Divya Himachal Logo Feb 27th, 2017

प्रतिबिम्ब


कविताएं

बीता साल गुजारा हमने

बीता साल गुजारा हमने

पत्नी को मनाने में

चप्पल-जूते घिस गए हमारे

ससुराल आने-जाने में।

बीता साल गुजारा हमने

स्कूल से फरलो लगाने में

रजिस्टर में ऑन ड्यूटी भरकर

पहुंच जाते

मयखाने में

छात्रों को साल भर

कुछ न पढ़ाया

हमको जरा तरस नहीं आया

आई सालाना परीक्षाएं

सिर पर तो

हमने गुरु-शिष्य का रिश्ता

खूब निभाया

जी भरकर नकल करवाई

छात्रों का बेड़ा पार लगाया।

हमारी इस कामयाबी पर

स्कूल प्रबंधन समिति ने एक

जश्न मनाया

सम्मानित किया गया हमको

आदर्श शिक्षक का हमने खिताब पाया।

बीता साल गुजारा हमने

बड़ा लेखक बन जाने में

बिन सोचे समझे हमने

लिख डाली ढेरों रचनाएं

भेज दिया उन सबको हमने,

बड़े-बड़े अखबारों में

खेद सहित

जब रचनाएं वापस आई,

उतर गया भूत,

बड़ा लेखक बन जाने का।

बीता साल गुजारा हमने

पत्नी की तन्हाई में

प्यार के मीठे दो बोलों को

तरस गए अपनी ही लुगाई से।

‘औरत की व्यथा’

वर्षों हो गए हैं मुझे

इस घर में आए हुए

परंतु तुमसे आज तक

पत्नी का दर्जा नहीं

ले पाई हूं।

तुम कमरे में आते हो

सिर्फ देह को भोगने

के लिए, और मैं भी

सौंप देती हूं तुमको अपना तन

ताकि किसी हवसी की तरह

तुम भी मिटा लो अपनी

वासना की भूख।

औरत के जज्बातों, अरमानों की

तुमने कभी कद्र नहीं जानी

इसलिए तुम क्या जानो कि एक

औरत के मन में भी दया, ममता

का अथाह सागर होता है,

वो भी किसी की बेटी, बहन या

मां होती है।

ढलती उम्र के पड़ाव में जब

तुम, थक कर निढाल

होकर अपने बीते हुए

कल का जिक्र करोगे

तो वह संभाल लेगी तुम्हें

परंतु मन से नहीं सिर्फ देह से।

कभी उसने भी सजाए थे

आंखों में भी सतरंगी सपने

जो हर लड़की देखा करती है

पीहर से ससुराल जाते वक्त।

परंतु तुमने तो अपनी मर्यादाओं

का बंधन तोड़कर, अपने सुख

की खातिर किसी और की वाहों में

जाकर लुटाते रहे अपना प्यार व पैसा

परंतु औरत की व्यथा को तुम न समझे पाए कभी।

— प्रदीप गुप्ता, मकान नं. 193/1 सुशीला स्मृति , निवास डियारा सेक्टर, बिलासपुर

February 20th, 2017

 
 

मेलों में बना रहे ‘लोक’

मेले हमारी संस्कृति का एक दर्पण हैं, प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक हैं। यहां तो साल भर लगभग हर रोज ही कहीं न कहीं ढोल- नगाड़ों के स्वर गूंजते रहते हैं, पूरा साल मेलों का दौर चलता है और इससे ही हमारी समृद्ध […] विस्तृत....

February 20th, 2017

 

सभ्यता का संदेश देते खंडहर

शिक्षा के मामले में भारत के पास एक स्वर्णिम थाती है और नालंदा विश्वविद्यालय उस थाती का उत्कृष्ट प्रतीक। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करीब 2500 साल पहले बौद्ध धर्मावलंबियों ने की थी। यह विश्वविद्यालय न केवल कला, बल्कि शिक्षा के तमाम पहलुओं का अभिनव केंद्र […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

लोक गाथाओं में सतलुज का राग

लोक गाथा में भगवान वामन दो पग में पूरी पृथ्वी लांघ जाते हैं। परिणामतः आधा पद बलि अपने सिर पर धारण करता है। पृथ्वी के राज्य को खोने के बाद बलि भगवान से प्रार्थना करता है कि उसे धरती पर बारह संक्रांतियों और बारह अमावस […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

लोकार्पण

प्रतिष्ठित साहित्यकार नरेंद्र कोहली को हाल ही में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। व्यवस्थागत उपेक्षाओं के बावजूद साहित्य जगत उनकी सशक्त उपस्थिति महसूस करता रहा है। हिंदी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेंद्र कोहली को ही दिया जाता है। […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

जे. कृष्णमूर्ति

जे.कृष्णमूर्ति का जन्म तमिलनाडु के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में 12 मई, 1895 को हुआ था। अपने माता पिता की आठवीं संतान के रूप में उनका जन्म हुआ था, इसीलिए उनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। कृष्ण भी वासुदेव की आठवीं संतान थे। वह एक विश्व […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है

तेरी लट से ही तो रात चुराई है। सूरत तेरे मुखड़े का अनुयायी है। मौसम तेरे सांसों से बनते हैं। दिन और रात तेरे नयनों से चलते हैं। फूल खिले हैं पत्तों की शहनाई है। सूरज तेरे मुखड़े का अनुयायी है। जब तू शबनम ऊपर […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

आहट

रात जाने को है सुबह आने को है। जिंदगी कोई आहट सुनाने को है।। देखी दरियादिली तेरे दीदार की। दिल पे छुरियां हजारों चलाने को है।। मरघटों के हैं सन्नाटे मेरे लिए। बैंड-बाजा-बाराती सताने को हैं।। दिल जला मुझको कहते हैं,कहते रहें। कोई मेरे कहां […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

अठारह-बीस की उम्र

अठारह-बीस की उम्र किसी को मारने की नहीं खुद किसी पर मरने की उम्र होती है इस उम्र में तो होते हैं हर तरफ मेले ही मेले सजी होती है बहारें दूर तक नजर आती है जिंदगी की खूबसूरती दिन-दोपहर को भी सपने दिखाई देते […] विस्तृत....

February 13th, 2017

 

चौथे स्तंभ का राजनीतिक पक्ष

भारतीय राजनीति में डकैत, लठैत, सामंत, आलाकमान जैसे शब्दों का राजनीतिक विमर्श में बाहुल्य बेहद चिंताजनक है। चाहे हम एटम बम का निर्माण कर लें या राकेट छोडें, लेकिन राजनीतिक-सामाजिक रूप से अभी भी आधुनिकता की मंजिल से काफी दूर खड़े नजर आते हैं। हमारा […] विस्तृत....

February 6th, 2017

 
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