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प्रतिबिम्ब


आजादी के दीवानों की दिवाली

-सत्यनारायण भटनागर, 2 एमआईजी देवरा देव नारायण नगर, रतलाम (मप्र.) 457001 मो. 9425103328अद्भुत शिल्पकार

एक तरफ जेल में कैदी नाचते-गाते रहे। दूसरी तरफ स्वतंत्रता सेनानी चारदीवारी पार कर फरार हो गए…

सेंट्रल जेल हजारीबाग की ऊंची-ऊंची दीवारें और लोहे के सीकचों से जड़े बैरक अपनी मजबूती की घोषणा करते दिखाई देते थे। जेल के कठोर कानून कायदे और अंग्रेजों का राज्य। अंग्रेजों के कड़क जेलर अपनी दंड नीति के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें विश्वास था कि चाहे जैसी परिस्थिति हो, वे जेल के अंदर निपट लेंगे। दीपावली का उत्सव निकट था। कैदियों में दीपावली का उत्सव मनाने की उमंग जागी। उत्साह से भरे कैदी गए जेलर के पास, हाथ जोड़ निवेदन किया – ‘श्रीमान! दीपावली के दिन दीपक जलाएंगे, नाचेंगे, गाएंगे, नाटक खेलेंगे। यदि आप स्वीकृति दें।’

जेलर ने दो क्षण सोचा, अपने सहायक जेलर की ओर देखा। पूछा- कैदियों को उत्सव मनाने में हर्ज क्या है? इन कैदियों के पास आनंद मनाने के क्षण यही तो हैं। क्या राय है आपकी?

सहायक जेलर ने कहा – श्रीमान आप कहते तो सच हैं। दीपावली का उत्सव मनना चाहिए, किंतु देश के हालात नाजुक हैं। गांधी बाबा ने करो या मरो का नारा दिया है। सारे देश में सत्याग्रह आंदोलन की आग लगी है। प्रतिदिन सत्याग्रह के कैदी जेल में आ रहे हैं। जेल में भीड़ बढ़ रही है। ऐसे में कोई गड़बड़ तो नहीं होगी, यह सोच का विषय है।

अंग्रेज जेलर हंसा, बोला – यह आपने खूब कही, अरे गांधी बाबा के सत्याग्रही कितने ही आएं, उनसे क्या डर। वे तो सत्य अहिंसा के पुजारी हैं। उनसे विवाद होने से रहा। ज्यादा से ज्यादा जोर-जोर से आजादी के गीत गाएंगे, नाचेंगे और क्या कर सकते हैं। यह सेंट्रल जेल है। यहां चिडि़या भी पर नहीं मार सकती।

सहायक जेलर सहमत हुआ। बोला – कहते तो आप सच हैं। आप दे दीजिए इजाजत। इस बहाने हम भी देख लेंगे इनके नाच गाने, हमारा भी मनोरंजन होगा। हमें ऐसा अवसर कब मिलता है। रोज तो बंधे-बंधे रहते हैं।

जेलर फिर हंसा। बोला – भैया यह तो ठीक है पर आप पी-पी कर कहीं नाचने-गाने मत लगना। अंग्रेज सरकार को मालूम पड़ गया कि आप भी आजादी के दीवानों के साथ नाचे गाए तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।

सब हंसने लगे। कैदियों को दीपोत्सव मनाने की छूट मिल गई। सब कैदी प्रसन्न थे। गीत, भजन तैयार होने लगे। नाटक बनने लगे। रिहर्सल होने लगी। दीपावली के कुछ ही दिन बचे थे। तैयारी पूरी नहीं हो रही थी। रिहर्सल के लिए समय कम मिलता था। कुछ वृद्ध और पढ़े लिखे कैदियों ने जेलर से निवेदन किया – साहब इन छोकरों में बड़ा उत्साह है। इन कैदियों को रात में थोड़ी और छूट मिले तो कार्यक्रम बहुत अच्छा हो।

जेलर प्रतिदिन तैयारी देख रहा था, उसे खबर भी बराबर मिल रही थी, उसे अच्छा लगा। उसने रात 12 बजे तक की छूट दे दी। कैदी प्रसन्न हो गए। नाच, गाने और नाटक की तैयारियां जोर-शोर से होनेेे लगीं।

