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प्रतिबिम्ब


लुंबिनी महोत्सव

 लगभग दो हजार साल पहले आंध्रप्रदेश में सिर्फ बौद्ध  धर्म हुआ करता था । इस धर्म को धरोहर की भांति सहेजने के प्रतीक के तौर पर  हर साल यहां नागार्जुन सागर बांध क्षेत्र में लुंबिनी महोत्सव का आयोजन होता है। महीने के दूसरे शुक्रवार से  शुरू होने वाला यह पर्व तीन दिनों तक चलता है। इस बार यह पर्व10 से 12 दिसंबर तक मनाया जा रहा है।

ये गैर हिमाचली

वर्तमान दलाईलामा विश्व में धर्मगुरु की हैसियत रखते हैं। उनका जन्म छह जुलाई 1935 को उत्तरी तिब्बत के एक गांव में हुआ। जब वह मात्र दो वर्ष के थे, तभी उन्हें भविष्य के दलाईलामा के रूप में चिन्हित कर लिया गया था। उनकी शिक्षा-दीक्षा तिब्बत में ही हुई और छह साल की उम्र से ही उन्हें धर्म शिक्षा दी जाने लगी। उनकी शिक्षा में पांच बड़े और पांच छोटे विषय शामिल किए गए, जिनमें जीवन से जुड़े हर क्षेत्र के साथ चिकित्सा, दर्शन और संगीत, कविता जैसे विषय भी शामिल थे।

अंतिम परीक्षा उन्होंने जोखांग मंदिर (ल्हासा)में दी और सभी विषयों में उच्चतम अंक प्राप्त किए। दलाईलामा के पद को संभालने के बाद उन्हें पूर्ण धार्मिक और राजनीतिक अधिकार मिल गए थे। चीनी सेनाओं के तिब्बत पर आक्रमण और क्रूरता से किए जा रहे नरसंहार के कारण उन्हें वहां से निर्वासित होना पड़ा। उन्हें भारत ने शरण और सुरक्षा दोनों दी। महामहिम का धर्मशाला आना था कि जैसे यह छोटा सा शहर विश्व के महत्त्वपूर्ण स्थलों में पहचान पा गया। उत्तरी भारत में स्थित मकलोडगंज में बहुत बड़ी मोनेस्ट्री है और महामहिम का आवास भी। जब उनकी शिक्षाओं का सत्र शुरू होता है, तो समूचा विश्व जैसे इस शहर में उतर आता है। हर देश के लोग यहां आते हैं, उनके दर्शन करते हैं, उनकी टीचिंग्स अटेंड करते हैं। महामहिम के कारण यह शहर बौद्ध तीर्थ के रूप में मशहूर हो गया है। महामहिम ने हिमाचल को अपने घर की तरह अपना कर इसे बहुत बड़ी वैश्विक पहचान दी है।

 

नोराह रिचर्ड का जन्म ऑयरलैंड में हुआ और उनकी शिक्षा ऑक्सफोर्ड में हुई। अपने प्रारंभिक काल में वह टॉलस्टॉय से बहुत प्रभावित थीं। इंग्लैंड में उन्होंने नाटक कला की विधिवत शिक्षा ली उनका विवाह फिलिप अर्नेस्ट रिचर्ड से हुआ।

सन 1911 में नोराह लाहौर चली आईं और यहां बहुत सारे छात्रों को उन्होंने नाटक लिखने और अभिनय करने की शिक्षा दी। उनके अथक प्रयासों से जल्दी ही पंजाबी ड्रामा की एक संस्था स्थापित हो गई। पति के देहांत के बाद नोराह 1934 में अंद्रेटा आ कर बस गईं। इस गांव में उन्होंने अपनी बेहद अच्छी पहचान बनाई और बेहद साधारण व सादगीभरा जीवन जिया। उनकी क्रियाशीलता और रचनाशीलता परवान चढ़ती रही । जल्दी ही उनके किसी मित्र ने उन्हें वुडलैंड स्टेट का उपहार दिया। उन्होंने यहां कच्ची मिट्टी का घर बनाया। यह घर कच्ची मिट्टी की ईंटों से बना था जिसकी भीतरी सजावट में अंग्रेजी और भारतीय शैली का मिश्रण था। घर के बाहर एक छोटा सा बागीचा था जिसकी देख भाल वह खुद करती थींं। यहां उन्होंने जिज्ञासुओं को रंगमंच की शिक्षा देनी शुरू की तथा ओपन एयर थिएटर की स्थापना की। नोराह की इस खूबसूरत कुटिया का नाम हेरमिटेज था। वह एक व्यस्त जीवनचर्या के तहत चलती थीं। सुबह चार बजे उठना,पढ़ना ,खाना बनाना और छोटे-छोटे नाटक लिखना। ये नाटक ग्रामीणों और बच्चों द्वारा खेले जाते थे। रंगकर्मी नोराह रिचर्ड के कारण भी अंद्रेटा का नाम विश्वविख्यात हो गया। एक गैर हिमाचली का हिमाचल को दिया यह सुंदर उपहार था। उनकी कर्म भूमि को राइटर्स होम का नाम मिला।  सन 1971 में उनका देहांत हो गया। जब भी पटियाला के रंग कर्मी यहां आते हैं तो नाटकों का मंचन करते हैं,  सुंदर गीत गाते हैं और कभी-कभी लिटरेरी वर्कशाप भी चलाते हैं । तब नोराह का यह नन्हा सा स्वर्ग जीवंत हो उठता है। यह जरूर है कि नोराह का सपना साकार करने वाले ये लोग पंजाब से आते हैं। हिमाचल  को नोराह के सपनों की परवाह नहीं।

