Divya Himachal Logo Aug 20th, 2017

प्रतिबिम्ब


घन गरजे

सखि, वन-वन घन गरजे!

श्रवण निनादा-मगन

मन उन्मन

प्राण-पवन-कण

लरजे!

परम अगम प्रियतमा गगन की शंख-ध्वनि आई

मंथर गति रति चरण चारू की चाप गगन में छाई

अंबर कंपित पवन संचारित संसृति अति सरसाई

मंद्र-मंद्र आगमन सूचना हिय में आन समाई

क्षण में प्राण उन्मादी

कौन इन्हें अब बरजे?

मेरा गगन और मम आंगन आज सिहर कर कांपा

मेरी यह आल्हाद बृथा सखि, बना असीम अमापा

आवेंगे वे चरण जिन्होंने इस त्रिलोक को नापा

सखि मैंने ऐसा आमंत्रण-श्रुति स्वर कब आलापा?

लगता है मानो ये बादल कुछ यों ही हैं तरजे!

श्रवण-निनाद-मगन

मन-उन्मन

प्राण-पवन-कण लरजे!

-बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’’

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July 17th, 2017

 
 

काले बादल

कहां से आए बादल काले? कजरारे मतवाले! शूल भरा जग, धूल भरा नभ, झुलसीं देख दिशाएं निष्प्रभ, सागर में क्या सो न सके यह करुणा के रखवाले? आंसू का तन, विद्युत का मन, प्राणों में वरदानों का प्रण, धीर पदों से छोड़ चले घर, दुख-पाथेय […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

गुरु दत्त

गुरु दत्त फिल्म निर्माता-निर्देशक और अभिनेता थे। ‘गुरु दत्त’ का वास्तविक नाम ‘वसंथ कुमार शिवशंकर पादुकोण’ था। गुरु दत्त अपने आप में एक संपूर्ण कलाकार बनने की पूरी पात्रता रखते थे। वे विश्व स्तरीय फिल्म निर्माता और निर्देशक थे। साथ ही उनकी साहित्यिक रुचि और […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

बूंद-बूंद से झरती कविता

बारिश की बूंदों से धरती पर ही कोंपलें नहीं फूटतीं, मन की मिट्टी में भी नवांकुर निकल आते हैं। इस मौसम में सृजनात्मकता अपने चरम पर होती है। प्रकृति के सभी अंग-उपांग सक्रिय हो जाते हैं और इसी कारण, धरती  सोलह शृंगार करके नववधू जैसी […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

ये मेघ साहसिक सैलानी

ये मेघ साहसिक सैलानी! ये तरल वाष्प से लदे हुए द्रुत सांसों से लालसा भरे, ये ढीठ समीरण के झोंके, कंटकित हुए रोएं तन के किन अदृश करों से आलोडि़त स्मृति शेफाली के फूल झरे! झर-झर झर-झर अप्रतिहत स्वर जीवन की गति आनी-जानी! झर – […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

बादल चले गए वे

बना बना कर चित्र सलोने यह सूना आकाश सजाया राग दिखाया रंग दिखाया क्षण-क्षण छवि से चित्त चुराया बादल चले गए वे आसमान अब नीला-नीला एक रंग रस श्याम सजीला धरती पीली हरी रसीली शिशिर-प्रभात समुज्जल गीला बादल चले गए वे दो दिन दुख के […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

मंगल वर्षा

पी के फूटे आज प्यार के पानी बरसा री हरियाली छा गई, हमारे सावन सरसा री बादल छाए आसमान में, धरती फूली री भरी सुहागिन, आज मांग में भूली-भूली री बिजली चमकी भाग सरीखी, दादुर बोले री अंध प्रान-सी बही, उड़े पंछी अनमोले री छिन-छिन […] विस्तृत....

July 17th, 2017

 

देवकीनंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री  हिंदी के प्रथम तिलिस्मी लेखक थे। उन्होंने ‘चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता संतति’, काजर की कोठरी’, ‘नरेंद्र-मोहिनी’, ‘कुसुम कुमारी’, ‘वीरेंद्र वीर’, , ‘कटोरा भर’ और ‘भूतनाथ’ जैसी रचनाएं कीं। ‘भूतनाथ’ को उनके पुत्र ‘दुर्गा प्रसाद खत्री’ ने पूरा किया था। हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में उनके […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

विस्थापन के बीच शब्दों की खेती

कुलदीप चंदेल, अतिथि संपादकविस्थापन प्रायः विवशताओं से उपजता है। बाध्यताओं के कारण शरीर तो एक जगह से दूसरी जगह चला जाता है, लेकिन स्मृतियां अपनी जड़ों में उलझी रहती हैं। वे बार-बार उस परिवेश की तरफ लौटना चाहती हैं, जिसने उन्हें गढ़ा है। यह आकर्षण […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 

विस्थापन का दौर यूं कब तक

मैं हूं एक ऐसी पौध जो अपनी ही जमीन से उखाड़ कर बेदखली के रूप रोपित कर दी गई पराई जमीन पर हवा, पानी, खाद भी जिंदा न रख पाई मुझे क्योंकि  अपनी ही जड़ों से कटी तलाशती रही ताउम्र अपनी पुश्तैनी जड़ें बिन पुष्पित, […] विस्तृत....

July 3rd, 2017

 
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