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प्रतिबिम्ब


वाद्य यंत्रों से संरक्षित रह पाएगा हिमाचली संगीत

यही नहीं, कुल्लू दशहरा के ‘प्राइड ऑफ  कुल्लू’ कार्यक्रम जिसमें हजारों औरतें एक साथ नृत्य करती हैं, उसमें सौ फीसदी हिमाचली लोक वाद्य यंत्र ही बजाए जाते हैं। राठी भी मानते है वर्तमान में लोक वाद्य यंत्र अधिकतर देव कार्यों में ही बजाए जाते है…

लोक वादकों को प्रोत्साहन देने के लिए मंडी शिवरात्रि व कुल्लू दशहरे में व कई अन्य जगहों पर अलग से वाद्य यंत्रों की प्रतियोगिताएं भी करवाई जाती हैं, मगर सबसे बड़ी बात पब्लिक के रुझान की ही है। हमारी लोक संस्कृति, लोक संगीत, वाद्य यंत्र तभी सुरक्षित-संरक्षित होंगे जब पब्लिक भी उन्हें सिर माथे लेगी। पारिश्रमिक के नाम पर दर्शन कालिया भी मानते हैं कि दूसरे कलाकारों की तर्ज पर उन्हे बहुत कम मिलता है। यह युवाओं की वाद्य यंत्रों की ओर बेरुखी का एक बड़ा कारण हो सकता है। हिमाचल के सुप्रसिद्ध लोक गायक ठाकुर दास राठी कहते हैं उनके संगीत में कहीं न कहीं हिमाचली वाद्य यंत्र शामिल रहते ही है। यही नहीं कुल्लू दशहरा के ‘प्राइड ऑफ  कुल्लू’ कार्यक्रम जिसमें हजारों औरतें एक साथ नृत्य करती हैं, उसमें सौ फीसदी हिमाचली लोक वाद्य यंत्र ही बजाए जाते हैं। राठी भी मानते है वर्तमान में लोक वाद्य यंत्र अधिकतर देव कार्यों में ही बजाए जाते है। देव कार्य में पारिवारिक परंपरा के नाम पर बाजीदारों का आर्थिक शोषण होता आया है जिस कारण उनकी युवा पीढ़ी पढ़ लिखकर दूसरे रोजगार ढूंढ रही है। अगर इस परंपरा को सहेजना है तो बाजीदारों को सरकार को आर्थिक सहायता देनी चाहिए साथ ही उनकी मासिक आय निर्धारित करनी होगी तभी यह परंपरा युवा पीढ़ी वहन कर पाएगी। वाद्य यंत्र न केवल देव कार्य व आजीविका का ही साधन हैं बल्कि ये राष्ट्रीय स्तर पर भी आभा बिखेरने में कम नहीं। देव वाद्य ‘पौण माता’ बजाने वाले भरमौर के 98 वर्षीय मुसाफिर राम भारद्वाज न केवल दिल्ली संगीत अकादमी से राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर चुके हैं, बल्कि महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों ‘पौण माता’ देव वाद्य यंत्र के लिए पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुके हैं।

‘दिव्य हिमाचल’ से लाइफ  टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से पुरस्कृत होने वाले मुसाफि राम भारद्वाज जी का मानना है कि वे राज्य में अभी उपेक्षित ही हैं। उनके अनुसार हमारे पाठ्यक्रमों में वाद्य यंत्रों को शामिल किया जाना जरूरी है, जिससे युवा अपनी संस्कृति के महत्त्व को जान सकें। उनका मानना है कि युवाओं  अपनी लोक संस्कृति को सम्मान दें, तभी हमारी लोक संस्कृति जीवित रह सकेगी। यहां तक कि हिमाचल भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा भी वादकों को सम्माननीय पुरस्कार अभी तक दृष्टिगोचर नहीं हुआ।  राज्य सरकार की इस विषय के प्रति गंभीरता इस बात से परिलक्षित होती है कि वाद्य यंत्रों के संरक्षण व संवर्द्धन का जिम्मा हिमाचल सरकार के वरिष्ठ मंत्री जीएस बाली को सौंपा गया है। जीएस बाली के अनुसार यह एक महत्त्वपूर्ण व संवेदनशील विषय है और हमारी लोक संस्कृति का आधार स्तंभ है। इसको जीवित रखने के लिए हमारी आने वाली पीढ़ी को इस विषय में दक्ष एवं पारंगत करना अति-आवश्यक है, जिसके लिए सरकार योजनाबद्ध तरीके से नीति निर्माण कर रही है। कुछ भी हो कोई भी प्रदेश अपनी पहचान तभी बना पाता है, जब उसकी अपनी समृद्ध संस्कृति हो। मेरी नजर में जिसकी समृद्ध संस्कृति नहीं, उसकी विश्व में स्वीकृति नहीं। हिमाचल के लोक वाद्य यंत्रों को संरक्षित करने की मुहिम छेड़नी ही होगी। उसके लिए प्रदेश को नीति बनाना आवश्यक है। गुरु-शिष्य परंपरा, सम्मान, प्रोत्साहन, अच्छा पारिश्रमिक, वादकों की समाज में अच्छी स्थिति व स्वीकृति ही लोक वाद्य यंत्रों को संरक्षित करने में अहं भूमिका निभा सकती है।

— कंचन शर्मा, शिमला

December 26th, 2016

 
 

वाद्य यंत्रों से संरक्षित रह पाएगा हिमाचली संगीत

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December 19th, 2016

 

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December 19th, 2016

 

बनारसी दास चतुर्वेदी

बनारसी दास चतुर्वेदी प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार थे। शहीदों की स्मृति में साहित्य प्रकाशन के लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किए। उनकी गणना अग्रगण्य पत्रकारों और साहित्यकारों में की जाती है।  हिंदी साहित्य के प्रति अनुराग और लेखक की अभिरुचि के लक्षण उनमें पत्रकार बनने से […] विस्तृत....

December 19th, 2016

 

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December 19th, 2016

 

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December 19th, 2016

 

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December 19th, 2016

 

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December 12th, 2016

 

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December 12th, 2016

 

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December 12th, 2016

 
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