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प्रतिबिम्ब


इंतजार

– सतीश सिंह

मैं भेजता रहूंगा हमेशा उसको

ढाई आखर से पगे खत

अपने पीड़ादायक क्षणों से

कुछ पल चुरा कर

उन्हें कलमबद्ध करता ही रहूंगा

कविताओं और कहानियों में

मैं सहेज कर रखूंगा

सर्वदा उन पलों को

जब आखिरी बार

उसने अपने पूरेपन से

समेट लिया था अपने में मुझे

और दूर कहीं

हमारे मिलन की खुशी में

चहचहाने लगीं थीं चिडि़याएं

ऐसा नहीं है कि

मैं भूलने की कोशिश नहीं करता हूं उसे

पर भूल कहां पाता हूं

इस असफल कोशिश में

वह और भी याद आती है मुझे

हंसता हूं

लेकिन हंसते-हंसते

 छलक पड़ती हैं आंखें

उससे हजारों मील दूर आ गया हूं

फिर भी मन है कि मानता नहीं

घूम-फिर कर 

चला जाता है उसी के पास

मैं जानता हूं

अब वह नहीं आएगी

किंतु दिल और आंखें

इस अमिट सत्य को

आज भी मानने को तैयार नहीं

वे आज भी

इंतजार करते हैं

उसका और उसके उन खतों का

जो कभी नहीं आएंगे

November 7th, 2010

 
 

रोशनी के मुसाफिर

हमने कुछ ऐसे रचनाकार और कलाकार खोए हैं, जिन्हें भुलाना आसान नहीं,  दुनिया आनी-जानी है, पर कुछ मुसाफिर ऐसे भी होते हैं, जो अपनी पुख्ता निशानियां छोड़ जाते हैं… निर्मल वर्मा उन लेखकों में से थे जिन्होंने हिंदी साहित्य का चेहरा ही बदल दिया। वह […] विस्तृत....

October 24th, 2010

 

आजादी के दीवानों की दिवाली

-सत्यनारायण भटनागर, 2 एमआईजी देवरा देव नारायण नगर, रतलाम (मप्र.) 457001 मो. 9425103328अद्भुत शिल्पकार एक तरफ जेल में कैदी नाचते-गाते रहे। दूसरी तरफ स्वतंत्रता सेनानी चारदीवारी पार कर फरार हो गए… सेंट्रल जेल हजारीबाग की ऊंची-ऊंची दीवारें और लोहे के सीकचों से जड़े बैरक अपनी […] विस्तृत....

October 24th, 2010

 

तू बहुत देर से मिला है मुझे

फरा़ज शायर तो पाकिस्तान  के थे ,पर प्यार उन्हें दिल से हिंदोस्तानियों ने किया। इस प्यार के मौके भी खूब मिलते थे। हर दूसरे -तीसरे महीने किसी न किसी मुशायरे में भारत आना और दिलों पर अपनी छाप छोड़ जाना। इस सबसे अलग उनका अंदाज […] विस्तृत....

August 29th, 2010

 

आज के अश’आर

हर तमाशाई ़फकत साहिल से मंजर देखता कौन दरिया को उलटता कौन गौहर देखता वो, तो दुनिया को मेरी दीवानगी खुश आ गयी तेरे हाथों में वगरना पहला पत्थर देखता आंख में आंसू जड़े थे  पर सदा तुझको न दी इस तवक्को पर कि शायद […] विस्तृत....

August 29th, 2010

 

पर राजनीति का अंधेरा

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया को लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां पैदा होने से इसकी विश्वसनीयता को करारा आघात लगा है। स्थिति यह है कि कल तक जो लोग आंख मंूद कर समाचार पत्रों में छपी अर्द्धसत्य खबरों पर भी भरोसा कर लेते […] विस्तृत....

August 29th, 2010

 

पर्यावरण पत्रकारिता का सच

जन माध्यमों में पर्यावरण का प्रश्न आमतौर पर उपेक्षित रहा है। खासकर प्रेस ने पर्यावरण संबंधी समस्याओं एवं चुनौतियों के प्रति जिस तरह का उपेक्षा भाव प्रदर्शित किया है वह अक्षम्य है। पर्यावरण का प्रश्न प्रकृति, स्वास्थ्य, आजीविका के साथ ही आम जिंदगी का अनिवार्य […] विस्तृत....

August 29th, 2010

 

टेर वंशी की

यमुना के पार अपने आप झुक गई कदम की डार द्वार भर गहर ठिठकी राधिका के नैन झरे कंप कर दो चमकते फूल फिर वही सूना अंधेरा  कदम सहमा घुप कालिंदी कूल विस्तृत....

August 29th, 2010

 

अलस कालिंदी

अलस कालिंदी कि कांपी टेर वंशी की नदी के पार कौन दूभर भार अपनेआप झुक आई कदम की डार धरा पर बरबस झरे दो फूल द्वार थोड़ा हिले झरे-झपके राधिका के नैन अलक्षित टूट कर दो गिरे तारक बूंद फिर उसी बहती नदी का  वही […] विस्तृत....

August 29th, 2010

 

क्यों नदियां चुप हैं

क्यों नदियां चुप हैं जब सारा जल ज़हर हो रहा, क्यों नदियां चुप हैं? जब यमुना का अर्थ खो रहा, क्यों नदियां चुप हैं? चट्टानों से लड़-लड़कर जो बढ़ती रही नदी, हर बंजर की प्यास बुझाती बहती रही नदी! जब प्यासा हर घाट रो रहा, […] विस्तृत....

August 29th, 2010

 
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