December 5th, 2010

 
 

शिखर सम्मेलन

पिछले दिनों शिखर सम्मेलन का आयोजन ऊना में किया गया। 19-20 नवंबर को हुआ  जिसमें आत्माराम रंजन को प्रथम युवा शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया। मुख्य रूप से यह आयोजन युवा रचनाशीलता पर था।  सम्मेलन मुख्य पांच सत्रों का था। पहला सत्र प्रदेश के […] विस्तृत....

December 5th, 2010

 

अगले मौसमों के लिए

सार्वजनिक तौर पर कम ही मिलते हम भाषा के एक छोर पर बहुत कम बोलते हुए अक्सर बगलें झांकते भाषा के तंतुओं से एक दूसरे को टटोलते दूरी का व्यवहार दिखाते क्षण भर को छूते नोंक भर और … पा जाते संपूर्ण हमारे उसके बीच […] विस्तृत....

December 5th, 2010

 

अच्छे दिन

अच्छे दिन खरगोश हैं लौटेंगे हरी दूब पर उछलते-कूदते और हम गोद में ले कर उन्हें प्यार करेंगे अच्छे दिन पक्षी हैें उतरेंगे हरे पेड़ों की सबसे अच्छी फुनगी पर और हम बहेलिए के जाल से  उन्हें सचेत करेंगे अच्छे दिन दोस्त हैं मिलेंगे यात्रा […] विस्तृत....

December 5th, 2010

 

उषाकाल

प्राची के सोतों से मीठी गरमाहट के फव्वारे फूट रहे धूप के गुलाबी रंग पेड़ों की गीली हरियाली पर छू रहे चांद कटी पतंग सा दूर उस झुरमुट के पीछे गिरता जाता किलकारी भर-भर खग दौड़-दौड़ अम्बर में किरण डोर लूट रहे कुंवर नारायण विस्तृत....

December 5th, 2010

 

ओबामा की समग्र दृष्टि

ओबामा की समग्र दृष्टि ओबामा की यह पुस्तक उनकी, चेंज वी कैन विलीव इन का हिंदी अनुवाद है। इस पुस्तक में भी बराक ओबामा की लेखन क्षमता, भाषा की सहजता और संप्रेषणीयता उजागर होती है। जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी अनुभूतियां जिनसे हो कर ओबामा गुजरे, […] विस्तृत....

December 5th, 2010

 

ओबामा की समग्र दृष्टि

ओबामा की यह पुस्तक उनकी, चेंज वी कैन विलीव इन का हिंदी अनुवाद है। इस पुस्तक में भी बराक ओबामा की लेखन क्षमता, भाषा की सहजता और संप्रेषणीयता उजागर होती है। जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी अनुभूतियां जिनसे हो कर ओबामा गुजरे, इनमें दर्ज हैं। जिस […] विस्तृत....

December 5th, 2010

 

अश’आर

ये उदास-उदास चेहरे,ये हसीं-हसीं तबस्सुम तेरे अंजुमन में शायद कोई आईना नहीं है                              शकील बदायंूनी बात क्या चाहिए जब मुफ्त की हुज्जत ठहरी इस गुनाह पर मुझे मारा कि गुनाहगार न था                                  दा़ग देहलवी फिर नजर में फूल महके,दिल में फिर शम्एं जलीं […] विस्तृत....

December 5th, 2010

 

ये गैर हिमाचली

विश्व ही कोई ऐसा देश होगा जहां चित्रकार रोरिख का नाम नहीं जाना जाता होगा। भारत के प्रति रोरिख की रुचि स्वाभाविक थी, क्योंकि यह 19वीं सदी के अंत तथा  20वीं सदी के आरंभ की रशियन इंडोलॉजी से प्रेरित थी। रोरिख का नाम रूस के […] विस्तृत....

November 28th, 2010

 

सोभा सिंह

सदार सोभा सिंह जी विभाजन के बाद अंद्रेटा आए यहां आने पर आने पर पंचायत प्रधान एसआर भंडारी ने उन्हें अपने घर के पास के वन में जमीन दे दी, जहां कलाकार ने छोटी सी कुटिया बनाई और कला साधना में डूब गए। बाद में […] विस्तृत....

November 28th, 2010

 
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