Divya Himachal Logo Jul 25th, 2017

प्रतिबिम्ब


ये मेघ साहसिक सैलानी

ये मेघ साहसिक सैलानी!

ये तरल वाष्प से लदे हुए

द्रुत सांसों से लालसा भरे,

ये ढीठ समीरण के झोंके,

कंटकित हुए रोएं तन के

किन अदृश करों से आलोडि़त

स्मृति शेफाली के फूल झरे!

झर-झर झर-झर

अप्रतिहत स्वर

जीवन की गति आनी-जानी!

झर –

नदी कूल के झर नरसल

झर – उमड़ा हुआ नदी का जल

ज्यों क्वारपने की केंचुल में

यौवन की गति उद्दाम प्रबल

झर –

दूर आड़ में झुरमुट की

चातक की करुण कथा बिखरी

चमकी टिटीहरी की गुहार

झाऊ की सांसों में सिहरी,

मिल कर सहसा सहमी ठिठकीं

वे चकित मृगी-सी आंखडि़यां

झर! सहसा दर्शन से झंकृत

इस अल्हड़ मानस की कडि़यां

झर –

अंतरिक्ष की कौली भर

मटियाया-सा भूरा पानी

थिगलियां-भरे-छीजे आंचल-सी

ज्यों-त्यों बिछी धरा धानी,

हम कुंज-कुंज यमुना-तीरे

बढ़ चले अटपटे पैरों से

छिन लता-गुल्म छिन वानीरे

झर-झर झर-झर

द्रुत मंद स्वर

आए दल बल ले अभिमानी

ये मेघ साहसिक सैलानी!

कंपित फरास की ध्वनि सर-सर

कहती थी कौतुक से भर कर

पुरवा-पछवा हरकारों से

कह देगा सब निर्मम हो कर

दो प्राणों का सलज्ज मर्मर –

औत्सुक्य-सजल पर शील-नम्र

इन नभ के प्रहरी तारों से!

वो कह देते तो कह देते

पुलिनों के ओ नटखट फरास!

ओ कह देते तो कह देते

पुरवा पछवा के हरकारों

नभ के कौतुक कंपित तारों

हां कह देते तो कह देते

लहरों के ओ उच्छवसित हास!

पर अब झर-झर

स्मृति शेफाली,

यह युग-सरि का

अप्रतिहत स्वर!

झर-झर स्मृति के पत्ते सूखे

जीवन के अंधड़ में पिटते

मरुथल के रेणुक कण रुखे!

झर-जीवन गाति आनी जानी

उठती गिरती सूनी सांसें

लोचन अंतस प्यासे भूखे

अलमस्त चल दिए छलिया से

ये मेघ साहसिक सैलानी!

– अज्ञेय

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July 17th, 2017

 
 

बादल चले गए वे

बना बना कर चित्र सलोने यह सूना आकाश सजाया राग दिखाया रंग दिखाया क्षण-क्षण छवि से चित्त चुराया बादल चले गए वे आसमान अब नीला-नीला एक रंग रस श्याम सजीला धरती पीली हरी रसीली शिशिर-प्रभात समुज्जल गीला बादल चले गए वे दो दिन दुख के […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

मंगल वर्षा

पी के फूटे आज प्यार के पानी बरसा री हरियाली छा गई, हमारे सावन सरसा री बादल छाए आसमान में, धरती फूली री भरी सुहागिन, आज मांग में भूली-भूली री बिजली चमकी भाग सरीखी, दादुर बोले री अंध प्रान-सी बही, उड़े पंछी अनमोले री छिन-छिन […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

देवकीनंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री  हिंदी के प्रथम तिलिस्मी लेखक थे। उन्होंने ‘चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता संतति’, काजर की कोठरी’, ‘नरेंद्र-मोहिनी’, ‘कुसुम कुमारी’, ‘वीरेंद्र वीर’, , ‘कटोरा भर’ और ‘भूतनाथ’ जैसी रचनाएं कीं। ‘भूतनाथ’ को उनके पुत्र ‘दुर्गा प्रसाद खत्री’ ने पूरा किया था। हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में उनके […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

विस्थापन के बीच शब्दों की खेती

कुलदीप चंदेल, अतिथि संपादकविस्थापन प्रायः विवशताओं से उपजता है। बाध्यताओं के कारण शरीर तो एक जगह से दूसरी जगह चला जाता है, लेकिन स्मृतियां अपनी जड़ों में उलझी रहती हैं। वे बार-बार उस परिवेश की तरफ लौटना चाहती हैं, जिसने उन्हें गढ़ा है। यह आकर्षण […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

विस्थापन का दौर यूं कब तक

मैं हूं एक ऐसी पौध जो अपनी ही जमीन से उखाड़ कर बेदखली के रूप रोपित कर दी गई पराई जमीन पर हवा, पानी, खाद भी जिंदा न रख पाई मुझे क्योंकि  अपनी ही जड़ों से कटी तलाशती रही ताउम्र अपनी पुश्तैनी जड़ें बिन पुष्पित, […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

विस्थापितों के हक पर गैर विस्थापितों का कब्जा

विस्थापित शब्द आजकल प्रायः हर रोज पढ़ने और सुनने को मिलता है। इसका सरलार्थ है कि सरकार द्वारा किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह की संपत्ति (भवन-भूमि आदि) का सार्वजनिक हित में मुआवजा राशि देकर अधिग्रहण करना। कल्याणकारी राज्य होने के नाते विस्थापितों के उचित […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

एक शहर पुराना सा

मंदिरों, शिवालयों, कुओं, स्नानागारों और बाग- बागीचों वाला बड़ा अद्भुत था वह एक शहर पुराना सा। पंछी थे कलरव करते बूढ़े पेड़ों पर, बांसों के बीहड़ों पर बच्चे थे खेला करते गोहर, पोखर, गलियां-गलियां बड़ा अद्भुत था, वह एक शहर पुराना सा। खाखी शाह था […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

लाभांश में मिले हिस्सा

जनहित तथा विकास के लिए सरकार सड़कें, फोरलेन फ्लाईओवर तथा हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाती-लगाती है। इसके लिए सरकार लोगों की मिलकीयत भूमि, घर, दुकानें क्षतिपूर्ति की रकम या मुआवजा देकर हासिल कर लेती है। इसका परिणाम यह होता है कि सैकड़ों की संख्या में परिवारों के […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

नदी में अठखेलियां

ब्यास नदी में उतरा मन ऊपर आकाश में डोलता पैराग्लाइडर। पहाड़ की चोटियां झाड़ती बर्फ जिस ओर देखें सब बुलाती अपनी तरफ। स्वच्छ धारा और मचलती लहरें उछल-उछल कर कहती हम से हैं बहारें। बाहें पसार स्वागतरत डोलता, तैरता राफ्ट अभिमंत्रित करती अठखेलियां धार में […] विस्तृत....

June 19th, 2017

 
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