जेल में युवा समाजवादी नेता जेपी भी थे। वे बीमारी से उठे थे। उन्हें इन नाच गानों में आनंद न था। वे बैडमिंटन खेलते थे। उनके साथी थे कृष्णवल्लभ सहाय। दोनों बैडमिंटन खेलकर अपना समय व्यतीत करते थे। कभी ताश भी खेलने बैठ जाते। युवा जेपी के साथी रामवृक्ष बेनीपुरी, योगेंद्रनाथ शुक्ल, शालिग्राम सिंह, रामनंदन मिश्र, सूर्यनारायण सिंह, गुलाब चंद्र आदि थे। इनके बीच आजादी की लड़ाई को लेकर विभिन्न विषयों पर बहस होती और ये जेल के बाहर चल रही गतिविधियों की टोह लेते रहते।

एक दिन जेपी ने कहा – गांधी जी ने नौ अगस्त को खुले विद्रोह का बिगुल बजाया था, करो या मरो खूब तेजी से आंदोलन चला, पर मैं देख रहा हूं कि अब यह आंदोलन सुस्त पड़ रहा है। जेल में कैदी कम आ रहे हैं। अंग्रेजों ने तमाम नेताओं को जेल में डाल दिया, बिना नेता के कोई आंदोलन चला है क्या? इसके दो परिणाम हो सकते हैं – एक आंदोलन बिना नेता के ठंडा पड़ जाए, दो बिना उचित मार्गदर्शन के भटक जाए। गलत राह पकड़ ले। दोनों हालात में हमारा नुकसान है। हमें कुछ करना चाहिए।

साथियों ने कहा – हम सब तो जेल में हैं। हम क्या कर सकते हैं हमारे हाथ में है क्या?

जेपी ने धीरे से कहा – हम योजना बना कर जेल से भाग सकते हैं। आजादी के लिए कुछ भी किया जा सकता है। अभी अच्छा मौका है।

रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा – आप ठीक कहते हो पर आपका स्वास्थ्य? आपकी शारीरिक कमजोरी को देखते हुए यह संभव कैसे होगा? जेपी मुस्कराए। धीमे से फुसफुसाकर कहा- देश के लिए कुछ भी करूंगा। स्वास्थ्य की चिंता नहीं।

अत्यंत गोपनीय ढंग से योजना बनी। तय हुआ कि दीपावली के राग रंग के बीच जेल की दीवार कूद कर छह स्वतंत्रता सेनानी आजाद होंगे।

सब योजना व्यवस्थित चली। जेपी दिन में कृष्णवल्लभ सहाय के साथ बैडमिंटन खेलते रहे। जेल में ताश पत्ते चलते रहे। युवा कैदी दीपावली के समारोह में नाच गाने की तैयारी में लगे रहे और रात ढलनी प्रारंभ हो गई। अंधकार से प्रकाश की ओर चलो का नारा बुलंद करती दीपावली आ धमकी और इसी समय चुपचाप एक टेबल जेल की दीवार के पास घने वृक्ष के नीचे लग गई एक जवान उस पर खड़ा हुआ। दूसरा चढ़ा और दीवार पर लगी खूंटी पकड़ कर बैठ गया। उसने कमर से रस्सी निकाली और खूंटी से बांधी। वह रस्सी के सहारे जेल के बाहर था। कुछ ही समय में निर्धारित छहों कैदी आजाद थे।

जेल में जश्न मन रहा था। उत्साह उमड़ रहा था, संगीत के स्वर के साथ थाप चल रही थी। भीड़ गायन दोहरा रही थी और दीपकों की लौ जगमगा रही थी। जेपी अपने साथियों के साथ आजाद थे। वे वस्तुतः जेल से उतरते समय गिर पड़े थे। फिर भी लंगड़ाते हुए चलते रहे… रात भर चलते रहे। उनके साथ शालिग्राम सिंह ने अपने परिचित दुबेजी के घर तक छहों को पहुंचा दिया। वहां सबने स्नान-ध्यान व भोजन किया। ग्रामीण वस्त्र पहन बैल गाड़ी पर जेपी लेट गए। उनके पैर में चोट थी। उन्होंने सिर मुंडवा लिया था, दाढ़ी बढ़ी हुई थी। सर पर पगड़ी थी और वे भरी ठंड में ठंडी पड़ती आजादी की मशाल जलाने के लिए चल पड़े थे। उनके साथी भी वेश बदल कर उनके पीछे लाठी और कुल्हाड़ी लिए चल रहे थे।

आजादी के दीवानों ने जेल में रह कर अंग्रेजों को चुनौती दी थी। कहते हैं वह दीपावली का राग- रंग रात भर चला और जेल अधिकारियों को दूसरे दिन दोपहर को यह बात पता चली। वे दंग रह गए। घबराहट छा गई। सेंट्रल जेल की कठोर व्यवस्था और ऊंची-ऊंची दीवारों को आजादी के दीवानों ने अपने साहस से चुनौती दी थी और दीपावली के पर्व को इतिहास के पन्ने से जोड़ दिया था।

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