का मन

बादलों के कठोर अनुशासन ने

ढांप लिया

उजाले का चेहरा

अरुण कुमार शर्मा, कुल्लू

May 23rd, 2011

 
 

वसंत

कुसुमाकर के गीत कौन गाता है बासंती हलवाअब कौन बनाता है कौन पीतांबर परिधान ओढ़नी ओढ़ता है ओ गंधवाही! तेरे नूपुरों की झनकार अपसंस्कृति ने कुंठित कर दी है तेरी मधुर झनकार लौह भट्ठियों-विज्ञान ने निगल ली है ओ माधव! तेरे मधु क्षण कुसुम धूलि […] विस्तृत....

May 23rd, 2011

 

हिमाचली-पहाड़ीः संवैधानिक मान्यता के प्रश्न

हिमाचल प्रदेश का गठन, विशाल आकार एवं पूर्ण राज्यत्व का गौरव निश्चित रूप से पहाड़ी क्षेत्र, पहाड़ी संस्कृति एवं पहाड़ी भाषा के कारण ही संभव हो पाया था। पहाड़ों के सार्वभौमिक स्वरूप को मैदानों से अलग आंकते हुए ही शिमला, कुल्लू, कांगड़ा, लाहुल-स्पीति, अंबाला का […] विस्तृत....

May 23rd, 2011

 

लोक संस्कृति का दस्तावेज

समाज को गतिशील बनाने के लिए जिस संकल्प शक्ति की आवश्यकता होती है, उसका संपुटित नाम ‘परंपरा’ है। हमारा समाज परंपरा प्रधान है। परंपरा श्रेष्ठ और उत्तरवर्ती धारा है। उसमें परिवर्तन की न केवल संभावना है, अपितु निरंतरता है। वह अपनी जमीन है, अपना धरातल […] विस्तृत....

May 23rd, 2011

 

चंदा मामा गए कचहरी

निःसंदेह बाल साहित्य किसी परिचय का मोहताज नहीं है। रचनाकारों ने बालकों को समाज का एक अनिवार्य अंग माना होगा तथा यह पाया होगा कि बालक समाज में एक उपयोगी स्थान रखता है। तभी बाल साहित्य का उद्भव हुआ होगा। बाल साहित्य वह है जो […] विस्तृत....

May 23rd, 2011

 

साहित्य का सच भिन्न होता है

जबानें दिलों को जोड़ने के लिए होती हैं तोड़ने के लिए नहीं। ये उद्गार पूर्व अध्यक्ष महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी के डॉ. अब्दुल सत्तार दलवी ने 22 अप्रैल 2011 को बेंक्वेट हॉल,  मंुबई में हेंमत फाउंडेशन द्वारा आयोजित विजय वर्मा कथा सम्मान एवं हेमंत […] विस्तृत....

May 9th, 2011

 

गजल

हर स़फर की तरह अपना गुजरा यह स़फर भी अजनबी चलने को साथ कारवां था लेकिन हर कोई अजनबी भूल आए हैं खुद को कहीं माज़ी में शायद जिंदगी के हर इक मोड़ पे अब है यह जिंदगी अजनबी गांव के रस्ते तक तो थे […] विस्तृत....

May 9th, 2011

 

मेरे बगल की नदी

मेरे बगल में  एक नदी बहती है,  जिसके तटों पर,  रेत ही रेत बिखरी रहती है,  कोई आता है,  अंजुरी भर पीता है,  प्यास बुझाता है,  तृप्त हो लौट जाता है,  कोई दूसरा आता है  डूब-डूब कर नहाता है,  फिर कोई तीसरा आता है,  प्यास […] विस्तृत....

May 9th, 2011

 

बाजार की भूख शांत करने का प्रयास

अप्रैल 2011 का मास अन्ना हजारे के नाम रहा, लेकिन आश्चर्य है कि अन्ना हजारे पर  प्रामाणिक, अंतरंग परिचय देने वाली कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं है। अन्ना हजारे का नाम महाराष्ट्र के संदर्भ में तो सदा प्रचलित रहा है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वह एकाएक […] विस्तृत....

May 9th, 2011

 

मेरे हिस्से की धूप

मेरे हिस्से की धूप रफ्ता रफ्ता चुरा ली गई जब मैं व्यस्त था मस्त था फटे पुराने टीन डब्बों बोतलें आदि एकत्र करने में… हल, हथौड़ा, फावड़ा, हंसिया चलाने में जब मैं खोया था… या फिर अनाज चुनकर,बीनकर सोया था… चांदनी रात को अंबर तले […] विस्तृत....

May 9th, 2011

 
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